व्यक्ति विशेष के नजरिए से देखा जाए या एक पूरे समाज के नजरिए से, पहचान इंसान की जिंदगी में एक बड़ी भूमिका निभाती है.

पहचान ही वह एक प्रमुख घटक है, जो दुनिया भर में राष्ट्रवाद की नींव भी है. हालांकि, दुनिया के कुछ बड़े समुदाय अपनी पहचान के बावजूद अपने लिए राष्ट्र हासिल नहीं कर पाए, इन समुदायों की बात करें तो इसमें सबसे ऊपर कुर्द लोग आते हैं.

कुर्द ईरान, इराक, सीरिया और तुर्की जैसे देशों में फैले हुए हैं, जो कुछ सालों से अपने लिए एक मुल्क बनाने की कोशिश में है. किन्तु, उनकी इस राह में कई तरह की अड़चनें हैं.

ऐसे में जानना दिलचस्प होगा कि आखिर क्या है कुर्दिस्तान की मांग की कहानी-

कई मौके आए, पर कुर्दिस्तान हाथ न आया!

कुर्दिस्तान वह अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है, जिससे न केवल वह मुल्क परेशान हैं जहां पर कुर्द रहते हैं, बल्कि अब ये अमेरिका की विदेश नीति का हिस्सा बन चुका है. बीसवीं सदी में उपनिवेशवाद का दौर खत्म होते-होते दुनिया के कई महाद्वीपों में कई नए देश बने.

अफ्रीका में अंग्रेजों से आजादी के बाद कई देश अस्तित्व में आए. ऐसा ही कुछ सोवियत यूनियन के टूटने पर भी हुआ, लेकिन इस दौर में भी कुर्दों को अपना देश बनाने का मौका नहीं मिल पाया.

नतीजतन, 25 मिलियन से ज्यादा आबादी वाला ये समुदाय बिना मुल्क के ही रह रहा है. हालांकि, अभी तक कई ऐसे मौके आए जब यह समुदाय अपना देश बनाने के बेहद करीब तक पहुंचा. लेकिन उसके बावजूद उसे कुछ हासिल ना हो पाया.

पहला ऐसा मौका प्रथम विश्व युद्ध के बाद ऑटोमन एंपायर के टूटने के समय आया. एलाइड पावर औऱ ऑटोमन एम्पायर के बीच जब ट्रीटी ऑफ सेव्रेस हुई, तो उसमें दूर तक फैले ऑटोमन एम्पायर के तहत आने वाले मुख्य क्षेत्रों के बंटवारे की बात कही गई थी, जिससे तुर्की, ग्रीस जैसे देश बने थे.

इस संधि में कुर्दिस्तान के बनने की भी योजना थी, जो किसी वजह से पूरी नहीं हो पाई. दूसरा, ऐसा मौका द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आया जब ईरान के उत्तर पश्चिमी इलाके महदाब में कुर्दों ने बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया.

दूसरा मौका कुर्दों को तब मिला, जब इराक पर आईएसआईएस का कब्जा होने के बाद वह तहस-नहस होने की कगार पर पहुंचा था.
बता दें कि इराक ही वह देश है, जहां सबसे ज्यादा कुर्द लोग रहते हैं, इराक में कुर्दों की संख्या 6 मिलियन से ज्यादा है.

25 सितंबर 2017 में इराक में कुर्दिस्तान की स्थापना के लिए जनमत संग्रह करवाया गया था, जिसकी दुनिया भर में आलोचना की गई.
केवल इराक, ईरान, तुर्की ही नहीं बल्कि अमेरिका ने भी इसका विरोध किया.

यहां तक कि जनमत संग्रह से पहले अमेरिका के तत्कालीन विदेश सचिव रेक्स टिलरसन ने भी इराक की कुर्द हुकूमत से ये जनमत संग्रह टालने की बात की थी, लेकिन वह भी कुर्दों को नहीं  रोक पाए.

इराक में आईएसआईएस के खात्मे के वक्त हुए जनमत संग्रह में 33 लाख लोगों ने हिस्सा लिया, जिनमें से 92% ने अलगाव के पक्ष में वोट किया. इससे यह साफ हो गया था कि कुर्द अब अपना खुद का देश चाहते हैं

Kurd People Want Separate State, Kurdistan (Pic: national)

जब ईराकी सेना भाग खड़ी हुई, तो...

वैसे तो इराक के कुर्द बहुल इलाकों के प्रशासन को आजादी दे दी गई है. वो अपनी सरकार खुद चलाते हैं, लेकिन उसके बावजूद इन्हें बड़े फैसलों के लिए इराक की हां या ना का इंतजार रहता है.

2014 में जब आईएसआईएस ने इराक को कब्जे में ले लिया, तो उसकी चपेट में कुर्द इलाके भी आ गए थे. इनमें इर्बिल जो कुर्द की राजधानी है और किर्कुक भी शामिल थे. ये दोनों ही इलाके तेल जैसे खनिज पदार्थों के लिए धनी माने जाते हैं.

एक तरफ जहां कुर्दों को इराकी सेना का इंतजार था कि वो उनकी मदद करेंगे और आईएसआईएस से लड़ेंगे. वहीं इन इलाकों में स्थिति बिलकुल उल्टी पड़ गई थी. इराकी सेना आईएसआईएस से लड़ने की बजाए मैदान छोड़ कर भाग गई और कुर्दी लड़ाकों ने ही उनका सामना किया.

ऐसे ही कुछ घटनाओं के चलते कुर्दों को आत्मविश्वास और बढ़ा और उन्होंने कुर्दिस्तान के लिए अपनी आवाज को और भी बुलंद कर लिया.

2015 में जब इराक में आईएसआईएस से लड़ाई जारी थी, तो उस समय कई कुर्द नेताओं के बयान ऐसे आ रहे थे. इसमें इराक की नाकामियों की कड़ी निंदा हो रही थी. कुर्द नेता मानने लगे थे कि अब इराक एक हारा हुआ देश है.

यहां तक कि उसका अस्तित्व ही दांव पर लगा हुआ है, ऐसे में वो कुर्दों को क्या संभालेंगे.

इकनॉमिस्ट की एक रिपोर्ट के मुताबिक कुर्द इलाके के प्रधानमंत्री नेचिरवान बर्जानी ने तो यह तक कह दिया था कि, अब इराक नाम का कोई देश बचा ही नहीं है. हालांकि, उन्होने ये भी दावा किया था कि इसके बावजूद उन्हें आजादी नहीं मिलेगी, जो काफी हद तक सही साबित भी हुआ.

चूँकि, जनमत संग्रह के बाद किसी देश ने उसे नहीं स्वीकारा और ईराक की सुप्रीम कोर्ट ने भी उसे असैंवधानिक करार दे दिया. इसके चलते एक बार फिर कुर्दों की कोशिश नाकाम रह गई .

ISIS, A Terrorist Organisation (Pic: news)

तुर्की है राह में सबसे बड़ा रोड़ा!

यूँ तो हर वो देश कुर्दिस्तान के बनने के खिलाफ है, जहां कुर्द समुदाय के लोग रहते हैं, लेकिन इसमें सबसे ज्यादा विरोध तुर्की द्वारा जताया गया है. इसका अंदाजा हाल ही में तुर्की द्वारा सीरिया के कुर्द लड़ाकों पर कराए गए हमले से लगाया जा सकता है.

तुर्की में कई सालों से सीरिया के कुर्द बहुल इलाकों से घुसपैठ की वारदातें होती रहती हैं.

वहीं इस इलाके के संगठन वाईपीजी पर तुर्की अपने यहां रहने वाले कुर्दों को भड़काने का आरोप भी लगाता रहता है. यही वजह है कि तुर्की उन्हीं कुर्द लोगों के खिलाफ खड़ा है, जो अमेरिका द्वारा आईएसआईएस के खात्मे के लिए जरूरी समझे जाते हैं.

ईराक की तरह ही सीरिया में भी कुर्द बहुल इलाकों के पास अपने प्रशासन की आजादी है. ये इलाके तुर्की के बोर्डर से मिलते हैं. इसकी वजह से तुर्की चिंता में है. तुर्की का मानना है कि सीरिया का कुर्द वाईपीजी संगठन तुर्की के पीकेके कुर्द मिलिटेंट ग्रुप को बढ़ावा देता है.

हालांकि, काफी समय से तुर्की में कुर्द मिलिटेंट्स की गतिविधियों में कमी आई है, जिसकी एक वजह ये भी हैं कि वहां के कुर्दों ने पुरानी ज्यादतियां भुलाकर खुद को तुर्की का हिस्सा मान लिया है. वहीं यदि ईरान में कुर्दों की बात करें, तो वहां की सत्ता कुर्दों से ज्यादा परेशान नहीं है.

किन्तु, केवल तब, तक जब वो अपने लिए अलग देश की मांग न कर रहे हों.

Turkey Nationalists Protesting Against Kurd's Party (Pic: cypriot)

अब जहां इराक से आईएसआईएस का सफाया लगभग हो चुका है और वो फिर एक बार मुल्क के तौर पर उभरना शुरू कर रहा है.

ऐसे में देखना काफी दिलचस्प होगा की वहां के कुर्द, कुर्दिस्तान की मांग को कैसे फिर से उठाऐंगे?

Web Title: Kurdistan: Dream of Kurds or a Problem For Middle East Countries, Hindi Article

Featured Image Credit: yenimobi