13 की उम्र, माथे में चमक और दुश्मन के लिए आंखों में क्रोध की ज्वाला!

यह पहचान है भारतीय इतिहास में दर्ज एक ऐसी वीरांगना की, जिसने नागालैंड की आवाम की आंखों में आंखें डालकर यह कहने का दम दिखाया कि–

“हम आजाद लोग हैं, गोरे हम पर राज नहीं कर सकते.”

आगे बढ़ते हुए उन्होंने अंग्रेजों की जड़ें हिलाने की लिए हुंकार भरी और कच्ची उम्र में ही उनसे लोहा लेना शुरू कर दिया. साथ ही अपने अदम्य साहस से उनकी नाक में दम कर दिया. अंग्रेज उनसे किस तरह डरे हुए थे, इसको इसी से समझा जा सकता है कि उनके बारे में सूचनाएं देने वालों को ईनाम तक देने की पेशकश कर चुके थे.

यह महिला कोई और नहीं बल्कि नॉर्थ ईस्ट की रानी गाइदिन्ल्यू थीं. गाइदिन्ल्यू की वीरता के किस्सों का ही असर है कि उन्हें नागालैंड में ‘देवी’ का दर्जा मिला हुआ है.

तो आईए उनके जीवन संघर्ष को जानते हैं –

मणिपुर के रोंगमेई में जन्म

मणिपुर (पूर्व में अलग रियासत) के तमेंगलांग जिले में बराक व मकरू नदियों के बीच काला नागा नाम की पर्वत श्रृंखला है. इन्हीं पहाड़ों में पामेई नाम की एक जाति रहती थी. यहीं रहनेवाले एक दंपती के घर 26 जनवरी 1915 को गाइदिन्ल्यू का जन्म हुआ था. उनके पिता लोथोनाग व मां करोतलिन्ल्यू थे.

वह कहते हैं न कि पूत के पांव पालने में ही नजर आने लगते हैं, ऐसा ही कुछ गाइदिन्ल्यू में भी दिखने लगा था. उनके माता-पिता का गांव में कोई खास ओहदा नहीं था, इसके बावजूद खास गुणों के चलते ही गाइदिन्ल्यू को मोहल्ले के सभी बच्चों से ज्यादा दुलार मिला.

Rani Gaidinliu (Pic: HT)

आंदोलन से बनाई ‘नई राह’

बचपन से ही गाइदिन्ल्यू आम बच्चों से अधिक समझदार थीं. उनकी बुद्धि तीक्ष्ण थी और अपने क्षेत्र को आजाद कराने का गजब का जज्बा.

1905 यानी गाइदिन्ल्यू के जन्म से करीब 10 साल पहले हैपोउ जादोनाग का जन्म हुआ था. जादोनाग गाइदिन्ल्यू के चचेरे भाई थे. उन्होंने खुद को ‘नागा का मसीहा’ घोषित कर ‘हेरका’ धार्मिक आंदोलन शुरू किया था. गाइदिन्ल्यू इस आंदोलन से बहुत प्रभावित हुईं और वह भी इसमें शामिल हो गयीं.

उस वक्त उनकी उम्र महज 10 साल की रही होगी!

इधर, धार्मिक आंदोलन धीरे-धीरे अंग्रेजी हुकूमत से नगा क्षेत्र को आजाद कराने की लड़ाई में बदल गया और जादोनाग के नेतृत्व में आंदोलन आग की तरह आसपास के क्षेत्रों में भी फैलने लगा.

उधर, नागा आंदोलन ने अंग्रेजी हुकमूत की चूलें हिला दीं. उन्होंने इस आंदोलन को विफल करने के लिए फरवरी 1931 को जादोनाग को गिरफ्तार कर लिया.

जादोनाग के खिलाफ मुकदमा चला और उन्हें 29 अगस्त 1931 को इंफाल जेल में फांसी दे दी गयी. इस तरह जादोनाग की शहादत के बाद गाइदिन्ल्यू के हाथों आंदोलन की सीधी कमान आ गई.

अंग्रेजों के लिए बनीं ‘मुसीबत’

बेहद कम उम्र में आंदोलन की बागडोर संभालने वाली गाइदिन्ल्यू ने बेहद आक्रामक रुख अपनाया. उन्होंने स्थानीय लोगों को आंदोलन से जोड़ने के लिए उन्होंने उन्हें अंग्रेजी हुकूमत को टैक्स नहीं देने को कहा.

उनके इस मशविरे को लोगों ने मान लिया, तो अंग्रेजों की त्यौंरियां चढ गयीं. लिहाजा उन्होंने गाइदिन्ल्यू के खिलाफ कार्रवाई शुरू की.

इधर, गुलामी की बेड़ियों में जकड़े अपने क्षेत्र को आजाद कराने के लिए गाइदिन्ल्यू ने अपने लड़ाकों के साथ अंडरग्राउंड रहकर अंग्रेजों पर कई हमले किये और उन्हें खौफ के साये में रखा.

Rani Gaidinliu in War (Pic: RP)

…और बन गईं ‘इनामी’!

गाइदिन्ल्यू के छापामार युद्ध (गुरिल्ला युद्ध) कौशल से अंग्रेज इतने भयभीत हो गये थे कि उन्हें सूझ ही नहीं रहा था कि क्या करें? अंग्रेजों ने कई बार उनकी गिरफ्तारी के लिए सैन्य टुकड़ियां भेजीं, मगर अंग्रेजों को निराशा ही हाथ लगी.

इसके बाद हारकर अंग्रेजों ने गाइदिन्ल्यू को गिरफ्तार करने वालों को पुरस्कार देने की घोषणा की. शुरू में पुरस्कार की राशि 200 रुपए रखी गयी थी, लेकिन जब कोई सुराग न मिला, तो ईनाम की राशि बढ़ाकर 500 रुपए कर दी गयी. उस जमाने में यह बहुत मोटी रकम मानी जाती थी.

यही नहीं, अंग्रेजों ने गांव वालों से यह भी कह दिया कि जो गाइदिन्ल्यू के बारे में सूचनाएं देगा उससे 10 वर्षों तक कोई टैक्स नहीं वसूला जाएगा.

चूंकि स्थानीय लोग गाइदिन्ल्यू के साथ थे, इसलिए इस घोषणा का अंग्रेजों को कोई खास लाभ नहीं मिला.  दिलचस्प बात यह थी कि इस वक्त वह महज 16 साल की थीं!

‘बैटल ऑफ हैंग्रम’ में गिरफ्तारी

छापामार युद्ध में महारत हासिल होने के कारण अंग्रेजों के सारे दांव फेल हो रहे थे, तो अंग्रेजों ने गाइदिन्ल्यू को पकड़ने के लिए असम राइफल्स के जवानों को लगा दिया.

…और फिर एक दिन गाइदिन्ल्यू व उनके लड़ाकों से असम राइफल्स के सैनिकों का सामना हो गया.

तारीख थी 16 फरवरी 1932 और स्थान था हैंग्रम का उत्तर कचार हिल्स.

यहां दोनों के बीच भीषण लड़ाई हुई, लेकिन गाइदिन्ल्यू को पकड़ने में असम राइफल्स के जवान नाकामयाब ही रहे. इस लड़ाई को ‘हैंग्रम की लड़ाई’ के नाम से जाना जाता है.

लड़ाई के कुछ दिन बाद ही उनके लड़ाकों ने असम राइफल्स के आउटपोस्ट पर हमला कर दिया. आउटपोस्ट एकदम अलग तरीके से बना हुआ था, जिस कारण असम राइफल्स के जवानों को कम और नगा लड़ाकों को ज्यादा नुकसान झेलना पड़ा.

गाइदिन्ल्यू व उनके दस्ते के लिए हैंग्रम अब महफूज ठिकाना नहीं रह गया था, इसलिए गाइदिन्ल्यू अपने दल के साथ पोलोमी गांव पहुंच गयीं.

यह अक्टूबर 1932 की बात होगी.

यहां उन्होंने असम राइफल्स के तर्ज पर ही आउटपोस्ट बनवाना शुरू कर दिया. दुर्भाग्य से अंग्रेजों को इसकी भनक लग चुकी थी, इसलिए आउटपोस्ट बनकर तैयार होता, इससे पहले ही उन्होंने भारी संख्या में सैनिकों को लेकर अचानक पालामा गांव पर हमला बोल दिया.

इस हमले से मुकाबला करने के लिए गाइदिन्ल्यू व उनके लोगों के पास तैयारी नहीं थी, इस कारण अंतत: उन्हें हार का सामना करना पड़ा. इस तरह अंग्रेजों ने आखिरकार गाइदिन्ल्यू को गिरफ्तार कर लिया और कोहिमा भेज दिया.

वहां उन्हें आजीवन कारावास की सजा हुई और कुछ वर्षों के अंतराल पर उन्हें अलग-अलग जेलों में ट्रांसफर किया जाता रहा.

वीरता के नेहरू भी थे ‘कायल’

पंडित जवाहरलाल नेहरू को जब गाइदिन्ल्यू के संघर्ष के बारे में पता चला, तो वह उनसे बेहद प्रभावित हुए और 1937 में सीलोन जेल में उनसे मुलाकात की और उन्हें ‘रानी गाइदिन्ल्यू’ का संबोधन दिया.

यही नहीं, पंडित नेहरू ने अंग्रेजी हुकूमत से उन्हें रिहा करने की भी गुजारिश की. लेकिन, अंग्रेजों ने इस बुनियाद पर उन्हें रिहा करने से इनकार कर दिया कि उनके रिहा होने से आंदोलन फिर भड़क सकता है.

बहरहाल, हिन्दुस्तान जब आजाद हुआ, तो उन्हें जेल से रिहा कर दिया गया.

Rani Gaidinliu Death (Pic: E-Pao!)

रिहाई के बाद उन्होंने अपना जीवन सामाजिक कार्यों में खपा दिया. 17 फरवरी 1993 को बीमारी के कारण उनका निधन हो गया. इस तरह दिलेरी से भरी रानी गाइदिन्ल्यू इतिहास में दर्ज हो गईं.

अगर आपके पास रानी गाइदिन्ल्यू से जुड़ी कोई और जानकारी है, तो नीचे दिए कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं.

Web Title: Legend of Rani Gaidinliu, Hindi Article

Featured Image Credit: biographyhindi.com