60 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते अच्छे-अच्छे पानी मांगते दिखते हैं. कई तो बीमारियों के चलते बिस्तर से उठ तक नहीं पाते. ऐसे में यह किसी कल्पना जैसा ही लगता है कि इतिहास में कोई ऐसा व्यक्ति भी रहा होगा… जिसने 80 वर्ष की आयु में ना केवल अंग्रेजों के खिलाफ़ युद्ध का बिगुल बजाया, बल्कि कई युद्धों में अंग्रेजों के दांत भी खट्टे किए.

इतिहास के पन्नों में दर्ज बाबू वीर कुंवर सिंह ऐसे ही एक नाम हैं. 80 की उम्र में उनके द्वारा दिखाये गये अदम्य साहस के सम्मान में आज भी लोगों का सिर झुका जाता है.

तो आईये 80 वर्ष के इस भारतीय नायक को जरा नजदीक से जानने की कोशिश करते हैं

गोरिल्ला युद्ध नीति में माहिर थे ‘कुंवर साहब’

1777 ई. में बिहार के शाहाबाद में एक बच्चे की किलकारियां गूंजी. नाम रखा गया ‘बाबू वीर कुंवर सिंह’. पिता कुंवर साहब राजा साहबज़ादा सिंह और माता पंचरत्न देवी के घर बधाइयों का तांता लग गया. वैसे भी पुत्र के पैदा होने की एक अलग ही खुशी होती है. बचपन से ही बच्चे से उम्मीदें की जाने लगी कि वह बड़ा होकर यह करेगा, वह करेगा.

पिता के सपनों के साथ कुंवर धीरे-धीरे बड़ा होने लगा. चूंकि, उनका संबंध परमार राजपूत समुदाय की शाखा उज्जैनी राजपूत कुल से था, इसलिए उन्हें बचपन में खास परेशानी का सामना नहीं करना पड़ा.

यह वह दौर था, जब देश पर अंग्रेजों का राज था. वह तेजी से अपने बिस्तार के लिए हर तरफ प्रयास में रहते थे. उनकी आंखों में अंग्रेजों की क्रूरता की कई तस्वीरें कैद होती जा रही थीं. वह अपने अंदर धधकने वाली आग में अंग्रेज़ी हुकूमत को जला कर राख कर देना चाहते थे.

‘पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं’ वाली कहावत को सत्य करते हुए कुंवर साहब के बाग़ी तेवर बचपन से ही दिखने लगे थे. वह आम बालकों की तरह बच्चों वाले खेल खेलने के विपरीत अपना समय घुड़सवारी, निशानेबाज़ी, तलवारबाज़ी सीखने में व्यतीत करते. उम्र बढ़ने के साथ-साथ उनकी युद्ध कलाओं को सीखने की रूचि भी बढ़ने लगी. उन्होंने मार्शल आर्ट जैसी कठिन विद्या भी सीखी.

माना जाता है कि छत्रपति शिवाजी महाराज के बाद भारत में वह दूसरे योद्धा थे, जो गोरिल्ला युद्ध नीति के हर भेद को अच्छे से जानते थे. इसका फायदा उन्होंने अंग्रेजों को चित्त करने के लिए किया. उनकी ख्याति कितनी दूर-दूर तक इसको इस बात से ही समझा जा सकता है कि गया ज़िले के ज़मीदार और पराक्रमी योद्धा महाराणा प्रताप के वंशज राजा फ़तेह नारियां सिंह ने अपनी सुपुत्री के लिए उनको विवाह का प्रस्ताव भेजा था.

Legendary Warrior Babu Veer Kunwar Singh (Representative Pic: arrahonline.in)

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अहम भूमिका

बाबू कुंवर सिंह बहुत पहले से ही अंग्रेज़ी शासन के खिलाफ़ युद्ध छेड़ने का मन बना रहे थे. किन्तु, यह अकेले चने के लिए भाड़ फोड़ने वाली बात थी. वह काफी समय अंग्रेजों से सीधी लड़ाई से परहेज करते रहे. चूंकि, उनके अंदर अंग्रजों को रोकने की क्षमता थी, इसलिए  25 जुलाई 1857 ई को दानापुर छावनी के कुछ क्रन्तिकारियों ने उनसे निवेदन किया कि वह इस संग्राम में सक्रियता दिखाएं.

कुंवर साहब ने उन्हें निराश नहीं किया और अंग्रेजों से सीधी लड़ाई ले ली. कुंवर साहब को अपने क्षेत्र के विद्रोही सैनिकों का नेता घोषित कर दिया गया. इस समय उनकी आयु लगभग 80 वर्ष की थी. गजब की बात थी कि इस उम्र में भी कुंवर साहब का जज्बा कायम था. उनके अंदर देश प्रेम कूट-कूट कर भरा हुआ था.

भले ही कुंवर साहब की सैन्य ताक़त अंग्रेजों के मुकाबले बहुत कम थी, मगर उन्होंने हार नहीं मानी. मजबूती से डटकर उन्होंने मोर्चा संभाला और अग्रेज़ों के ठिकानों पर औचक हमला कर दिया. इस हमले को अंग्रेज नहीं झेल पाये और उन्हें भारी क्षति का सामना करना पड़ा.

Kunwar Singh Mahavidyalay, Ballia (Pic: kspgc)

अपने इस आंदोलन को और मजबूती देने के लिए कुंवर साहब ने मिर्जापुर, बनारस, अयोध्या, लखनऊ, फैजाबाद, रीवा, बांदा, कालपी, गाजीपुर, बांसडीह, सिकंदरपुर, मनियर और बलिया समेत कई अन्य जगहों का दौरा किया. वहां उन्होंने नए साथियों को संगठित किया और उन्हें अंग्रेजों का सामना करने के लिए प्रेरित किया.

ये संगठन सक्रिय हुए, तो अंग्रेजों के ठिकानों पर छापेमारी तेज़ हो गयी. अंग्रेज़ पूरी तरह बौखला चुके थे. इसी कारण उन्होंने इंग्लैंड से अतिरिक्त सहायता मंगवा ली, ताकि कुंवर साहब के मोर्चे को खत्म किया जा सके. यही नहीं, इसमें उन्होंने कुछ गद्दार राजाओं को भी अपनी तरह मिला लिया. इन गद्दारों ने सियासत को बचाने के लाभ में अंग्रेजों का साथ देना शुरू कर दिया.

इसके दुष्परिणाम स्वरूप अंग्रेज़ी हुकूमत द्वारा क्रांतिकारियों और सैनिकों को शक के अधार पर गिरफ्तार कर उन्हें मौत की सज़ा देने की मुहिम तेज़ हो गयी.

British in 1857 (Representative Pic: prezi.com)

हर मोर्चे पर अंग्रेजों को किया ‘चित्त’

अंग्रेज़ी हुकूमत से आमने सामने युद्ध कर पाना उस समय किसी के लिए आसान नहीं थी. बावजूद इसके उन्होंने अंग्रेजों से युद्ध किया. उन्हें अपने कुछ शुरुआती दांव कमजोर दिखे, तो उन्होंने अपनी गोरिल्ला युद्ध नीति का सहारा लिया.

कुंवर साहब का यह दांव अंग्रेजों पर भारी पड़ी. इस युद्ध नीति से अंग्रेज़ों को जन-धन का नुक्सान ही नहीं हुआ, बल्कि इससे उनकी मानसिकता पर भी गहरा असर पड़ा. उन्होंने आपा खोते हुए क्रांतिकारियों पर हर तरफ से हमला करना आरंभ कर दिया. साथ ही साथ कुंवर साहब के महल को भी आग लगा दी.

अपना महल जलता देखकर कुंवर साहब मौत बनकर अंग्रजों के ऊपर टूट पड़े. वहां अंग्रेजों को मात देने के बाद वह तांत्या टोपे और नाना साहेब के साथ कानपुर में अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने  गये और युद्ध में अंग्रेजों को धूल चटाई.  इस युद्ध में कुंवर साहब की वीरता ने सबको बहुत प्रभावित किया.

कुंवर साहब ने कानपुर के बाद आजमगढ़ में भी अंग्रेजों को नाकों चने चबवाया. हालॉंकि, हर बार विजय मिलने के बाद अंग्रेज़ी हुकूमत दोबारा अपनी पूरी ताक़त से हमला कर के अपना कब्ज़ा वापिस ले लेती थी. बावजूद इसके वह कुंवर साहब से पूरी तरह भयभीत रहते थे.

Babu Veer Kunwar Singh During War with British (Representative Pic: Pinterest)

अपना हाथ काट दिया और…

आजमगढ़ के युद्ध के बाद बाबू कुंवर सिंह 20 अप्रैल 1958 को गाजीपुर के मन्नोहर गाँव पहुंचे. वहां से वह आगे बढ़ते हुए  22 अप्रैल को नदी के मार्ग से जगदीशपुर के लिए रवाना हो गये. इस सफर में उनके साथ कुछ साथी भी थे. इसकी खबर किसी गद्दार ने अंग्रेजों को दे दी.

इस कारण अंग्रेजों ने पूरी ताकत के साथ उन्हें नदी में ही घेर लिया. अंग्रेजों की तुलना में कुंवर साहब के पास संख्या में बहुत कम साथी थे. फिर भी उन्होंने आगे बढ़कर अंग्रेजों से दो-दो हाथ किये और आगे बढ़ते रहे. वह लगभग अंग्रेजों को पूरी तरह पीछे धकेलने में कामयाब हो गये थे. तभी किसी अंग्रेज ने छिपकर उन पर गोली चला दी. इस वार से उनका दाहिना हाथ बुरी तरह जख्मी हो गया था. जितनी तेजी से उनका खून बह रहा था. उतनी ही तेजी से उनकी तलवार चल रही थी.

थोड़ी ही देर में गोली के ज़हर ने शरीर में फैलना शुरु कर दिया. कुंवर साहब को अंदाजा हो चला था कि थोड़ी और देरी की गई तो यह गोली का जहर उनके पूरे शरीर में फैल जायेगा. इसलिए उन्होंने देरी किए बिना कटार निकाली और अपनी भुजा काट कर यह कहते हुए गंगा माँ को समर्पित कर दिया कि ‘हे माँ गंगा! अपने इस पुत्र की ओर से ये तुच्छ उपहार स्वीकार करो.”

दाहिनी भुजा कट जाने के उपरांत भी कुंवर साहब अंग्रेजों से लड़ते रहे और अंतत: जगदीशपुर पहुंचने में सफल रहे.

गोली का फ़ैल चुका ज़हर और खून के लगातार रिसाव के कारण कुंवर साहब की स्थिति नाजुक होती जा रही थी. उन्हें सलाह दी गई कि उन्हें कुछ दिन युद्ध से दूर रहना चाहिए. वह मुस्कुराते हुए आग बढ़े और कैप्टन ली ग्रैंड के नेतृत्व वाली अंग्रेज़ी सेना से लड़ाई लड़ी.

कुंवर साहब की सेना की वीरता के आगे अंग्रेजों ने घुटने टेक दिए और जगदीशपुर पर कुंवर साहब का पुनः अधिकार हो गया. इतनी बड़ी जीत के बाद भी जगदीशपुर और साथ के इलाकों में मातम छाया था क्योंकि कुंवर साहब की हालत बिगड़ती चली जा रही थी. अपनी मातृभूमि को अंग्रेजों के कब्ज़े से आज़ाद कराने के तीन दिन बाद 26 अप्रैल 1858 को कुंवर साहब वीरगति को प्राप्त हो गए.

Babu Veer Kunwar Singh after war (Representative Pic: indiaquizzes)

बाबु वीर कुंवर सिंह को इतिहास हमेशा याद रखेगा. आज भी वह पूरे देश के लिए एक प्रेरणा हैं. उनका व्यक्तित्व बताता है कि किसी भी काम के लिए इंसान के अन्दर अगर सच्ची लगन हो, तो वह उम्र के किसी भी पड़ाव पर दुनिया को हिला सकता है.

ऐसे वीर और पराक्रमी योद्धा को शत-शत नमन.

Web Title: Legendary Warrior Babu Veer Kunwar Singh, Hindi Article

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