चक्रवर्ती सम्राट अशोक की शौर्य गाथा से इतिहास भरा पड़ा है. जहां मौर्य वंश की साहसिक गाथाओं ने देश को राजनीति, कूटनीति और सैन्यनीति का पाठ पढ़ाया है, वहीं इसी वंश ने भारत में प्रेम की एक अलग ही मिसाल भी कायम की.

यह मिसाल है सम्राट अशोक और उनकी पत्नी देवी के अनोखे प्रेम बंधन की!

इसमें अशोक और देवी दोनों बंधे पर देवी कभी अपनी ससुराल नहीं जा पाईं. दोनों के बीच प्रेम तो था, लेकिन रास्ते अलग अलग थे. हालांकि, यह बात और है कि जीवन में अंतिम समय में अशोक ने देवी के पदचिह्नों पर चलना ही स्वीकार किया.

तो आइए जानते हैं सम्राट अशोक और देवी की रोचक प्रेम कहानी –

पहली नजर में दिल हार बैठे अशोक

वह दिन राजकुमार अशोक के लिए बहुत खास था, जब उनके गुरु चाणक्य के शिष्य राधा गुप्त को राज्य का महामात्य चुना गया. इस शुभ मौके पर उनसे मिलने विदिशा से श्रेष्ठ समाज के प्रमुख देवदत्त भी आए और उन्होंने अशोक और राधागुप्त को विदिशा आने का न्यौता दिया.

अशोक का मन प्रसन्न था और उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया. इसके तीन दिन बाद वह अपने सेवकों और कुछ सैनिकों के साथ विदिशा जा पहुंचे. विदिशा की प्रजा ने सम्राट अशोक के स्वागत में पलक पांवड़े बिछा दिए. वहीं देवदत्त ने राजकुमार अशोक का विशेष स्वागत किया. उनके लिए विशेष तौर पर गीत-संगीत के कार्यक्रम का आयोजन किया गया था.

इसी क्रम में शाम के कार्यक्रम से पहले जब अशोक अपने कक्ष में आराम कर रहे थे कि तभी बाग से कुछ लड़कियों के खिलखिलाने की आवाज उन्हें सुनाई दी आई. वैसे तो यह सामान्य था, पर खिलखिलाहटों के बीच एक मीठी सी ध्वनि अशोक के कानों में पड़ी.

आवाज सुनकर अशोक से र हा न गया और वे बाहर आ गए!

अपनी सहेलियों संग बाग में फूल तोड़ने आई देवी से जब अशोक की नजरें मिलीं तो वे ठिठक गए और देवी शर्माकर पेड़ों के पीछे छिप गईं. अशोक ने उन्हें फिर देखना चाहा, लेकिन देवी वहां से जा चुकी थीं.

यह इन दोनों की पहली मुलाकात थी, जिसने दोनों को रोमांच से भर दिया था.

अशोक इस घटना के बाद से ही विचलित थे. राधागुप्त ने कई बार पूछा पर वे कुछ भी ठीक से न कह सके. देवी के खयालों में खोए हुए कब शाम हो गई अशोक को पता भी न चला.

आखिरकार वे एक भव्य समारोह में शामिल होने के लिए पहुंचे. द्वार पर अशोक के स्वागत के लिए थाल लिए खड़ी प्रजा उन पर फूलों की बारिश करने लगी. उन्ही के कंधों के पीछे छिपे हुए दो नैन अशोक को देख रहे थे. एक बार फिर अशोक की नजर उन नैनों से टकरा गईं. अशोक को उन घायल कर देने वाले नैनों को समझने में कतई देर न लगी.

स्वागत कक्ष से आगे बढ़े तो शाक्यवंश के साहूकार की बड़ी बेटी देवी से सम्राट अशोक का परिचय हुआ. बस फिर क्या था अशोक घायल तो पहले से ही थे. ऐसे में उनका उस सुंदर नवयुवती पर दिल हार बैठना लाजमी था.

Maharani Devi and King Ashoka. (Representative Pic: bollywoodmantra)

सुमंगला ने पहुंचाया प्रेम संदेश

अपने प्रायोजन की समाप्ति के बाद अशोक उज्जयनी वापस तो लौट आए, लेकिन उनका दिल अभी भी विदिशा के उन्हीं बाग बगीचों में अपनी धड़कन को ढूंढ रहा था!

राधा गुप्त कुछ-कुछ समझ रहे थे कि अशोक के मन में कुछ तो चल रहा है, लेकिन अशोक उन्हें अपने दिल की बात नहीं बता पा रहे हैं. दोनों मित्रों के बीच यह अंतर्द्वंद्व चल ही रहा था कि तभी अशोक के पास सेवक आया, जिसने उन्हें सुमंगला के आने का समाचार दिया.

अशोक को लगा जैसे सारे सवालों के जवाब मिल गए और वे फौरन सुमंगला से मिलने जा पहुंचे! सुमंगला उनके चेहरे की बेचैनी को पहली नजर में ही भांप गईं. वह मुस्कुराई और बोली कि जिसके ख्यालों में आप खोये हुए हैं, दरअसल वह भी आपकी ही तरह परेशान है.

अशोक ने बिना देर किए अपने हाथ से एक अंगूठी निकालकर सुमंगला को दी और कहा कि यह मेरी ओर सेे देवी के लिए प्रणय निवेदन है. अब मुझे उसके जवाब का इंतजार है. सुमंगला विदिशा के लिए रवाना हो गईं और यहां अशोक की खुशी का कोई ठिकाना न रहा.

अब राधागुप्त ने हिम्मत कर अशोक से पूछ ही लिया कि आखिर बात क्या है?

अशोक ने उन्हें देवी के बारे में बताया तो राधागुप्त खुश हुए और उन्होंने अशोक से कहा कि उन्हें फिर से विदिशा जाना चाहिए और देवी से खुद मिलकर बात करनी चाहिए.

आखिरकार उन्होंने राधागुप्त के साथ विदिशा प्रस्थान किया.

Chakravartin Emperor Ashoka (Pic: indiancontents)

देवी ने रखी शर्त

राजकुमार अशोक अब विदिशा की उन्हीं जगहों पर आ पहुंचे.

देवदत्त को उनके आगमन की कोई जानकारी नहीं थी, वहीं अशोक चाहते भी नहीं थे कि किसी को उनके आने के बारे में खबर मिले. इसी कारण राधागुप्त की मदद से उन्होंने विदिशा में अपने रहने का स्थान तलाश किया और पहचान छिपाकर वह अपने कक्ष में चले गए.

देवी से मिलने के उतावलेपन में अशोक इतने बेचैन हो चुके थे कि छत पर जा पहुंचे और वहां पूर्णिमा रात के बीच देवी के चेहरे की कल्पना करने लगे थे. इसी बीच उन्हें घुंघरुओं की आवाज सुनाई दी और चांद की दूधिया रोशनी में देवी का चेहरा साकार होता दिखा!

वे अचानक ही बोल पड़े, देवी! देवी ने जवाब दिया, हां मैं!

अशोक ने देवी के हाथों में अपनी अंगूठी देखी और देवी ने उन्हें देखकर कहा कि मुझे आपका प्रणय निवेदन स्वीकार है. अशोक खुश थे, लेकिन देवी ने कहा कि मैं कुछ कहना चाहती हूं…

अशोक ने आज्ञा दी और देवी ने कहा कि मैं एक शाक्यवंशी कन्या हूं और बौध धर्म की अनुयायी. आप युद्ध करते हैं और मैं अहिंसा की पुजारिन हूं. आप राज्य पर शासन करते हैं और मेरा विश्वास आम लोगों के ह्दय में जगह बनाने में है.

मैं शांत हूं और आप चंचल, हम दोनों ही दो किनारों की तरह एक दूसरे से बिल्कुल विपरीत हैं.

अशोक ने जवाब दिया कि विवाह के बाद तुम मेरी पत्नी बनोगी और राज्य की महारानी. लोगों के दिलों में तुम्हारे लिए प्रेम और आदर होगा. देवी मुस्कुराई और बोलीं कि मैं केवल आप की पत्नी बनकर ही संतुष्ट हूं. लोग मुझे महारानी समझकर आदर दें, मेरी ऐसी कोई आशा नहीं है.

अशोक बोले कि मैं जानता हूं, तुम्हारा चिंतन भगवान बौद्ध के प्रति अनुरक्त है. हम तुम्हें वचन देते हैं कि कभी भी तुम्हें तुम्हारे मार्ग से नहीं हटाएंगे या तुम्हारे चिंतन में दखल नहीं करेंगे, बल्कि तुम्हारे चिंतन से खुद को भी एकाकार कर लेंगे.

तुम महारानी बनकर शासन नहीं करना चाहती तो हम तुम पर आजीवन कोई दवाब नहीं बनाएंगे. इतना सुनकर देवी अशोक के चरणों में गिर पड़ीं और उनकी आंखों से इस समर्पित प्रेम के लिए अश्रु टपकने लगे.

Wedding of Ashoka and Maharani Devi. (Representative Pic: colorstv)

आजीवन मायके में रहीं देवी

अशोक और देवी ने एक-दूसरे को स्वीकार कर लिया था. अगली सुबह अशोक ने देवदत्त से उनकी पुत्री का हाथ मांगा. ये सुनकर पिता की आंखों में आंसू आ गए और उन्होंने सहर्ष इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया. अशोक के विवाह होने की सूचना उज्जयनी पहुंची और पूरे विदिशा व उज्जयनी को फूलों और दीपों से सजा दिया गया.

तमाम गण्यमान्य लोगों के बीच देवी और अशोक विवाह बंधन में बंध गए.

आमतौर पर बेटियां मायके से विदा होकर अपनी ससुराल जाती हैं, लेकिन देवी की विदाई नहीं हुई. विवाह के बाद आजीवन वह अपने पिता के घर रहीं. अशोक कुछ समय तक देवी के साथ ही रहे, लेकिन उज्जयनी में बिंदुसार का स्वास्थ्य ज्यादा खराब हो रहा था.

ऐसे में राज्य को जिम्मेदार राजकुमार की आवश्यकता थी. हालांकि, उज्जयनी में अशोक का बड़ा सौतेला भाई सुसीम उपस्थित था, लेकिन मंत्रिमंडल को केवल अशोक पर विश्वास था.

अशोक ने देवी से विदा ली और वे उज्जयनी लौट आए. राज्य और शासन की जिम्मेदारियों के बीच उन्होंने देवी को सदैव सम्मान दिया. वे उनसे मिलने विदिशा आया करते थे. एक साल बाद देवी ने पुत्र महेंन्द्र को जन्म दिया.

बिंदुसार की मृत्यु के बाद अशोक सम्राट बनेे और इसके बाद ही उन्हें कन्या के रूप में संघमित्रा मिली.  दोनों बच्चे अपनी मां की छांव में पले, इसलिए उनमें हिंसा का कोई गुण नहीं था. उनमें बौद्ध के उपदेशों का असर साफ देखा जा सकता था.

इतिहास में अशोक की अन्य पत्नियों का भी जिक्र है. कहा जाता है कि शासन करने के दौरान उन्होंने अन्य विवाह भी किए. वह बात और है कि जो प्रेम उनके मन मेें देवी के लिए था वह कभी किसी अन्य के लिए नहीं रहा.

Maharani Devi. (Representative Pic: colorstv)

शायद यही कारण है कि कलिंग के युद्ध में लाखों लोगों को अपनी आंखों के सामने मरते देखने के बाद अशोक का ह्दय परिवर्तन हुआ और उन्होंने अंत में बौद्ध धर्म स्वीकार करते हुए अहिंसा का मार्ग अपना लिया.

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Web Title: Love Story of Chakravartin Samrat Ashoka, Hindi Article

Representative Featured Image Credit: Voot