सितम्बर 1965 में भारत-पाकिस्तान के बीच लड़े गए युद्ध की यादें आज भी लोगों के जहन में ताजा हैं. खासकर उन लोगों के जिन्होंने इस युद्ध में अपने घर के चिरागों को खो दिया.

इस युद्ध में वीर अब्दुल हमीद, मेजर भूपेंदर सिंह, हवलदार जस्सा सिंह, मेजर जनरल सलीम क्लेब, लेफ्टीनेंट कर्नल एबी तारापोर, लेफ्टिनेंट जनरल हनुत सिंह, रंजीत सिंह दयाल और जनरल हरबख्श सिंह जैसे कई भारतीय वीर सपूत जाबांजी से लड़ते हुए अपने वतन पर न्यौछावर हो गए.

इसी कड़ी में ‘आसा राम त्यागी’ एक खास नाम है!

21 सितंबर 1965 को डोगरई की जमीन पर उन्होंने गोलियों से छलनी होने के बावजूद, जिस तरह शौर्यता से पाकिस्तानी टैंकों को नेस्तनाबूत किया, वह कल्पना से परे लगता है.

तो आईये इस अमर सपूत के पराक्रम की पूरी कहानी जानने की कोशिश करते हैं–

यूपी के एक छोटे से गांव में खोली आंखें

02 जनवरी 1939 को यूपी स्थित गाजियाबाद जिले के फतेहपुर गांव में रहने वाले सागुवा सिंह त्यागी के घर एक बच्चे की किलकारियां गूंजीं.

नाम रखा गया आसा राम! जश्न के माहौल के साथ गांव के लोग सागुवा सिंह को बधाई पे बधाई दिए जा रहे थे. सागुवा सिंह फूल नहीं समा रहे थे.

असल में उनका पहले से ही परशुराम नाम का एक बड़ा बेटा था.  ऐसे में आसा राम का जन्म लेना उनके लेने सोने में सुहागा जैसा ही था. इस खुशनुमा माहौल के साथ आसा राम ने आम बच्चों की तरह बड़ा होना शुरु कर दिया.

छोटी उम्र में ही वह बहुत चुस्त-दुरुस्त थे, इसलिए लोगों ने उनके पिता से कहना शुरु कर दिया था कि सागुवा देखना तुम्हारा यह लड़का बड़ा होकर नाम करेगा. उस समय आसा राम के पिता मुस्कुराते हुए उनका अभिवादन कर देते, किन्तु उन्हें इस बात का इल्म नहीं था कि एक दिन सच में उनका आसा राम पूरी दुनिया में उनका नाम हमेशा के लिए अमर कर देगा.

Major Asa Ram Tyagi (Pic: Honourpoint)

1961 में बने ‘जाट रेजिमेंट’ का हिस्सा

खैर, धीरे-धीरे वक्त बीता आसा राम बड़े होते रहे. इसी बीच उनके मन में सेना का हिस्सा बनाने का विचार आया. चूंकि, दिल और दिमाग में अब सिर्फ सेना की ही तस्वीरें घर चुकी थी, इसलिए आसा राम ने इसे अपना करियर बना लिया.

अपनी कड़ी मेहनत और हुनर के चलते 17 दिसंबर, 1961 को जब उनके कंधे पर प्रतिष्ठित जाट रेजिमेंट के फीते लगे, तो वह यह संदेश देने में कामयाब रहे कि छोटे से गांव में रहने वाले लोग भी सपने देख सकते हैं और उनको पूरा कर सकते हैं. खैर, यह तो आसा राम के नए सफर की शुरुआत भर ही थी. उन्हें बहुत दूर तलक जाना था.

शायद नियति ने उन्हें किसी खास मिशन के लिए ही बनाया था.

नौकरी को 4 साल ही हुए थे कि पाकिस्तान ने 1947 के बाद 1965 में दोबारा से भारत पर हमला कर दिया. उनकी बटालियन को तुरंत दुश्मन को मुंहतोड़ जवाब देने का आदेश मिला. आदेश मिलते ही आसा राम उत्साहित हो उठे.

…जब डोगरई फतेह का मिला जिम्मा!

21 सितंबर 1965 को, 3 जाट रेजिमेंट को पाकिस्तान के डोगरई गांव में दुश्मन की स्थिति पर कब्जा करने का कार्य दिया गया. चुनौती बड़ी थी क्योंकि दुश्मन अच्छी पोजीशन में था. बावजूद इसके आसा राम ने आगे बढ़कर इसे स्वीकार किया और अपने दल के साथ आगे बढ़े.

अपनी योजना के तहत उन्होंने सबसे पहले डोगरई के पूर्वी किनारे पर दुश्मन को धराशाई किया और वहां कब्जा करने में सफल रहे. यह उनके लिए बड़ी सफलता थी. असल में इस पोस्ट पर दुश्मन ने अपना एक टैंक लगा रखा था, जो लगातार भारतीय सेना के लिए काल बना हुआ था.

यह बड़ी सफलता जरूर थी, लेकिन मेजर आसा राम जानते थे कि उनकी मंजिल अभी बहुत दूर है, इसलिए उन्होंने अपने साथियों से आगे की योजना के साथ तेजी से आगे बढ़ने को कहा. जल्द ही वह अपने टारगेट के नजदीक पहुंच गए. वहां उन्होंने जल्दबाजी न दिखाते हुए सबसे पहले दुश्मन की ताकत का आंकलन किया, फिर अपने संसाधनों को ध्यान में रखते हुए उन पर हमला बोल दिया.

The Battle Of Dograi (Pic: BBC)

गोलियों ने किया लहू-लुहान, लेकिन…

दुश्मन उनके दल की हलचल को भांप चुका था. भारतीय सेना को अपने इतनी पास देखकर वह बौखला सा गया. उसने आनन-फानन में मेजर आसा राम के दल पर गोलियां बरसानी शुरु कर दीं.

मेजर आसा राम अपने साथियों के साथ उन्हें मुंहतोड़ जबाव दे रहे थे. इसी बीच दुश्मन की दो गोलियों ने उन्हें लहू-लुहान कर दिया.मेजर के शरीर से खून बह रहा था. उनका आगे बढ़ना मुश्किल लग रहा था, पर उन्होंने हौंसला बनाए रखा. उनके साथी उन्हें बेस कैंप में वापस लौटने की सलाद दे रहे थे, किन्तु वह नहीं माने और आगे बढ़ते रहे.

इसी बीच उन्होंने महसूस किया कि अगर वह दुश्मन के टैंक खत्म कर देते हैं तो वह अपने मिशन को आसानी से पूरा कर लेगे. इसी ख्याल के साथ मेजर अपने हाथों में हथगोले लेकर टैंकों की ओर बढ़ गए. जब तब दुश्मन उन्हें निशाना बना पता उन्होंने उसके दो दुश्मन टैंकों को खत्म कर दिया. इस तरह वह दुश्मन को पीछे धकेलने में सफल रहे.

हालांकि, इस प्रक्रिया के दौरान, मेजर त्यागी को तीन और गोलियां लगी, जिस कारण उनकी हालत खराब होती चली जा रही थी. वह बार-बार बेहोश होते जा रहे थे. अंतत: उनके साथियों ने तय किया गया कि अब उनको बेस कैम्प में पहुंचाया जाएगा.

मरते दम तक याद रहा ‘मिशन’

मिशन को उनके साथियों ने जल्द ही पूरा कर लिया. इस तरह से डोगरई पर भारतीय तिरंगा लहराया और पाकिस्तान ने भारत का दम देखा.

कहते हैं कि बुरी तरह घायल होने के बाद जब मेजर आसा राम को बेस कैंप ले जाया जा रहा था, वह बहुत पीड़ा में थे. वह अपने सीनियर साथी से कह रहे थे कि सर, मैं बचूंगा नहीं. आप मुझे एक गोली मार दीजिए. मैं आपके हाथ से मर जाना चाहता हूँ.

इस पर उनके साथी उनकी हौंसला अफजाई करते और कहते “मेजर तुम्हें कुछ नहीं होगा”.

वे सभी चाहते थे कि मेजर आसाराम ज़िंदा रहें. इसके लिए तमाम प्रयास भी किए गए बावजूद इसके 25 सिंतंबर 1965 को भारतीय सेना का यह जाबांज सिपाही सबकी आंखें नम कर दुनिया से चला गया. बाद में भारत सरकार ने उन्हें उनके अदम्य साहस, वीरता और पराक्रम के लिए महावीर चक्र से सम्मानित किया.

India Win 1965 War (Pic: theindianexpress)

दुश्मन को जीतने वाले मेजर आसा राम भले ही मृत्यु से जीत नहीं सके, लेकिन उनके शौर्यता की कहानी आज भी युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है. कई तो मेजर आसा राम त्यागी को अपना आदर्श तक मानते हैं और उन्हीं की तरह देश सेवा का सपना देखते हैं.

Web Title: Major Asa Ram Tyagi, Hindi Article

Feature Image Credit: thequint