भारत के एक छोटे से गरीब परिवार से सालों पहले एक लड़का आया था जिसकी खूबी ने दुनिया को हिला कर रख दिया था. वह लड़का गणित को बहुत चाहता था और उसकी चाहत ही आगे चलकर उसकी पहचान बनी.

रामानुजन नामक उस लड़के के आने से पहले शून्य के खोजी आर्यभट्ट को ही भारत का सबसे बड़ा गणितज्ञ माना जाता था. हालांकि, जब रामानुजन ने अपनी प्रतिभाएं दिखाई तो आर्यभट के बाद महान भारतीय गणितज्ञों में उनका भी नाम जुड़ गया.

तो चलिए आज आपको बताते हैं रामानुजन के बारे में जिन्होंने गणित पढ़ के बनाई अपनी पहचान–

बचपन में ही शुरू हो गया था ‘गणित का सफ़र’

12 दिसंबर 1887 को कोयंबटूर के ईरोड गांव में जन्मे रामानुजन ने मंदिरों के प्राचीन शहर कुंभकोणम में अपना बचपन जिया. आज तो हम रामानुजन को एक विद्वान के रूप में जानते हैं मगर शुरुआत से ही वह ऐसे नहीं थे. कहते हैं कि बचपन में रामानुजन का सामान्य बौद्धिक विकास नहीं हो पाया था. 3 साल की उम्र तक उनके मुंह से कोई आवाज ही नहीं निकली थी.

हालांकि समय के साथ उनके बौद्धिक विकास में तीव्रता आई और वह भी सामान्य बच्चों की तरह हो गए. जैसे-जैसे रामानुजन बड़े होते गए वैसे-वैसे वह पढ़ाई में अच्छे होते गए. प्राथमिक परीक्षाओं में रामानुजन ने पूरे जिले में उच्च स्थान प्राप्त किया था.

कहते हैं कि रामानुजन गणित में बहुत तेज थे. अंक तो जैसे उनके लिए खिलौने की तरह थे. जोड़-घटा, गुणा-भागा इत्यादि तमाम चीजों को वह इतनी सरलता से करते थे कि सामने वाला देखते ही हैरान हो जाता. रामानुजन के पास जब भी समय होता तो वह गणित सीखते. वह हर दम सवालों को हल करने में ही लगे रहते. सवाल हल हो जाने पर जो खुशी उनके चेहरे पर आती वह कुछ और उन्हें नहीं दे सकती थी.

कहा जा सकता है कि अपनी गणित की यात्रा रामानुजन ने बचपन में ही शुरू कर दी थी.

Mathematics Magician Srinivasa Ramanujan (Representative Pic: 7wallpapers)

15 की उम्र में बनाए ‘गणित के सूत्र’

अपनी 15 साल की उम्र में रामानुजन ने ब्रिटिश गणितज्ञ जॉर्ज शूब्रिज कार की किताब ‘सिनोप्सिस ऑफ एलिमेंट्री रिजल्ट्स इन प्योर एंड एप्लाइड मैथमेटिक्स की एक प्रति प्राप्त की. इस पुस्तक में उच्च गणित के हजारों प्रमेयों का संग्रह था. इन्हें देखकर अपनी प्रतिभा के अनुसार रामानुजन ने अपने प्रमेय और सूत्र बनाए.

अपनी छोटी सी उम्र में ही रामानुजन ने उच्च कोटि का गणितीय ज्ञान अर्जित कर लिया था. उनके अंदर एक गणित के प्रश्नों को हल करने एक जुनून सा छा गया था. वह चाहते थे कि बाकी महान गणितज्ञों की तरह उनके बनाए सूत्र भी दुनिया पढ़ें. वह अपने दिन का ज्यादातर समय गणित के कठिन प्रश्नों, सूत्रों को खोजने में ही व्यतीत करते थे.

कहते हैं कि उनमें गणित के प्रति इतनी जिज्ञासा थी कि वह कई बार तो रातों को उठ-उठ के प्रश्नों को हल करते थे.

रामानुजन गणित में तो अव्वल थे, लेकिन और विषय उनके लिए नीरस थे जिस कारण वह 12वीं कक्षा में दो बार फेल हुए. हालांकि जिस कॉलेज में पढ़ते हुए रामानुजन दो बार फेल हुए बाद में उसका नाम बदलकर अब रामानुजन के नाम पर ही कर दिया गया है.

वक़्त के साथ रामानुजन की गणित पर पकड़ और भी अच्छी होती गई. यह उनकी पहचान बन गया था. लोग उन्हें इसके कारण जानने लगे थे.

Ramanujan Failed Two Times In School (Representative Pic: netflix)

रामानुजन की ‘कैम्ब्रिज यात्रा’

1911 में रामानुजन ने अपना पहला शोध पत्र जर्नल ऑफ द इंडियन मैथमेटिकल सोसायटी में प्रकाशित किया. भारतीय तो रामानुजन के खोज और ज्ञान को पसंद करते थे मगर अंग्रेजों के लिए यह वाहियात था.

उन्हें नहीं लगता था कि कोई भारतीय ऐसी काबिलियत रखता होगा!

यही कारण था कि उनके शुरुआती प्रकाशन ब्रिटिश ने ज्यादा प्रसिद्ध नहीं होने दिए.

सन 1913 में उन्होंने विश्व प्रसिद्ध ब्रिटिश गणितज्ञ में से एक प्रोफेसर गॉडफ्रे हेरॉल्ड हार्डी के साथ पत्राचार शुरू किया. प्रोफेसर हार्डी रामानुजन के संख्या-सिद्धांतों के सूत्र से काफी प्रभावित थे. उन्होंने देखा कि रामानुजन के अंदर काबिलियत का भंडार है और अगर उसे सही रूप से इस्तेमाल किया गया तो वह जरूर बड़ा नाम कमाएंगे.

यही कारण है कि हार्डी ने उन्हें कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में गणित की पढ़ाई करने का निमंत्रण दिया. पूरे विश्व को अपनी गणित की उपलब्धियां दिखाने का इससे अच्छा मौका रामानुजन को नहीं मिल सकता था. बिना कुछ सोचे समझे उन्होंने इस निमंत्रण को पहली बार में ही स्वीकार कर लिया.

सन 1914 में रामानुजन इंग्लैंड की ओर निकल गए.

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय पहुंचकर रामानुजन ने प्रोफेसर हार्डी के साथ मिलकर कई प्रोजेक्ट पर काम शुरू किया. रामानुजन के तेज दिमाग को उन्होंने एक सीधी राह दिखाई. बस फिर इसके बाद गुरु शिष्य की यह जोड़ी हिट हो गई. कई उच्च कोटि के शोध-पत्र दोनों ने मिलकर प्रकाशित किए जिनके लिए रामानुजन को कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय द्वारा बीए की उपाधि भी दी गई.

रामानुजन का कार्यक्षेत्र गणित विषय की हर एक शाखा में था. हार्डी रामानुजन को प्रत्येक अंक का व्यक्तिगत मित्र कहते थे. एक समय प्रोफेसर हार्डी ने अपने कुछ शोध-पत्र रामानुजन को हल करने के लिए दिए. कुछ ही समय बाद रामानुजन शोध पत्रों में पूछे गए सवालों के हल लेकर हार्डी के सामने खड़े हो गए. रामानुजन की रफ़्तार देख एक पल को प्रोफेसर हार्डी भी चौंक गए थे.

यहां तक कि रामानुजन के हल को समझने के लिए प्रोफेसर हार्डी को अपने मित्र गणितज्ञों से सलाह भी लेनी पड़ी. उन्होंने अपने इजाद किए हुए कुछ नए तरीकों से उन सवालों को हल किया था, जो बाद में कई जगह प्रकाशित भी हुए.

Ramanujan Came To Cambridge For Higher Education (Pic: creofire)

‘आध्यात्म’ से था नजदीकी संबंध

राजानुजन के संबंध जितने गणित से थे उतना ही मजबूत रिश्ता उनका आध्यात्म से था. वह कहते थे कि जिस गणितीय समीकरण में भगवान का विचार समाहित नहीं, वह उनके लिए व्यर्थ है. उनके लिए अंक-शास्त्र का अध्ययन अध्यात्म से जुड़ने का एक तरीका था.

रामानुजन के लिए गणित और आध्यात्म में एक समानता थी कि दोनों ही अनन्त की ओर ले जाते हैं. इसलिए संभवत: न तो वह गणित से दूर रह सकते थे और न ही आध्यात्म से. राजानुजन ने कई बार शून्य और अनन्त पर अपने विचारों को भाषण द्वारा प्रकट किया. उनका सदैव यह विचार रहा कि शून्य परमसत्ता का प्रतीक है और अनन्त उस परमसत्ता की विविधता को सुस्पष्ट करता है.

रॉयल सोसाइटी में सबसे कम उम्र के सदस्य

रामानुजन की गणित की काबीलियत देख कर उन्हें लंदन की रॉयल सोसाइटी का फेलो बना दिया गया. ब्रिटिश उपनिवेश में एक अश्वेत व्यक्ति को रॉयल सोसायटी की सदस्यता मिलना बहुत बड़ी गर्व की बात मानी जाती थी. रॉयल सोसाइटी के पूरे इतिहास में रामानुजन सबसे कम उम्र के सदस्य थे.

इसके बाद रामानुजन ट्रिनिटी कॉलेज की फेलोशिप पाने वाले पहले भारतीय भी बने. हालांकि सन 1917 में तपेदिक से संक्रमण के कारण रामानुजन दो साल बाद ही भारत लौट आए. यहां उन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय में पढ़ाया और अपने आखिरी समय में ‘मॉक थीटा फंक्शन’ पर एक उच्च स्तरीय शोध पत्र लिखा, जिसका उपयोग आज चिकित्सा विज्ञान में किया जाता है. इसके अगले ही साल इस महान गाणितज्ञ की युवा आयु में ही मृत्यु हो गई.

अपनी 32 साल की छोटी सी उम्र में रामानुजन ने गणित के विकास में वृहत स्तर का योगदान दिया जो अमूल्य है. जेम्स न्यूमैन की पुस्तक ‘द वर्ल्ड ऑफ मैथमेटिक्स’ में छपी श्रीनिवास रामानुजन की जीवनी ने कितने ही विद्यार्थियों को अपनी ओर आकर्षित किया और न जाने कितने ही आज इन्हीं के बल पर विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं.

रामानुजन की अनसुलझी पहेलियाँ

जहां दुनिया समझती थी, शून्य मतलब नगण्य… कुछ भी नहीं, वहीं भारतीय खोजकर्ताओं ने ये साबित किया कि शून्य मतलब शुरूआत और अनन्त. भारतवासियों ने कई बार और बार-बार साबित किया है कि उनका ज्ञान किसी से कम नहीं, बल्कि सर्वोत्तम है!

इसी कड़ी में भारत में रामानुजन के जन्मदिन 22 दिसंबर को प्रत्येक वर्ष ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ के रूप में मनाया जाता है.

His Theory Later Helped In Understanding The Black Hole (Representative Pic: firstpost)

इंग्लैंड के प्रमुख गणितज्ञ जी एस हार्डी श्रीनिवास रामानुजन को यूलर, गॉस, आर्किमिडीज व न्यूटन जैसे दिग्गजों की श्रेणी का ही मानते थे. 32 साल के अल्पजीवन में रामानुजन ने कई प्रमेय लिखीं और जिनका प्रकाशन इनकी मृत्यु के बाद हुआ जिसमें से ज्यादातर प्रमेयों को दशकों तक कोई सुलझा नहीं पाया.

एक सदी बाद आज इन सूत्रों का इस्तेमाल ब्लैक होल के व्यवहार को समझने के लिए किया जा रहा है.

आप क्या कहेंगे इस महान गणितज्ञ के बारे में, कमेन्ट बॉक्स में अपने विचार बताएं!

Web Title: Mathematics Magician Srinivasa Ramanujan, Hindi Article

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