भारतीय इतिहास में कई नाम ऐसे हैं, जिनकी गद्दारी के किस्से बहुत मशहूर हैं. कहा जाता कि अगर इन देशद्रोहियों ने अंग्रेजों का साथ न दिया होता, तो देश बहुत पहले आजाद हो गया होता. ये शासक देश का नमक खाकर अपने निजी स्वार्थ और घटिया राजनीति के लिए हमेशा अंग्रेजों की मदद करते रहे और लोग गुलामी का दंश झेलते रहे. मीर जाफ़र का नाम इस सूची में सबसे ऊपर आता है, इसलिए आईये आज बात करते हैं, मीर जाफ़र की:

बंगाल पर मुगलों के राज का दौर था. अलीवर्दी खान उस समय के नवाब हुआ करते थे. ठीक-ठाक तरीके से वह अपना राज्य चलाने की कोशिश में जुटे हुए थे. इसी दौरान अरब में पैदा हुए मीर जाफ़र के कदम भारत पर पड़े. वह एक सैलानी बनकर भारत आया था. असल में उसने भारत के बारे में बहुत सुना था, इसलिए वह इसे नजदीक से देखना चाहता था. माना जाता है कि अपने भ्रमण के दौरान वह बंगाल को देखकर मुग्ध हो गया था. यही कारण था कि उसने बंगाल में रहने का मन बना लिया था. हालांकि, यह आसान नहीं था. उसे अलीवर्दी के रुप में एक बड़ी चुनौती का सामना करना था. जाफ़र लड़कर तो बंगाल पर कब्जा नहीं कर सकता था, इसलिए उसने धैर्य रखते हुए सही वक्त आने का इंतजार किया और अलीवर्दी से नजदीकियां बढ़ानी शुरु कर दी.

मीर जाफ़र लोगों को जल्द अपनी ओर आकर्षित करने में माहिर था. देखते ही देखते वह अलीवर्दी का भरोसा जीतने में कामयाब रहा और सेना का हिस्सा बनने में भी सफल रहा. यही नहीं उसने तेजी से बढ़ते हुए सेना पर अपनी पकड़ बना ली. उसे बंगाल की सेना का सेनापति नियुक्त कर दिया गया. उसकी किस्मत उसके साथ थी. एक घटना में उसने अपनी जान पर खेलते हुए बंगाल के नवाब साहब के भांजे की जान क्या बचाई वह स्टार बन गया. क्या राजा, क्या सिपाही सब उसके मुरीद हो गए.

Lord Robert Clive meeting Mir Jafar after the Battle of Plassey (Pic: pinterest.com)

जाफ़र अपने मंसूबों के तहत तेजी से बढ़ रहा था. बंगाल का नवाब बनने का सपना उसे नजदीक दिखाई देने लगा था. तभी कुछ ऐसा हुआ कि वह धड़ाम हुआ. असल में मुगलों और मराठाओं के बीच उस समय सम्बन्ध अच्छे नहीं थे. अक्सर दोनों के बीच युद्ध होते रहते थे. इसी कड़ी में जाफ़र को अलीवर्दी की तरफ से मेदिनीपुर में मराठाओं की सेना का सामना करना पड़ा था.

अति उत्साह में जाफ़र एक छोटी सी टुकड़ी के साथ लड़ने के लिए पहुंच गया था. उसे अंदाजा नहीं था कि मराठाओं की सेना इतनी बड़ी होगी. उसके पास दो विकल्प थे. पहला यह कि वह योद्धा की तरह मराठा सेना से युद्ध करे और दूसरा यह कि वह वहां से भाग निकले. एक सेनापति होने के नाते उसे पहला रास्ता चुनना चाहिए था, लेकिन मृत्यु के डर से वह वहां से कायरों की तरह भाग निकला. उसे बंगाल का नवाब जो बनना था. इसके लिए उसका जीवित रहना जरुरी था.

जाफ़र की कायरता का यह किस्सा इतनी तेजी से फैला कि अलीवर्दी तक पहुंच गया. अलीवर्दी इस हरकत पर बहुत नाराज थे. उनका भरोसा जाफर पर से टूट रहा था. उन्होंंने जाफर को जमकर लताड़ा. जाफ़र अंदर ही अदंर अलीवर्दी को अपने रास्ते से हटाने की सोचने लगा. इसके लिए उसने अताउल्लाह से हाथ मिला लिया, जो अलीवर्दी से दुश्मनी रखता था.

दोनों ने मिलकर नवाब अलीवर्दी के खिलाफ एक साजिश रची. ताकि जाफ़र बंगाल का नवाब बन सके. उनकी साजिश कामयाब होती इससे पहले ही इसकी खबर अलीवर्दी को हो गई. उन्होंने देर न करते हुए एक झटके में जाफ़र को अपनी सल्तनत से बाहर निकाल दिया. जाफ़र अब पागल हो रहा था. उसे सूझ नहीं रहा था, कि वह क्या करे! उसे अपना सपना टूटता हुआ दिख रहा था. मरता क्या न करता उसने दिल पर पत्थर रखा और कुछ दिन शांत रहते हुए सही मौके का इंताजार करना शुरु कर दिया.

कुछ ही समय बाद अलीवर्दी की मौत हो गई और उनके पोते सिराजुद्दौला ने बंगाल के नवाब की गद्दी संभाली. जाफ़र को इसी मौके की तलाश थी. वह जानता था कि सिराजुद्दौला अभी नये हैं, इसलिए उनके पास अनुभव की कमी है. ऐसे में वह बंगाल पर कब्जा कर सकता था. इसी सोच के साथ उसने बंगाल के एक व्यक्ति की मदद से सिराजुद्दौला को रास्ते से हटाने की साजिश रची. हालांकि, वह इसमें सफल नहीं हो सका. जाफर के लिए अच्छी बात तो यह थी कि इस बार वह पकड़ा नहीं गया था. बार-बार की नाकामी से जाफ़र परेशान हो चुका था. इसलिए वह कुछ बड़ा करने की सोच रहा था.

Mir Jafar Alliance With British (Pic: wiki)

इसी काल में अंग्रेज भी अपनी जड़े धीरे-धीरे भारत में फैला रहे थे. उन्हें जाफ़र जैसे गद्दारों की जरुरत थी, क्योंकि ऐसे लोग उनके लिए मददगार थे. वह जाफ़र की महत्वाकांक्षा को भांप चुके थे. उन्होंने मीर के सामने एक ऐसा प्रस्ताव रखा, जिसके लिए वह किसी हालत में मना नहीं कर सकता था. प्रस्ताव यह था कि अगर वह अंग्रेजों के साथ मिलकर सिराजुद्दौला को हराने में मदद करते हैं तो उन्हें बंगाल का नवाब बना दिया जायेगा. चूंकि यह जाफ़र का सपना था, वह इसे किसी भी कीमत पर पूरा करना चाहता था. उसने बिना कुछ सोचे अपनी सहमति दर्ज करा दी.

जाफ़र और अंग्रेजों की इस दोस्ती ने जन्म दिया प्लासी के युद्ध को. बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला उस समय मुर्शिदाबाद में थे. उन्हें पता था कि ब्रिटिश सेना कभी भी उन पर हमला कर सकती है. वह अपनी सेना के साथ चौकन्ने थे. जंग का आगाज कभी भी हो सकता था. उन्हें अपनी सेना पर पूरा विश्वास था. पर वह इस बात से अनजान थे कि जाफ़र का दबदबा अभी भी उनकी सेना पर बना हुआ था.

उन्हें लगा था मुग़ल होने की वजह से मीर उनका साथ देंगे, लेकिन सच कुछ और था. आखिरकार अंग्रेजों की सेना ने हमला कर दिया और शुरु हो गया प्लासी का युद्ध. सिराजुद्दौला पूरी ताकत के साथ मोर्चे पर डटे हुए थे. उनके सैनिक अंग्रेजी सेना पर भारी पड़ रहे थे. सब कुछ ठीक चल रहा था. लग रहा था कि अंग्रेज हार जायेंगे. तभी ऐन मौके पर जाफ़र ने सेना को आगे बढ़ने से मना कर दिया. नतीजन सिराजुद्दौल जीतते-जीतते हार गये.

इस युद्ध के बाद जाफ़र बंगाल का नवाब बनने में सफल रहा. वह इस बात से अनजान था कि वह अंग्रेजों की कठपुतली भर था. अंग्रेजों ने उसका सहारा लेकर भारत पर कब्ज़ा करना तेजी से शुरु कर दिया. यही नहीं लोगों पर अंग्रेजों ने जुल्म करने शुरु कर दिए थे. जब तक जाफ़र को इस बात का एहसास हुआ कि वह अंग्रेजोंं का पूरी तरह से गुलाम बन चुका था. वह चाहकर भी कुछ नहीं कर सकता था. सभी लोग उससे नफरत करने लगे थे. उसे सबसे बड़ा गद्दार कहा जाने लगा था. अंतत: इस बोझ के साथ वह मौत को प्राप्त हुआ.

 Battel Of Plassey (Pic: pinterest.com)

यह थी मीर जाफ़र की कहानी जिसकी वजह से हमारा देश लम्बे वक़्त तक गुलाम रहा. बंगाल का नवाब बनने की महत्वाकांक्षा और अपने स्वार्थों ने सिराजुद्दौला जैसे शासक को अंग्रेजो के हाथों मरवा दिया और देश को गुलामी की बेड़ी में बंधे रहने पर मजबूर कर दिया था. जाफ़र जैसे शासकों को भारत के लोग कभी माफ नहीं कर सकते.

Web Title: Mir Jafar Biggest Traitor Of India, Hindi Article

Keywords: Mir Jafar, Mughal, Muslim, Islam, Bengal, Battel, Battel Of Plassey, History, British, East India Company, Nawab Of Bengal, Traitor, Throne, Rise Of British In India, Nimak Haram Deuri

Featured image credit / Facebook open graph: Edurite