राणा उनको विष देकर मार डालना चाहता था, सारा राजपरिवार उनसे घृणा करने लगा था, क्योंकि वे दिन रात मंजीरा लिए कृष्ण भक्ति मेँ लीन रहतीं. न परिवार की सुध और न ही समाज से कोई लेना देना.

सारा सांसारिक सुख त्यागकर, उन्होंने खुद को कृष्ण की भक्ति में लीन कर लिया था.

राजपरिवार में पैदा ये सन्यासिनी थीं, मध्यकाल की महान कवियित्री और भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त मीराबाई.

कौन थीं मीराबाई और कैसा था इनका कृष्ण प्रेम, आइए जानते हैं –

मेड़ता राजा रतन सिंह के घर लिया जन्म

सन् 1498 ईस्वी का समय था और इस समय राजस्थान के पश्चिमी इलाके में मेड़ता राजघराने के राठोड़ वंशीय शासक दुदा राय के चौथे पुत्र रतन सिंह के घर एक बालिका की किलकारी गूंजी. चूंकि, यह वंश बैष्णव संप्रदाय को मानने वाला था, इसलिए बालिका का नाम रखा गया मीरा.

मीरा लगभग सात साल की रही होंगी, जब उनके घर एक साधु आए. राजा रतन सिंह ने उनका य़थोचित आदर सत्कार किया और बदले में साधु भगवान कृष्ण की एक मूर्ति रतन सिंह को आशीर्वाद के तौर पर दे गए.

जब अवोध मीरा ने मूर्ति देखी तो अपने पिता से उस मूर्ति की मांग कर दी.

पिता रतन सिंह ने यह सोचकर की एक छोटी सी बच्ची मूर्ति को ढंग से नहीं रख पाएगी, उन्होंने इसे देने से मना कर दिया, लेकिन मीरा भी हठी थीं, उन्होंने खाना छोड़ दिया और तब तक भूखी रहीं, जब तक कि उन्हें वो मूर्ति वापस न मिल गई.

Biography of Mirabai. (Pic: Society Study Women Philosophers)

..और कृष्ण को मान बैठीं पति

एक बार की बात है, जब बालिका मीरा महल में खेल रही थीं. उसी समय उनके कानों में संगीत की आवाज आई. मीरा भागकर महल के प्रासाद पर गईं और झरोखे से बाहर झांकने लगीं. रास्ते से एक बारात गुजर रही थी, उन्होंने सेविकाओं से इसके बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि ये लोग शादी के लिए जा रहे हैं, डोली में वर-वधु हैं.

अवोध मीरा को क्या पता था कि पति होना क्या होता है और शादी क्या होती है, लेकिन मीरा के मन में कुछ उत्सुकता जागी और वो भागते हुए अपनी माँ के पास आईं.

माँ से पूछा, “माँ बताओ ना मेरा वर कौन है..?”

मीरा के मासूम सवाल पर उनकी माँ खिलखिला उठीं और उसका हाथ पकड़कर पूजा घर में ले गईं. माँ ने अपनी ऊंगली से भगवान कृष्ण की मूर्ति की ओर इशारा करते हुए कहा, “देख ये रहा तेरा वर.” ये कहते हुए माँ को बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि उनकी छोटी सी बेटी इस बात को सच ही मान लेगी और कृष्ण पर अपना सर्वस्व नौछावर कर जोगिन बन जाएगी.

Lord Krishna with Mirabai. (Pic: Poet’s Corner)

जब सर से उठा माता पिता का साया

मीरा बड़ी हुईं और महज आठ साल की उम्र में उनके पिता का देहांत हो गया. कुछ दिनों बाद माँ भी चल बसीं. अब उनके पालन पोषण की पूरी जिम्मेदारी उनके दादा रायदादु पर आ गई. उन्होंने मीरा का लालन पालन अच्छे से किया. साथ ही उन्हें काव्य संगीत सहित अन्य शिल्पकला की शिक्षा दिलाई.

चूंकि मीरा धीरे-धीरे बड़ी हो रही थीं, इसलिए परिवार वालों को उनके विवाह की चिंता सताने लगी थीं, लेकिन जब भी विवाह की बात होती तो मीरा कहती कि उनका विवाह तो भगवान श्रीकृष्ण से हो चुका है. घर वाले उनकी बात को लड़कपन समझकर टाल देते, लेकिन मीरा के लिए ये मजाक नहीं था.

इस दौरान मीरा कृष्ण परंपरा व उनके उपदेशों से अच्छी तरीके से परिचित हो चुकी थीं और वह कृष्ण भक्ति में अपने आपको रमाने लगीं

राजा भोजराज से हो गई शादी

सन् 1516 में मीरा की शादी चित्तौड़ के राणा सांगा के सबसे बड़े बेटे युवराज भोजराज के साथ हो गई. विवाह होने के बाद भी मीरा की भक्ति में कोई कमी नहीं आई. वो पहले की तरह ही कृष्ण प्रेम में दीवानी बनी रहीं.

हालांकि, उन्होंने अपने पति धर्म का बखूबी पालन किया. किन्तु वह शाम का समय अपने प्रभु, प्रेमी कृष्ण को याद करने में बिताने लगीं. वह कृष्ण को याद कर भजन गातीं और गायन करतीं. श्री कृष्ण की भक्ति में भजन गाते हुए अक्सर वह सांसारिक दुनिया को भूल जातीं और परमानंद में खो जातीं.

युवराज भोजराज ने मीरा को सांसारिक जीवन में लाने का बहुत प्रयत्न किया, लेकिन मीरा को विरक्त करने में कोई सफलता हासिल नहीं हुई.

अब तक भोजराज समझ चुके थे कि मीराबाई को वैभव की ओर नहीं लाया जा सकता. भोजराज ने मीराबाई को सलाह दी कि तुम्हें कुछ रचना करनी चाहिए. उनकी सलाह को मानकर मीरा ने लिखना शुरू कर दिया. जल्द ही उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई.

दौड़ा-दौड़ा आया अकबर

मीरा की लेखनी और उनके गायन कला के चर्चे दूर-दूर तक फैल गए थे. एक दिन अकबर को कृष्ण भक्त मीरा के बारे पता चला. अकबर की रूचि विभिन्न धर्मों के विषय में थी, इसलिए अकबर को तीव्र इच्छा हुई कि वो मीराबाई से मिलें, लेकिन मेवाड़ और मुगल सल्तनत के बीच चली आ रही दुश्मनी इसमें बड़ी अड़चन पैदा कर रही थी.

आखिरकार अकबर ने एक रास्ता निकाला और भिखारी का वेश बना कर तानसेन के साथ मीरा से मिलने दौड़ा-दाैड़ा आ पहुंचा. जब मीरा ने अपनी रचना उसे सुनाई तो वह इतना खुश हुआ कि अपना कंठाहार निकालकर मीरा के चरणों में रख दिया, लेकिन भोजराज को जब इस बात का पता चला तो वह बहुत कोधित हुए और उन्होंने मीरा को जलसमाधि लेकर मौत स्वीकार करने को आदेश दे दिया.

मीराबाई ने ये आदेश खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया और वह पानी में छलांग लगाने जा ही रही थीं कि, उसी समय किसी अदृश्य शक्ति ने उनको रोक लिया. इसके बाद अपने कुछ अनुयायियों के साथ मीराबाई मेवाड़ छोड़कर वृन्दावन चली गईं.

हालांकि, भोजराज को अपनी अपनी गलती को अहसास हुआ और वह मीराबाई को वापस बुला लाए, लेकिन उनका परिवार फिर भी उन्हें स्वीकार करने को राजी नहीं था.

Akbar was determined to see Mirabai. (Pic: ThoughtCo)

भोजराज की मौत और…

1579 ईस्वी में मुगलों से एक युद्ध के दौरान युवराज भोजराज की मृत्यु हो गई!

अब मीराबाई बिल्कुल अकेली पड़ गईं. क्योंकि उनके पति ही थे, जो उन्हें सांसारिक आलोक विरक्त न करते और उनका पूरा साथ देते थे. इस लिहाज से उन्होंने अपना एक अहम साथी खो दिया था.

अपने बेटे की मौत का समाचार पाकर राणा सांगा ने उन्हें सती होने का आदेश दिया, लेकिन मीराबाई ने इस आदेश को ठुकरा दिया और कहा, “मेरा पति कृष्ण अभी भी जिंदा है, तो मै सती क्यों होऊं.”

पति की मौत के बाद मीरा अध्यात्म में और भी ज्यादा रम गईं. उनका ज्यादातर वक्त कृष्ण भक्ति में व्यतीत होने लगा. मीराबाई घंटों मंदिर में बैठी रहतीं और भजन गाती. उन्हें सुनने दूर-दूर से लोगों की भीड़ जुटने लगी, लेकिन परिवार वालों को ये सब कुछ रास नहीं आ रहा था.

परिवार वालों ने उनको समझाने की बहुत कोशिश की लेकिन, जब मीरा नहीं मानीं तो उनको विष दे दिया गया. हालाांकि, कहा जाता है कि उन पर विष का कोई असर नहीं हुआ.

इसके बाद भी कई बार मीरा को मारने का प्रयास किया गया, लेकिन सारे प्रयास असफल रहे और थक हारकर मीरा सारे भव बंधनों को त्याग कर दोबार से वृंदावन की कुंज गलियों में लौट गईं.

Mirabai drank the poison, but remained unharmed. (Pic: pinterest)

वृंदावन में मीरा घूम-घूमकर कृष्ण भजन गाने लगीं और भजन रचना भी करने लगीं.

कहा जाता है कि मीराबाई ने तकरीबन 5000 कविताओं और भक्ति गीतों की रचना की थी. हालांकि, आज इनमें से केवल 800 रचनाओं के बारे में ही पुख्ता तौर पर जानकारी मिलती है.

अपने आखिर दिनों में मीराबाई द्वारका चली गईं और वहीं कृष्ण भक्ति में अपना सर्वस्व त्याग करते हुए 1547 ई. को सदा के लिए अपने गिरधारी की शरण में गोलोकधाम चली गईं.

Web Title: Mirabai, A Great Devotee of Sri Krishna, Hindi Article

Featured Image Credit: rajora