चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ या थलसेना प्रमुख का पद भारतीय थल सेना में सबसे ऊंचा पद होता है. इस पद पर केवल जनरल पद वाला एक चार स्टार अधिकारी ही बैठ सकता है. भारत में चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ का कार्यालय कमांडर्स इन चीफ एक्ट द्वारा संसद में सन 1955 को सृजित किया गया. इससे पहले थल सेना प्रमुख का पद कमांडर इन चीफ का होता था.

भारत की आजादी से लेकर आज तक कई महत्वपूर्ण सैन्य अधिकारियों ने इस पद पर अपनी सेवाएं दी हैं. जिन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान अपने मज़बूत फैसलों से सेना को ताक़त देने में अहम भूमिका निभाई. आज हम ऐसे ही कुछ लोकप्रिय थल सेनाध्यक्षों की बात करेंगे.

तो आइये जानते हैं भारतीय थल सेनाध्यक्षों के बारे में–

फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा

भारत को आजादी मिलने के बाद फील्ड मार्शल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा को 16 जनवरी 1949 को भारतीय थल सेना का पहला कमांडर इन चीफ बनाया गया था. के. एम. करिअप्पा ‘किप्पर’ नाम से काफी मशहूर रहे. इन्हें 1948 को आर्मी कमांडर बनाया गया, जबकि इससे पहले ये लेफ्टिनेंट जनरल पद पर तैनात थे. हालांकि इसी बीच इन्होंने 1949-1959 तक राजपूत रेजीमेंट के लिए कर्नल के तौर भी सेवाएं दीं.

वहीं फील्ड मार्शल करिअप्पा इंपीरियल डिफेंस कॉलेज, केंबेरले, यूके में ट्रेनिंग कोर्स के लिए चुने गए पहले भारतीय थे. सन 28 अप्रैल 1986 ई. को भारत के राष्ट्रपति द्वारा जनरल कोडंडेरा मडप्पा करिअप्पा को फील्ड मार्शल रैंक पर सम्मानित किया गया. फील्ड मार्शल भारतीय थल सेना की सबसे ऊंची पांच सितारा रैंक होती है. इस पद पर आसीन कोई भी सैन्य अधिकारी आजीवन रहता है और कभी रिटायर नहीं होता.

28 जनवरी 1899 को ब्रिटिश उपनिवेश भारत में कर्नाटक में एक अधिकारी के घर जन्मे फील्ड मार्शल करिअप्पा ने द्वितीय विश्व युद्ध में भी भाग लिया था, जहां इन्होंने जापानियों के खिलाफ लड़ाई लड़ी और इसमें अपनी प्रशंसनीय वीरता और शौर्य के लिए ‘ऑर्डर ऑफ ब्रिटिश एम्पायर’ पदक से सम्मानित किए गए. इसके बाद भारत-पाकिस्तान में आजादी की लड़ाई के दौरान भी इन्होंने पश्चिमी सीमा पर मोर्चा संभाला था.

Field Marshal Kodandera Madappa Cariappa with C Rajagopalachari. (Pic: aviation-defence)

जनरल महाराज श्री राजेंद्र सिंहजी जडेजा

जनरल महाराज श्री राजेंद्र सिंहजी जडेजा को चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ पद की स्थापना होने के बाद भारतीय सेना का पहला थलसेना प्रमुख होने का गौरव प्राप्त है. जी हां, जनरल महाराज श्री राजेंद्र सिंहजी जडेजा दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी फौज इंडियन आर्मी के पहले चीफ थे. ब्रिटिश काल के दौरान आर्मी में भर्ती होने वाले महाराज राजेंद्र ने साल 1921 में सेकेंड लेफ्टिनेंट के पद पर भारतीय सेना की सेकेंड लेंसर यूनिट में कमीशन प्राप्त किया था.

अपने कार्यकाल के दौरान इन्होंने दूसरे विश्व युद्ध में विदेशों में जाकर शांति मोर्चा संभाला था. इनके सराहनीय कार्य के लिए इन्हें विशिष्ट सेवा-पदक से सम्मानित किया गया. वहीं इन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रूमेन द्वारा अमेरिकन लीजन ऑफ़ मेरिट पदक से सम्मानित किया जा चुका है.

भारत की आजादी के बाद अपने पद से रिटायरमेंट से ठीक एक माह पहले ही एक अप्रैल 1955 को इन्हें थल सेना का अध्यक्ष बना दिया गया. हालांकि इसी साल 14 मई को यह आर्मी चीफ के पद से रिटायर हो गए. वहीं सन 1964 को 65 साल की उम्र में इनकी मौत हो गई.

General Maharaj Sri Rajendrasinhji Jadeja. (Pic: feedram)

फील्ड मार्शल सेम मानेकशॉ

“अगर कोई आदमी ये कहे कि उसे मौत से डर नहीं लगता, तब या तो वह झूठ बोल रहा होता है, या फिर वह एक गोरखा है.”

ये कहना है भारतीय थल सेना के दूसरे फील्ड मार्शल सेम होर्मसजी फ्रामजी जमशेदजी मानेकशॉ, एम.सी. का.

1971 के भारत- पाकिस्तान युद्ध के दौरान भारतीय थल सेना को लीड करने वाले जांबाज सेम मानेकशॉ खुद गोरखा रेजिमेंट से ही थे. माना जाता है कि गोरखा रेजिमेंट को भारतीय सेना की सबसे घातक रेजिमेंट बनाने के पीछे सेम मानेकशॉ का अहम योगदान रहा है.

आपको जानकर हैरानी होगी कि भारतीय सेना अकादमी के पहले बैच में चुने गए 40 कैडेट में से सेम मानेकशॉ भी एक थे. सेम मानेकशॉ वीरता और शौर्य के प्रतीक माने जाते हैं. जापानियों के खिलाफ युद्ध में अनन्य वीरता और असाधारण नेतृत्व दिखाने के लिए इन्हें मिलिट्री क्रॉस (एमसी) से सम्मानित किया गया. वहीं इन्हें भारतीय सेना में अमूल्य योगदान देने के लिए 1968 को प्रतिष्ठित पद्म भूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया था.

जनवरी 1973 को इन्हें भारत के राष्ट्रपति द्वारा फील्ड मार्शल बनाया गया. सेम मानेकशॉ फील्ड मार्शल के पद पर प्रतिष्ठित होने वाले पहले मूल भारतीय अधिकारी हैं. इनका जन्म एक पारसी परिवार में 3 अप्रैल 1914 को हुआ था. वहीं 74 साल तक भारतीय सेना में अपनी सेवाएं देने के बाद 94 साल की उम्र में 27 जून 2008 को इनका देहांत हो गया.

Field Marshal Sam Hormusji Framji Jamshedji Manekshaw, MC. (Pic: Indiatimes)

जनरल अरुण कुमार श्रीधर वैद्य

27 जनवरी 1926 को जन्मे जनरल अरूण कुमार श्रीधर वैद्य ने साल 1945 में भारतीय सेना में कमीशन प्राप्त किया था.

1965 में इंडो-पाक युद्ध के दौरान खेमकरण सेक्टर में बतौर बख्तरबंद रेजिमेंट में कमांडेंट के पद पर तैनात रहे जनरल अरुण कुमार ने अपनी सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व करते हुए पाकिस्तान की सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. युद्ध में पाकिस्तान सैनिकों को हार की ओर धकेलने के कारण उनकी निडरता और कुशल नेतृत्व क्षमता के लिए भारतीय सेना ने इन्हें महावीर चक्र देकर सम्मानित किया.

भारतीय सेना में असाधारण सेवा के लिए इन्हें सन 1983 को प्रतिष्ठित परम विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित किया गया और इसी साल इन्होंने भारतीय सेना प्रमुख या चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ के रूप में पदभार संभाला. साल 1985 तक वह भारतीय सेना प्रमुख बने रहे. अरूण कुमार को भारतीय सेना के जांबाज सोल्जर के रूप में जाना जाता है. जनरल अरूण कुमार एक अगस्त 1983 से 31 जनवरी 1986 तक सेनाध्यक्ष रहे और अपने इस कार्यकाल के दौरान इन्होंने भारतीय सेना को बुलंदियों की ऊंचाइयों तक पहुंचाया.

अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पर आतंकियों के कब्जे से बचाने के लिए सैन्य ऑपरेशन ‘ब्लू स्टार‘ जनरल वैद्य के सेनाध्यक्ष रहते हुए ही चलाया गया था.

General Arunkumar Shridhar Vaidya. (Pic: Livemint)

जनरल वेद प्रकाश मलिक

जनरल वेद प्रकाश मलिक का जन्म एक नवंबर 1939 को डेरा इस्माइल खान (अब पाकिस्तान में है) में हुआ था. ये जम्मू कश्मीर में इन्फैंट्री ब्रिगेड के कमांडेंट रहे और इसी दौरान इन्हें अति विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित किया गया.

वेद प्रकाश मलिक एक अक्टूबर 1997 को भारतीय सेना के 19वें सेना प्रमुख बने. सेनाध्यक्ष पद पर रहते इन्हें 2 साल भी नहीं हुए थे कि पाकिस्तान ने कारगिल पर हमला कर दिया. इस दौरान इन्होंने ऑपरेशन विजय चलाया और पाकिस्तान को भारतीय सेना के आगे घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया. जनरल मलिक सन 2000 तक सेना प्रमुख के पद पर रहे.

साल 2000 में वेद प्रकाश मलिक को ‘प्राइड ऑफ द नेशन’ पुरस्कार से नवाज़ा गया, वहीं अतुर फाउंडेशन पूना की ओर से इन्हें सन 1999 में ‘एक्सीलेंस इन लीडरशिप’ अवॉर्ड से सम्मानित किया गया.

General Ved Prakash Malik. (Pic: Alchetron)

जनरल विजय कुमार सिंह

जनरल विजय कुमार सिंह के नाम से कौन वाकिफ नहीं है?

अपनी तेज़ तर्रार छवि के कारण इन्हें सबसे लोकप्रिय सेना प्रमुख के तौर पर जाना जाता है. जनरल वी के सिंह 1970 में 2 राजपूत बटालियन में कमीशन हुए थे और 2010 से 2012 तक भारत के सेना प्रमुख रहे. सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद वीके सिंह ने राजनीति का रूख किया और आज वह गाज़ियाबाद से सांसद और वर्तमान केंद्र सरकार में विदेश राज्य मंत्री पद पर आसीन हैं.

जनरल विजय कुमार सिंह स्ट्रैटेजिक स्टडीज में यूएस आर्मी वार कॉलेज से पास आउट हैं और वहां के हॉल आॅफ फेम में भी शामिल हैं. जनरल वीके सिंह का मानना था कि जब तक सेना प्रमुख ही कठोर ट्रेनिंग से नहीं गुज़रेगा तो वह अपने सैनिकों को युद्ध के मैदान में बेहतर करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता.

General Vijay Kumar Singh. (Pic: outlookindia)

सेना प्रमुख बनने से पहले साल 2009 में राष्ट्रपति ने उन्हें सेना के परम विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित किया था. सैन्य परिवार से ताल्लुक रखने वाले जनरल वीके सिंह के पिता भी भारतीय सेना में कर्नल के पद पर रहे हैं.

आप की ‘चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ’ के उपरोक्त जांबाजों के बारे में क्या राय है, अवश्य बताएं!

Web Title: Most Popular Indian Chiefs of the Army Staff, Hindi Article

Featured Image Credit: bmrnewstrack