मध्यप्रदेश की छाती पर सीना ताने उजाड़ बीहड़ों ने ना जाने कितने डकैतों को पनाह दी. इन डकैतों में अधिकांशतः वे आम लोग थे, जिन्हें बर्दाश्त की हद से कहीं ज़्यादा प्रताड़ित किया गया था. ये चीखते रहे, मगर किसी ने इनकी चीखों की पुकार नहीं सुनी.

परिणाम यह निकला कि इनकी बर्दाश्त करने की क्षमता ने जवाब दे दिया!

साथ ही इनके वो कंधे, जो कभी जिम्मेदारियों के बोझ से झुके हुए थे, अब बंदूक लटका कर तन गए. उसके बाद जो खूनी खेल हुआ, उसकी गवाह बनी मध्यप्रदेश की जनता और वीरान बीहड़.

इसी बीहड़ की एक संतान ऐसी भी थी, जिसने अपने जीवन की शुरुआत में तो माँ भारती के नाम का तिरंगा विदेशों में लहराया, लेकिन जिंदगी के आखिरी मोड़ पर उसे भी ये बीहड़ ही नसीब हुए.

बीहड़ की इस संतान का नाम था ‘पान सिंह तोमर!

वही पान सिंह तोमर, जो अपने परिचितों के बीच पाना, सूबेदार और फिर बाग़ी के नाम से जाना गया. वतन के लिए खुद को झोंक देना वाले एक धावक ने जीवन के आखिरी दिन बीहड़ के नाम क्यों कर दिए, इसकी कुछ बातें तो आपने पिछले दिनों आयी फिल्म में देख लिया होगा. इसी कड़ी में आईये, उसके साथ कुछ और जानने की भी कोशिश करते हैं–

पूर्ण ‘समर्पण भाव’ ने दिलाया सम्मान

सन 1932 में मध्यप्रदेश के मुरैना ज़िले के छोटे से गाँव भिदौसा में एक ऐसे बच्चे ने जन्म लिया, जिसके लिए दौड़ना उसकी सबसे पहली मोहब्बत थी.

नाम था पान सिंह तोमर!

उनके गाँव में लोगों की आय का मुख्य स्रोत किसानी ही था. कुल मिलाकर उनके पास दो ही विकल्प थे. पहला यह कि खुद को खेती-किसानी में झोंक दें… और दूसरा यह कि वह सेना में भर्ती हो जाएँ.

इसी के चलते पान सिंह ने सेना को अपना करियर बनाया. जब उन्होंने सेना में भर्ती होने का मन बनाया, तभी से उन्होंने तय कर लिया था कि वह अपने देश भारत के प्रति पूर्ण निष्ठा से काम करेंगे. इसकी एक झलक उनके साक्षात्कार के दौरान दिखी, जब उन्होंने सेना के अधिकारी द्वारा पूछे गए हर सवाल के जवाब में सेना के हर आदेश का पालन करने की बात कही.

पान सिंह ने राजपुताना रायफल्स में सिपाही के रूप में अपने जीवन की शुरुआत की. चूंकि, उनमें बिना थके दौड़ते रहने की प्रतिभा थी, इसलिए उसको अनदेखा नहीं किया गया. उन्हें इसके लिए तैयार किया गया. इस तरह उन्होंने लम्बी बाधा दौड़ के लिए प्रशिक्षण लेना शुरु कर दिया.

इसके बल पर जल्द ही उन्हें सूबेदार की पद पर रुड़की के बंगाल इंजीनियरिंग ग्रुप में तैनात कर दिया गया. फ़ौज के तमाम साथियों के बीच पान सिंह की छवि एक हंसमुख और जिंदादिल इंसान के रूप में थी. फ़ौज में रह कर उन्होंने  सिर्फ न सिर्फ एक सिपाही का फ़र्ज़ निभाया, अपितु एक खिलाड़ी के रूप में राष्ट्रीय तथा अंतराष्ट्रीय सम्मान जीतकर देश का नाम भी रोशन किया.

देश के लिए पान सिंह ने सात राष्ट्रीय पुरस्कार जीते.

इतना ही नहीं 1958 के एशियन खेलों के लिए उन्होंने भारत की अगुवाई भी की.

Paan Singh Tomar as a Soldier (Representative Pic: mystorybook)

…इन ‘परिस्थितियों’ ने बना दिया डकैत!

गरीबी की मार झेल कर आए पान सिंह को उनकी प्रतिभा के दम पर काम, नाम और दाम सब मिल रहा था. इसके साथ देश की सेवा भी हो रही थी. पान सिंह की एक तिहाई उम्र बीतने के कगार पर थी. अब होना तो यह चाहिए था कि पान सिंह को आराम करना चाहिए था. अपने बच्चों की अच्छी शिक्षा के बारे में सोचना चाहिए था, अपने संपर्कों का लाभ उठाते हुए अपने गाँव के लिए कुछ विकास कार्य करने चाहिए थे.

शायद पान सिंह ने ऐसा कुछ सोचा भी हो, लेकिन नियति ने उनके लिए कुछ और ही सोच कर रखा था.

सेना से सेवानिवृत होने के बाद पान सिंह जब अपने गाँव भिदौसा पहुंचे, तब उनके और बाबू सिंह के बीच ज़मीनी विवाद छिड़ गया. पान सिंह के पुरखों ने कभी बाबू सिंह के यहाँ ज़मीन गिरवी रखी थी, जिसे पान सिंह पैसे देकर वापिस लेना चाहते थे, किन्तु बाबू सिंह ने ज़मीन वापिस करने से साफ़ मना कर दिया. विवाद न बढे, इसलिए पान सिंह लड़ाई-झगड़े से दूर रहना चाहते थे.

इस कारण उन्होंने कानून की मदद लेना सही समझा!

कलक्टर साहब की उपस्थिति में पंचायत बुलाई गयी, जहाँ दोनों पक्षों को सुनने के बाद यह फैसला सुनाया गया कि पान सिंह बाबू सिंह को रुपए देकर अपनी ज़मीन वापिस ले लें. हालाँकि, पान सिंह के भतीजे ने इसका विरोध करते हुए अपनी एक शर्त रखी. इसको स्वीकार करते हुए पान सिंह मामले को निपटा ही चुके थे. किन्तु 200 सदस्यों वाले परिवार के मुखिया बाबू सिंह ने एक अडंगा डाल दिया. यही नहीं उन्होंने पान सिंह के बड़े बेटे हनुमंत सिंह को बुरी तरह से पीट दिया.

इसकी शिकायत के लिए पान सिंह स्थानीय थाने पहुंचे तो वहां उनकी अर्जी को दरकिनार कर दिया गया. दूसरी तरफ बाबू सिंह ने उनके परिवार के सदस्यों के ऊपर अचानक से हमला बोल दिया. उन्होंने पान सिंह की 95 वर्षीय माँ तक को बुरी तरह से मारा.

पान सिंह ने घर पहुंचकर यह सब देखा तो वह आग बबूला हो उठे.

Paan Singh a Steeplechase Runner (Representative Pic:  Pandolin)

…और मां के कहने पर कर दी बाबू सिंह की हत्या!

वह कुछ कह पाते इससे पहले उनकी माँ ने गुस्से में उनसे कहा, ‘तू पैदा होते ही मर जाता तो अच्छा होता. सत्तर देशों में दौड़ा है तू और ये देख मेरी पीठ पर उन्होंने कितने बट मारे हैं. मुझे उनकी लाश चाहिए कल सुबह से पहले.

माँ के इन शब्दों ने पान सिंह को डाकू पान सिंह तोमर बना दिया.

अगली सुबह भिंड जिले केअहरौली में पान सिंह ने अपने भाई बलवंत सिंह के साथ मिलकर बाबू सिंह को घेर लिया और उसकी कहानी हमेशा के लिए ख़त्म कर दी.

कहते हैं कि बस यहीं से शुरु हो गया पान सिंह का वो सफ़र, जिसकी पान सिंह ने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

इस घटना के बाद उन्होंने स्थानीय पत्रकार हेमेन्द्र नारायण को अपना साक्षात्कार दिया, जो शायद इसलिए था, ताकि पुलिस उनके मामले की गंभीरता से जाँच करे. साथ ही समझ सके कि उन्होंने जो किया वह आत्मरक्षा के लिए किया. हेमेन्द्र बताते हैं कि उन्हें इस बात का बहुत आश्चर्य था कि जिस डकैत के सर पर 10,000 का इनाम रखा है, उसने उन्हें आराम से बैठाया.

पान सिंह के उस साक्षात्कार को याद करते हुए हेमेन्द्र कहते हैं कि उन्होंने बड़े ही शांत अथवा क्षमाबोद्ध से भरे स्वरों में कहा “मैं उनकी हत्या नहीं करना चाहता था, लेकिन मैं बलवंत को रोक नहीं पाया. उसने अपने पिता मातादीन का बदला लेने के लिए सबको गोली मार दी. आप उसकी भावनाओं को समझ सकते हैं.”

उन्होंने इस साक्षात्कार के दौरान यह अफ़सोस भी जताया कि “जब मैं देश के लिए इनाम जीतता था, तब एक हीरो में रूप में मेरा साक्षात्कार लिया जाता था, किन्तु अब मुझे एक अपराधी की तरह दिखाया जाएगा.”

बहरहाल, 1 अक्तूबर 1981 को वह पुलिस की गोली का शिकार हुए और हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं.

अपनों की यादों में आज भी जिंदा हैं!

पान सिंह के छोटे बेटे सौराम सिंह अपनी 79 वर्षीय माँ के साथ झाँसी जिले के बबीना में रहते हैं. वह सेना से सूबेदार के पद से सेवानिवृत हो चुके हैं. सौराम अपने पिता के बारे में बताते हुए कहते हैं कि “मेरे पिता एक अच्छे और दयालु इंसान थे. उनकी मौत के इतने वर्षों बाद भी वो सेना में सम्मान की नज़र से देखे जाते हैं.

आप आज भी रुड़की म्यूज़ियम में उनकी तस्वीर देख सकते हैं. उन्होंने कभी अपने दुश्मनों के मन को भी ठेस नहीं पहुंचाई.” वहीं उनकी पत्नी कहती हैं कि “जब तक मेरे पति राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी थे, तब तक किसी को उनकी परवाह नहीं थी. मगर जब वह बाग़ी बन गए, तब हर कोई पीछे पड़ गया.”

पान सिंह तोमर के उथल-पुथल भारे जीवन को भारतीय सिनेमा घरों में प्रदर्शित किया जा चुका है. पान सिंह तोमर के नाम से बनी इस फिल्म को तिग्मांशु धुलिया द्वारा निर्देशित किया गया है. हालाँकि, पान सिंह का किरदार निभाना कोई आसान काम नहीं था, किन्तु इरफ़ान खान ने उनके किरदार के साथ पूरी तरह इंसाफ किया.

दर्शकों के बीच यह फिल खूब पसंद की गयी. इस फिल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित भी किया गया.

Irfan Khan in Role of Paan Singh Tomar (Pic : Chaudhuri)

इस लेख का उदेश्य किसी तरह की हिंसा का समर्थन करना कतई नहीं है. पान सिंह द्वारा हत्या अथवा फिरौती के कार्य निश्चय ही दंडनीय थे.

पर यह समझना होगा कि पान सिंह, जिसने देश विदेश में नाम कमाया, उसके हाथों ने बंदूक भी परिस्थितियों के कारण ही पकड़े थे. अगर प्रशासन ने निष्पक्ष रूप से उनकी मदद की होती तो शायद वह एक राष्ट्रीय धावक से बाग़ी कभी नहीं बने होते.

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Web Title: Paan Singh Tomar A Soldier or A Rebel, Hindi Article

Feature Image Credit: Impawards