20वीं शताब्दी का आगाज भारत में वैसे नहीं हुआ था, जैसे दूसरे देशों में हुआ होगा. यहां की फिजा में देश की आजादी के नारे बुलंद हो रहे थे और उन आवाजों को खामोश करने के लिए ब्रिटिश हुकूमत गोली-बारूद का इस्तेमाल कर रही थी.

ऐसे ही समय में बंगाल के एक छोटे से कस्बे में एक बच्ची का जन्म होता है. यह बच्ची आगे जाकर अंग्रेजों के लिए सिर दर्द बनती है और तारीख में पहली बंगालन महिला क्रांतिकारी का खिताब हासिल करती हैं.

यह कहानी है उसी बच्ची की दिलेरी की है, जिन्हें तारीख के किसी सफ्हे के कोने में दर्ज कर लोग भूल चुके हैं.

यह कहानी है प्रीतिलता वादेदार की-

चट्टगांव में हुआ जन्म, टीचर की नौकरी की

उस वक्त बंगाल का विभाजन नहीं हुआ था. मौजूदा बांग्लादेश भी बंगाल का हिस्सा था. इस हिस्से में एक जगह है चट्टगांव.

चट्टगांव की पहचान ऐसी भूमि के रूप में है, जहां से देश की आजादी के लिए सबसे ज्यादा हथियारबंद लड़ाके निकले. चट्टगांव में ही एक छोटा से गांव है ढालघाट. ढालघाट में रहने वाले माली व तालीमी तौर पर एक ठीक-ठाक परिवार में 5 मई 1911 को प्रीतिलता वादेदार का जन्म हुआ. उनके पिता जगतबंधू और माता प्रतिभा यह मानते रहे थे कि तालीम बहुत जरूरी है, इसलिए उन्होंने शुरू से ही यह कोशिश की कि प्रीतिलता को भी अच्छी शिक्षा मिल जाए.

प्रीतिलता भी पढ़ने में तेज थी. उनकी मेधा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पास के स्कूल में उनका दाखिला सीधे तीसरे दर्जे में हुआ था. चूंकि वह पढ़ने में तेज-तर्रार थीं, तो उन्हें स्कॉलरशिप भी मिल गई.

17 साल की उम्र में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास कर ली और आगे की पढ़ाई के लिए ढाका आ गईं. ढाका के कॉलेज से इंटरमीडिएट उत्तीर्ण हुईं. उन्हें पढ़ाई-लिखाई में खूब दिलचस्पी थी इसलिए वह ज्यादा से ज्यादा शिक्षा लेना चाहती थीं.

इंटर करने के बाद उन्होंने अंग्रेजी में स्नातक करने का फैसला लिया और अपने घर से करीब 550 किलोमीटर दूर कलकत्ता (फिलहाल कोलकाता) आ गईं. यहां उन्होंने प्रख्यात बेथुन कॉलेज में दाखिला लिया और स्नातक की डिग्री ली. इस डिग्री के बिना पर उन्हें चट्टगांव के एक स्कूल में प्रधानाध्यापिका की नौकरी मिल गई. मगर, यह नौकरी उन्हें ज्यादा दिनों तक रास नहीं आई.

The Partition Of Bengal (Pic: Feminism )

बचपन से ही ‘मास्टरदा सूर्य सेन’ से प्रभावित थीं

प्रीतिलता ने 10 साल की उम्र में स्कूल में दाखिला लिया था. उससे पहले उनके माता-पिता घर पर ही उन्हें पढ़ाया करते थे.

वह जिस वक्त ककहरा पढ़ रही थीं, उसी वक्त एक शख्स देश की आजादी के लिए आन्दोलन शुरू करने की तैयार कर रहा था. उस शख्स का नाम था सूर्य सेन.  उन्हें प्यार से मास्टरदा (मास्टर साहब) भी कहा जाता था. मास्टरदा हालांकि जब कॉलेज में थे, तभी से देश की आजादी के लिए काम करने लगे थे. उन्होंने ग्रेजुएशन करने के बाद टीचर की नौकरी भी की.

किन्तु, ज्यादा दिनों तक नौकरी नहीं कर सके बल्कि चित्तरंजन दास, शरत चंद्र बोस सरीखे स्वाधीनता संग्रामी के साथ काम करने लगे. लेकिन, तब तक वह गुमनाम ही थे. वह सुर्खियों में तब आए, जब ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों के चलते उन्हें 1926 में गिरफ्तार कर लिया गया. बाद में उन्हें रिहा किया गया.

रिहाई के दौरान ही पहली बार प्रीतिलता ने सूर्य सेन को देखा और उनसे प्रभावित होकर वह भी देश की आजादी में आहुति देने की तैयारी करने लगीं. लेकिन, चुपके-चुपके. प्रीतिलता ने आंदोलनों से जुड़े साहित्य इकट्ठा करना शुरू किया. वह पढ़ाई के साथ ही चुपके-छुपके क्रांतिकारी गतिविधियों में भी हिस्सा लेने लगीं.

Surya Sen (Pic: thebetterindia)

कलकत्ते से करती थीं हथियारों की सप्लाई!

सूर्य सेन ने प्रीतिलता पर गहरा प्रभाव डाला था, जिसका रंग दिनोंदिन चटक ही हो रहा था.

वह जब स्नातक की डिग्री के लिए कलकत्ते के बेथुन कॉलेज में पहुंचीं, तो उनकी गतिविधियां और बढ़ गईं. कलकत्ते में रहते हुए उन्होंने अलीपुर जेल में बंद स्वाधीनता सेना रामकृष्ण विश्वास से कई बार मुलाकात हुई. इन मुलाकातों ने उन्हें भी हथियारबंद आंदोलन की ओर प्रेरित किया. प्रीतिलता चोरी-छिपे चट्टगांव के क्रांतिकारियों को कलकत्ता से हथियार भेजने लगीं.

स्नातक के बाद चट्टगांव में ही उन्हें टीचर की नौकरी मिली, तो यह उनके लिए मांगी मुराद पूरी होने जैसा था. मास्टरदा सूर्य सेन को प्रीतिलता ने बस देखा भर था. कभी मुलाकात नहीं हुई थी. 

चूंकि वह (प्रीतिलता) भी चोरी-छिपे आंदोलन में शामिल थीं और बाद में चट्टगांव भी लौट गईं, तो सूर्य सेन गाहे-ब-गाहे उनका नाम सुना करते थे, लेकिन उन्हें अपने दल में शामिल करने के पक्ष में नहीं थे.

हालांकि, जब सूर्य सेन को देश के प्रति प्रीतिलता के समर्पण अहसास हुआ, तो उन्होंने उन्हें अपने दल में शामिल कर लिया. प्रीतिलता के नेतृत्व में क्रांतिकारियों ने कई दफे अंग्रेजों पर हमले किए और कामयाबी हासिल की.

लेकिन, सबसे बड़ा हमला होना अभी बाकी था.

Arms in Kolkata (Pic: India Today)

फिर हुआ यूरोपियन क्लब पर हमला

जिन दशकों में सूर्य सेन और प्रीतिलता जैसे क्रांतिकारी अंग्रेजों को छका रहे थे, उन्होंने दशकों में चट्टगांव में एक क्लब हुआ करता था, जहां अंग्रेज अफसर अक्सर मौज-मस्ती के लिए जाया करते थे. यह यूरोपियन क्लब पहाड़टोली में स्थित था.

क्लब के बाहर एक बड़ा नोटिस बोर्ड लगा होता था, जिसमें लिखा था, कुत्तों और भारतीयों को आने की इजाजत नहीं है.

यह नोटिस भारतीयों को पीड़ा देती थी. सूर्य सेन ने इसी क्लब पर हमला करने की योजना बनाई. पहली योजना के तहत जो तारीख चुनी गई थी, उस दिन शुक्रवार था और अंग्रेज उस दिन क्लब में नहीं आए थे. इस वजह से योजना विफल हो गई.

दूसरी योजना 23 सितंबर, 1932 की रात की बनाई गई. सूर्य सेन ने इस योजना को अंजाम तक पहुंचाने के लिए प्रीतिलता वादेदार को चुना. प्रीतिलता के साथ 8 पुरुष लड़ाकों की एक टीम भी तैयार की गई. उन्हें हथियार चलाने की ट्रेनिंग दी गई.

‘बेस्ट ऑफ लक! वंदे मातरम!’ कह कर सूर्य सेन ने प्रीतिलता और टीम को अलविदा किया. उन्हें साइनाइड की गोलियां भी दी गईं. रात करीब 10.45 बजे वक्त प्रीतिलता और उनकी टीम के रणबांकुरे क्लब के पास पहुंचे.

टीम तीन हिस्सों में बंट गई और क्लब पर धावा बोल दिया. उस वक्त क्लब के भीतर कुछ अंग्रेज अफसर भी मौजूद थे. उन्होंने जवाब कार्रवाई में गोलियां चलाईं. एक गोली प्रीतिलता को जा लगी. उन्हें ब्रिटिश पुलिस अफसरों ने घेर लिया. वह जिंदा पुलिस के हाथों नहीं आना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने साइनाइड की गोली खा ली और मौके पर ही उनकी मौत हो गई.

Pritilata Waddedar Statchu (Pic: Trip Zone)

क्लब पर हमले में एक ब्रिटिश महिला की मौत हो गई और एक दर्जन अंग्रेज जख्मी हुए. ब्रिटिश पुलिस ने मौके से कागज का एक टुकड़ा भी बरामद किया था. इसमें प्रीतिलता ने यूरोपियन क्लब पर हमले से लेकर खुद के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के बारे में विस्तार से लिखा था. यही नहीं, उन्होंने उस कागज में आजादी की लड़ाई में पुरुषों और महिलाओं के बीच लैंगिक भेदभाव का भी जिक्र किया था. प्रीतिलता का वह नोट आज हर महिला को पढ़ने की जरूरत है.

Web Title: Pritilata Waddedar First Bengali Woman Freedom Fight er, Hindi Article

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