आप में से लगभग सभी ने ‘बेबी’, ‘एक था टाइगर’, ‘डी डे’ जैसी ख़ुफ़िया फ़िल्में ज़रूर देखी होंगी. इन सभी में आपने भारत की ख़ुफ़िया एजेंसी रॉ का दम भी देखा होगा.

कुछ देर के लिए इन फिल्मों के अभिनेता सचमुच के ‘रॉ’ एजेंट मालूम पड़ते हैं. ज़रा सोचिये! असल रॉ एजेंट्स किन परिस्थितियों में देश के लिए जान की बाजी लगाते हैं.

तो आईये आज ‘रॉ’ से जुड़े एक बड़े नाम आर.एन. काव से आपको रू-ब-रू कराते हैं, जिन्होंने ‘रॉ’ के लिए खुद को न सिर्फ समर्पित किया, बल्कि इसकी नींव रखने में भी अहम भूमिका निभाई–

कौन हैं आर.एन. काव!

आर.एन. काव एक ऐसा नाम है, जिसे आप ‘रॉ’ का भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य कह सकते हैं. रामेश्वर नाथ काव उर्फ़ आर. एन. काव का जन्म सन 1918 में बनारस के एक कश्मीरी ब्राह्मण परिवार में हुआ. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एम. ए. करने के साथ ही वह 1939 में भारतीय पुलिस में शामिल हो गए.

1947 में भारत की आज़ादी की औपचारिक घोषणा से कुछ समय पूर्व ही काव उस डॉयरेक्ट्रेट ऑफ इंटेलिजेंस ब्यूरो नामक सरकारी संस्था से जुड़ गए, जिसकी स्थापना ईस्ट इण्डिया कम्पनी के ब्रिटिश सिविल अधिकारी कर्नल स्लीमन ने 1920 ई. में की थी.

अपने दोस्तों और सहकार्मियों के बीच आर.एन.काव रामजी के नाम से जाने जाते थे.

उन्होंने ही ‘रॉ’ के स्थापना की. अपने संरक्षण में उन्होंंने 3 वर्षों के भीतर ही ‘रॉ’ को इतना मजबूत बना दिया कि उसने सुरक्षा के दृष्टिकोण से भारत को तत्कालीन समय और बाद के दिनों में काफी मजबूती दी.

सिर्फ ‘रॉ’ ही क्यों नेशनल सिक्योर्टी गॉर्डस यानी एन.एस.जी के गठन में भी रामजी काव की अहम भूमिका रही.

R.N. Kao The Man Who Created RAW (Pic: thebetterindia)

ए.एस.पी के रूप में शुरु किया करियर

सन 1939 के आसपास राव को कानपुर में असिस्टेंट सुप्रिटेंडेंट ऑफ पुलिस के पद पर नियुक्ति मिली. माना जाता है कि यही से उन्होंने अपनी कहानी लिखनी शुरू कर दी, जो अपने अंत तक पहुँचते-पहुँचते अनगिनत उपलब्धियों का एक संग्रह बन गई. एक ऐसा संग्रह जिसे आने वाली पीढि़यों को गर्व के साथ सुनाया जा सकता है.

जासूसी और गुप्त अभियानों की अगुवाई करते हुए वह अपने कार्यकाल के दौरान हमेशा ही एक नायक की भूमिका में रहे. काव के चेहरे पर हमेशा शून्य भाव बना रहा, किसी ने भी उनके चेहरे पर कभी संवेदना या जुनून नहीं देखा. इंटेलिजेंस ब्यूरो का कार्यभार सँभालने के साथ ही उन्हें सबसे पहले आज़ाद भारत के प्रमुख लोगों की सुरक्षा का दायित्व सौंपा गया. इसी दौरान वह भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु के व्यक्तिगत सुरक्षा प्रमुख बने.

भारत के आज़ाद होने के बाद 1950 में जब ब्रिटेन की महारानी पहली बार भारत आयीं तो उनकी सुरक्षा का कार्यभार रामजी काव को सौंपा गया. एक समारोह के दौरान रानी की ओर फूलों का गुलदस्ता फेंका गया, रामजी काव सुरक्षा को लेकर इतने सतर्क थे कि उन्होंने बड़ी फुर्ती से उस गुलदस्ते को रानी तक पहुँचने से पहले ही लपक लिया. असल में उन्हें संदेह था कि शायद इसमें बम हो सकता है.

 इंदिरा गाँधी ने दिखाया ‘काव’ पर भरोसा

इतिहास में दुश्मन के बारे में सही जानकारी ना होने के कारण भारत को कई बार भारी नुक्सान उठाना पड़ा. फिर चाहे वह 1962 चीन द्वारा भारत पर हमला करना हो या फिर कश्मीर को हथियाने के लिए पाकिस्तान द्वारा जिब्राल्टर अभियान चलाना.

यह दोनों घटनाएँ भविष्य के मद्देनज़र भारत के लिए एक बड़ी समस्या बनी.

किन्तु, 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के बाद जब भारत ने कश्मीर को लगभग खो ही दिया था, तब रामजी युवा आईपीएस आफिसर के रूप में सामने आये और एक ऐसी ख़ुफ़िया एजेंसी की सोच भारत सरकार के सामने रखी.

जी हां यह ख़ुफ़िया एजेंसी कोई और नहीं बल्कि, ‘रॉ’ ही थी.

चूंकि, पं. नेहरु के कार्यकाल में काव अपनी योग्यता साबित कर चुके थे, इसलिए श्रीमती इंदिरा गाँधी ने ‘रॉ’ को गठित करने के विचार को मंजूरी दे दी. इस तरह ‘रॉ’ की स्थापना हुआ और काव को ‘रॉ’ का पहला अध्यक्ष नियुक्त किया गया.

Indira Gandhi During 1971 War (Pic: wikimedia)

विदेशों तक फैला था ‘काव’ का नेटवर्क

भारत, जिसने कभी विरोधियों के हाथों शिकस्त खायी थी, वो अब रणनीतियों में पारंगत हो चुका था. काव के नेतृत्व में ‘रॉ’ ने बांग्लादेश को मुक्त करने के लिए मुक्ति वाहिनी दल के क्रांतिकारियों की सहायता कर के 1971 में पाकिस्तान को पराजित किया.

इस जीत ने रामजी को दिल्ली के सत्ता गलियारों में एक नायक बना दिया. आगे आने वाले दिनों में सिक्किम का भारत में विलय कराकर रामजी ने एक सारे देश को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि भाई यह है देश का असली नायक!

सिर्फ भारत में ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय खुफिया समुदाय में भी काव की अच्छी छवि थी. अपने कौशल और बेहतरीन काम के कारण सहकर्मियों द्वारा उनका बहुत सम्मान किया जाता था. फ़्रांस की पूर्व खुफिया एजेंसी एस.डी.ई.सी.ई. के पूर्व अध्यक्ष काउंट एलेक्सेंड्रे दे मारेंचेस ने 1970 में काव को विश्व के पांच महान एजेटों में से एक बताया था. उन्होंने कहा था कि “रामजी काव शारीरिक और मानसिक शिष्टता के एक अद्भुत मिश्रण हैं.

इसी कड़ी में ज्वाइंट इंटेलिजेंस कमिटी के चेयरमैन के.एन. दारूवाला ने काव के बारे में कहा था कि “उनके संपर्क दुनिया भर में थे! खास तौर पर चीन, अफगानिस्तान, और ईरान में…

वो सिर्फ एक फ़ोन कॉल द्वारा ही भारी फेरबदल करने की क़ाबिलियत रखते थे.

1975 के मध्य में राम जी काव एक पान सुपारी व्यापारी के वेश में बांग्लादेश के तत्कालीन राष्ट्रपति शैख़ मुजीबुर रहमान को उनके देश में होने वाले तख्तापलट की सूचना देने ढाका पहुंच गये थे. काफ़ी देर तक चली उस बैठक में काव ने विद्रोहियों के नाम बताते हुए रहमान को समझाने की बहुत कोशिश की मगर, उन्हें रामजी काव की बातों पर विश्वास नहीं किया. इसका परिणाम यह हुआ कि इस बैठक के कुछ हफ़्तों बाद ही रहमान को उनके परिवार के साथ मौत के घाट उतार दिया गया.

इस तख्तापलट के बाद जनरल ज़िया उर रहमान सत्ता में आ गए, हालाँकि 1980 में उनकी भी हत्या कर दी गयी. ज़िया उर रहमान सत्ता में आने के बाद जब भारत आये तब श्रीमती इंदिरा गाँधी के साथ एक मीटिंग में जहाँ रामजी काव भी उपस्थित थे, उन्होंने रामजी काव के बारे में श्रीमती गाँधी से कहा “यह इंसान मेरे देश के बारे में मुझसे भी ज़्यादा जानता है.”

सिर्फ एक ‘खुफिया’ अधिकारी ही नहीं थे काव…

माना जाता है कि 1977 में नयी सरकार के गठन के बाद ‘रॉ’ की शक्तियों तथा संस्था के लिए मिलने वाली आर्थिक मदद को कम कर दिया गया. इस कारण ‘काव’ का मोहभंग हो गया और उन्होंंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया.

हालांकि, 1980 में जब श्रीमती गाँधी पुनः सत्ता में आईं, तब काव को फिर से सुरक्षा सलाहकार के रूप में वापस लौटे. बाद में वह 1984 में श्रीमती गाँधी की हत्या तक इस पद पर रहे. काव ने श्रीमती गाँधी के बाद नए प्रधानमंत्री राजीव गांधी को खुफिया मामलों पर सलाह दी तथा इसके साथ ही दुनिया भर में गुप्त सेवा प्रमुखों के साथ संबंध स्थापित किया.

यह उनके काम का असर था या फिर उनका स्वभाव… किन्तु, कहा जाता है कि काव एक बेहद शर्मीले इंसान थे. वह आम जनता के बीच भीड़ भाड़ वाली जगहों पर बहुत ही कम दिखते थे. यहाँ तक कि खास रिश्तेदारों की शादियों में तस्वीर खिंचवाने से भी उन्हें परहेज़ था. उन्हें कई बार अपनी जीवनी लिखने के लिए कहा गया, मगर उन्होंने हर बार इसे टाल दिया.

एक तरफ दुनिया उनके खुफिया संस्था के अध्यक्ष के रूप में उनकी प्रशंसा करते नहीं थकती थी, तो दूसरी तरफ उनमें एक ऐसी अनोखी प्रतिभा थी जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते थे. रामजी काव ‘रॉ’ और ‘एन.एस.जी’ के पहले अध्यक्ष होने के साथ-साथ एक कुशल शिल्पकार भी थे. वन्यजीवन के प्रति अपने लगाव को उजागर करते हुए, उन्होंने घोड़ों की बहुत सी भव्य मूर्तियों का निर्माण किया था. वे गांधार चित्रों के अपने बढ़िया संग्रहण के लिए भी जाने जाते थे.

R.N Kao The Man Who Created RAW (Representative Pic: LinkedIn)

20 जनवरी 2002 को भारत की सुरक्षा व्यवस्था को मजबूती प्रदान करने वाले ‘काव’ ने हमेशा के लिए दुनिया को अलविदा कह दिया. वह हम हमारे बीच भले नहीं हैं, लेकिन उनके बहुमूल्य योगदानों को हमेशा याद किया जाता है.

Web Title: R.N. Kao The Man Who Created RAW, Hindi Article

Featured Image Credit Representative Pic: Foreignpolicy