मराठा सम्राज्य की जब भी चर्चा होती है, लोगों की जुबान छत्रपति शिवाजी महाराज की शौर्यता  की कहानियां आ ही जाती हैं. किन्तु क्या आप उस महिला को जानते हैं, जिन्होंने पहले शिवाजी को अंगुलियां पकड़कर चलना सिखाया फिर उन्हें एक महान योद्धा बनाया.

जी हां, यहां बात हो रही है छत्रपति शिवाजी महाराज की मां जीजाबाई की!

कहते हैं कि वह शिवाजी की सिर्फ माता ही नहीं बल्कि उनकी मित्र और मार्गदर्शक भी थीं. उनका सारा जीवन साहस और त्याग से भरा रहा. उन्होंने जीवन भर कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों का सामना किया, किन्तु धैर्य नहीं खोया और अपने ‘पुत्र ‘शिवाजी’ को समाज कल्याण के प्रति समर्पित रहने की सीख दी.

तो आईये लोगों के लिए अपने बेटे को योद्धा बनाने वाली माता जीजाबाई को जानते हैं–

छोटी उम्र में हुआ विवाह

जीजाबाई का जन्म 12 जनवरी 1598 में बुलढाणा के जिले सिंदखेद के निकट ‘लखुजी जाधव’ की बेटी के रूप हुआ. उनकी मां का नाम महालसाबाई था. वह बहुत कम उम्र की थीं, जब उनका विवाह ‘शहाजी भोसले’ के साथ कर दिया गया. जिस समय जीजाबाई की शहाजी के साथ शादी हुई, उस समय वह आदिल शाही सुल्तान की सेना में सैन्य कमांडर हुआ करते थे.

शादी के बाद जीजाबाई आठ बच्चों की मां बनीं, जिनमें से 6 बेटियां और 2 बेटे थे. उनमें से ही एक शिवाजी महाराज भी थे. यूं तो जीजीबाई देखने में बहुत सुंदर थीं… साथ ही बुद्धिमान भी. बावजूद इसके कहा जाता है कि शिवाजी के जन्म लेते ही उनके पति ने उन्हें त्याग दिया था.

असल में वह अपनी दूसरी पत्नी तुकाबाई पर ज्यादा मोहित थे, जिस कारण जीजाबाई से उनका मोह भंग हो गया था. इस लिहाज से शिवाजी के जन्म के बाद से ही वह अपने पति के प्यार के लिए तरसते रहीं.

Rajmata Jijabai Talk With Shivaji (Pic: shilpabhoir)

शिवाजी के लिए बनीं प्रेरणा

जीजाबाई कोई आम महिला नहीं थी.

एक माता और पत्नी के अलावा उनके अंदर और भी तमाम गुण थे. वह खुद एक सक्षम योद्धा और प्रशासक के रूप में जानी जाती थीं. इस लिहाज से शौर्यता उनके रगों में भरी हुई थी. वह शिवाजी को हमेशा वीरता के किस्से सुनाकर उन्हें प्रेरित करती रहती थीं. जब भी शिवाजी मुश्किल में आते, जीजाबाई उनकी मदद में खड़ी नज़र आती. पिता के बिना शिवाजी को बड़ा करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती थी, जिसको उन्होंने बखूबी निभाया.

समर्थ गुरु रामदास की मदद से उन्होंने शिवाजी के पालन-पोषण में खुद को पूरी तरह झोंक दिया. साथ ही उनके अंदर वीरता के बीज हमेशा रोपित करती रहीं. यही कारण था कि बहुत छोटी उम्र में ही छत्रपति शिवाजी महाराज ने मुगलों को चुनौती दी और समूचे भारत में विख्यात हुए.

शिवाजी ने नहीं मानी बात तो…

शिवाजी को शौर्यता का पाठ पढ़ाते वक्त जीजाबाई का एक किस्सा खासा मशहूर है. इसके तहत जब शिवाजी एक योद्धा के रुप में आकार ले रहे थे, तब जीजाबाई ने एक दिन उन्हें अपने पास बुलाया और कहा, बेटा तुम्हें सिंहगढ़ के ऊपर फहराते हुए विदेशी झंडे को किसी भी तरह से उतार फेंकना होगा.

वह यहीं नहीं रूकीं… आगे बोलते हुए उन्होंने कहा कि अगर तुम ऐसा करने में सफल नहीं रहे, तो आपको मैं अपना बेटा नहीं समझूंगीं.

इस पर शिवाजी ने उनको टोकते हुए कहा, मां मुगलों की सेना काफी बड़ी है. दूसरा हम अभी मजबूत स्थिति में नहीं हैं. ऐसे में उन पर विजय पाना कठिन होगा. इस समय इन पर विजय पाना अत्यंत कठिन कार्य है.

शिवाजी के यह शब्द उनके लिए बाण समान लगे!

उनका नाराज होना लाजमी था. उन्होंने क्रोध भरे सुर में कहा तुम अपने हाथों में चूडियां पहनकर घर पर ही रहो. मैं खुद ही सिंहगढ पर आक्रमण करूंगी और उस विदेशी झंडे को उतार कर फेंक दूंगी.

मां का यह जवाब शिवाजी को हैरान कर देने वाला था. फिर भी उन्होंने मां की भावनाओं का सम्मान किया और तत्काल नानाजी को बुलवाया और आक्रमण की तैयारी करने को कहा. बाद में उन्होंने योजनाबद्ध तरीके से सिंहगढ़ पर आक्रमण कर दिया और बड़ी जीत भी दर्ज की.

Rajmata Jijabai Talk With Shivaji (Pic: instarix)

मरते दम तक किया ‘रिश्तों का सम्मान’

यूं तो जीजाबाई के दूसरे बेटे और शिवाजी के भाई संभाजी महाराज उनके पास नहीं रहे थे, किन्तु ऐसा कोई दिन नहीं जाता था कि जब वह उसकी याद न करें. एक दिन वह अपने संभाजी को याद ही कर रही थीं कि उन्हें पता चला कि वह कर्नाटक में ‘अफजल खान’ के साथ युद्ध में गए हुए हैं. मां का दिल अपने बेटे की फिक्र में धड़क ही रहा था कि उन्हें खबर दी गई कि युद्ध के दौरान संभाजी वीरगति को प्राप्त हो गए थे.

यह खबर जीजाबाई के लिए बेहद दु:खद थी. इसके पहले उन्हें उनके पति की मृत्यु का समाचार मिल ही चुका था. ऐसे में यह उनके जीवन में एक के बाद एक घटी दूसरी बड़ी क्षति थी, जिसकी भरपाई संभव नहीं थी. कहते हैं कि इन घटनाओं ने जीजाबाई को पूरी तरह तोड़ दिया. बात यहां तक पहुंच गई थी कि वह खुद को सती तक कर लेना चाहती थीं. वह तो शिवाजी के हस्तक्षेप के कारण उन्होंने अपना इरादा बदल दिया.

हालांकि, इसके बाद वह ज्यादा दिनों तक जिंदा नहीं रह सकीं और 17 जून 1674 में शिवाजी के राज्याभिषेक के बाद मृत्यु को प्यारी हो गयीं.

Story of Rajmata Jijabai (Pic: bookganga)

मां के निधन के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने एक पल के लिए भी उनके बताए रास्ते से नहीं हटे और अपना पूरा जीवन अपने लोगों की रक्षा में लगा दिया. निश्चित रूप से अपनी मां के साथ और नसीहतों के चलते ही छत्रपति शिवाजी महाराज आज भी लोगों के दिलों पर राज करते हैं.

धन्य है वह माता, जिसने छत्रपति शिवाजी महाराज जैसे सुपुत्र को प्रजा का हित करने के लिए सदा प्रेरित किया.

आप क्या विचार रखते हैं इस महान नारी के बारे में, कमेन्ट बॉक्स में अवश्य बताएं!

Web Title: Story of Rajmata Jijabai, Hindi Article

Feature Image Credit: InstaRix