भारत में आज़ादी के लिए की गई 1857 की क्रांति किसे याद नहीं. इसमें साहसी रानी लक्ष्मीबाई के योगदान और वीरता को कोई भला कैसे भूल सकता है.

उनके वीरता की गाथा बच्चे से लेकर बूढ़े तक, सबको मुंह ज़बानी याद है. इस भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान एक और ऐसी रानी थीं जिन्होंने अंग्रेजों के सामने घुटने टेकने से इनकार कर दिया था. रानी अवंतीबाई, एक ऐसी ही योद्धा थीं जिन्होंने अपने विद्रोह और बलिदान की वजह से अपना नाम इतिहास में लिख दिया.

अतीत के पन्नों पर उनका किया गया बलिदान धुंधला हो गया है. इनके विषय में बहुत कम ही लोग जानते हैं. इनकी निडरता और अंग्रेजों से बराबर की टक्कर लेने की कहानी बड़ी दिलचस्प है.

जानते हैं, योद्धा रानी अवंतीबाई के बारे में जिन्हें इतिहास में उतनी जगह नहीं मिली-

राजनीति और युद्ध कला में थीं माहिर!

अवंतीबाई का जन्म 16 अगस्त 1831 को एक ज़मीनदार परिवार में हुआ था. कम उम्र से ही वह अपना जीवन  स्वतंत्रता के साथ जीती रही थीं. लिहाज़ा, वह जल्द ही अपने बचपन के वर्षों में बेहद स्वतंत्र और अच्छी तरह से विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षित हुईं.

उन्होंने अपना प्रशिक्षण न सिर्फ तीरंदाजी, घुड़सवारी और तलवार चलाने में लिया था. बल्कि वह सैन्य रणनीति से लेकर राज्य मामलों में भी माहिर थीं. वो हर तरह से एक सक्षम महिला थीं.

यही वजह थी कि वह दूर-दूर तक अपने हुनर के लिये मशहूर थीं. जल्द ही, उनके बारे में फैले उनके कौशल और करिश्माई व्यक्तित्व के चर्चे जब रामगढ़ (आज का मध्यप्रदेश) के राजा के कानों में पड़े. उनके बारे में सुनते ही उन्होंने अवंतीबाई का विवाह अपने बेटे से करने का फैसला लिया.

लिहाज़ा, साल 1849 में उनका विवाह विक्रमादित्य लोधी से हो गया. उनका विवाह कम उम्र में ही हो गया था.

Rani Avantibai (Pic: haribhoomi)

पति की मृत्यु के बाद शुरू हुई सत्ता की लड़ाई!

शादी के बाद रानी अवंती को दो पुत्र हुए. जिनका नाम था शेर सिंह और अमन सिंह. उनका जीवन अच्छा चल रहा था. कुछ ही दिनों बाद उनके पति राजा विक्रमादित्य बीमार रहने लगें. राज्य को संभालने में वह असमर्थ हो गए थे. अंग्रेजों को भी इस बात की भनक लगी.

उन्होंने मौका देखते ही रामगढ को अपने अधीन करना चाहा. जिसके लिए उन्होंने उनके दोनों बेटों को सिंहासन के लिए अयोग्य घोषित कर दिया. अंग्रेजों का कहना था कि अभी दोनों नाबालिग हैं और सत्ता चलाने के योग्य नहीं.

रानी ने अपने हाथ में सत्ता ले ली. जल्द ही, अंग्रेजों ने रानी को हटाकर अपना प्रशासन लागू कर दिया. उन्होंने यह ‘डॉक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स’ के तहत किया था. अगर आप को याद हो तो यह नियम अंग्रेजों द्वारा लाया गया था.

इसके अनुसार अगर किसी राज्य में उसके राजा की मृत्यु के बाद कोई वंश संभालने वाला नहीं होगा या फिर राजा अपनी सत्ता संभालने में नाकाम रहेगा. उस समय ब्रिटिश उस राज्य को अपने अधीन कर सकती थी.

अंग्रेजों से प्रतिशोध लेने की ठानी!

नियम ने कंपनी को किसी भी रियासत में प्रशासन स्थापित करने की इजाजत दी. इसी के साथ 13 सितंबर, 1851 को रामगढ़ में ब्रिटिश स्वीकृत प्रशासक शेख मोहम्मद के साथ-साथ वार्ड ऑफ़ कोर्ट स्थापित किया.

अंग्रजों का यह फैसला उन्हें रास नहीं आया. उन्होंने इसे अपना अपमान समझा. रानी अवंतीबाई ने ये फैसला किया कि अंग्रेजों से जरुर इस बात का प्रतिशोध लेंगी.

साल 1857 में उन्हें अपना बदला लेने का सही मौका भी मिल गया. इस दौरान, उन्होंने ब्रिटिश प्रशासक को राज्य से बाहर निकलवा दिया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ युद्ध घोषित कर दिया.

अवंती बाई का अगला कदम अपने पड़ोसी साम्राज्यों को भी शामिल करना था. इसके लिए उन्होंने ब्रिटिश अधीनता के खिलाफ युद्ध में शामिल होने के लिए के शासकों को पत्र लिखा.

उस पत्र के साथ उन्होंने चूड़ियों के डिब्बे भी भेजे. अपने पत्र में उन्होंने लिखते हुए कहा कि अगर अपनी मातृभूमि की रक्षा करनी है तो अपनी तलवारें निकालो और अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध करो. अगर ऐसा नहीं कर सकते तो  इन चूड़ियों को पहनकर अपने घर में छिपे रहो.

4000 सैनिकों के साथ युद्ध का नेतृत्व किया!

रानी अवंतीबाई की इस अपील ने सभी आसपास के साम्राज्यों में क्रांति की एक चिंगारी सुलगा दी थी. उनकी यह अपील केंद्रीय प्रांतों में क्रांति की लहर लाने में सफल रही.

अब ज्यादातर राज्य उनके साथ आकर खड़े हो गए थे. साल 1857 तक पूरा क्षेत्र सशस्त्र विद्रोह में शामिल हो गया था. अब इस मोर्चे का नेतृत्व कर रही थीं स्वयं रानी अवंतीबाई.

उन्होंने युद्ध में लड़ने के लिए 4000 लोगों की एक सेना बनाई. इसी के साथ वह ब्रिटिश राज के खिलाफ हमला बोलने के लिए तैयार थीं.

उनकी पहली लड़ाई मंडला के पास खेरी गांव में हुई. जब यह विद्रोह हुआ था तब अंग्रेजों ने सोचा कि इसे कुचलना बहुत आसान होगा. ये उनका बहुत बड़ा भ्रम था. अवंती बाई की कुशल युद्ध रणनीति की बदौलत वह इस लड़ाई में पराजित हो गए थे.

अपनी हार की वजह से अंग्रजों को पीछे हटना पड़ा. लिहाज़ा, दिसंबर 1857 से फरवरी 1858 तक मंडला क्षेत्र को रानी अवंतीबाई ने अपने नियंत्रण में रखा.

She Attacked On British Army With A Troop of 4000 People (Representative Pic: scoopwhoop)

गुरिल्ला युद्ध तकनीक का भी किया उपयोग!

अंग्रेजों को इस बात का अंदाज़ा हो चुका था कि रानी से टक्कर लेना कोई मामूली बात नही. इस बार उन्होंने क्रूर बल के साथ हमला करने का फैसला लिया. इस बार कई गुना अधिक तैयारी के साथ उन्होंने रामगढ़ पर हमला किया. उन्होंने इस क्षेत्र में आग लगा दी और क्रूरता से लोगों को मारना शुरू कर दिया.

इस हमले से सुरक्षा पाने के लिए रानी अवंतीबाई के पास देवीरगढ़ के पहाड़ी जंगलों में जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा.

रानी भी इतनी जल्दी हार मानने वालों में से नहीं थीं. उन्होंने जंगलों में रहते हुए अपनी युद्ध रणनीति के तहत  गुरिल्ला युद्ध तकनीकों का भी उपयोग किया.

इस तकनीक की मदद से उन्होंने जनरल वेडिंगटन के शिविर में घुसपैठ की और उनकी सेना के बीच कोहराम मचा दिया. लेकिन, उनकी देशभक्ति और युद्ध की भावनाएं ही युद्ध जीतने के लिए काफी नहीं थी.

इस बार अंग्रेजों की बर्बर मशीन और हथियार रानी की सेना पर भारी पड़ गए. उन्हें ब्रिटिश आर्मी ने चारों तरफ से घेर लिया था. जब रानी ने खुद को हार के निकट पाया तब उन्होंने अंग्रेजों के हाथों मरना अस्वीकार कर दिया.

लिहाज़ा, उन्होंने अपनी तलवार निकाली और खुद ही उससे अपनी जान ले ली. जान लेते समय उनके आखिरी शब्द कुछ इस प्रकार थे, ‘हमारी दुर्गावती ने जीते जी वैरी के हाथ से अंग न छुए जाने का प्रण लिया था. इसे न भूलना”

Government Issued Stamps In Her Honor (Pic: biography)

इस तरह एक बहादुर महिला ने अंग्रेजों की गुलामी को शांति से स्वीकारने से साफ़ माना कर दिया था उनके इस बलिदान को हर भारतीय हमेशा याद रखेगा.

Web Title: Rani Avantibai: A Warrior Who Fought Against British Rule, Hindi Article

Feature Image Credit: prabhasakshi