दुनिया में जब भी क्रूरता और पागलपन के बड़े उदाहरण देने की बात आती है, तो उसमें हिटलर और मुसोलिनी जैसे तानाशाहों का नाम सबसे पहले आता है. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जो लाखों लोग मारे गये, उसमें हिटलर के साथ मुसोलिनी को भी जिम्मेदार माना जाता है. शायद कम लोग ही जानते होंगे कि हिटलर और मुसोलीनी के बीच तानाशाही के अलावा एक और भी रिश्ता था, जिसे दोस्ती कहा जा सकता था. वह कई मौकों पर एक-दूसरे के अच्छे दोस्त की तरह नज़र आये. फिर चाहे वह राजनैतिक कारणों की वजह से ही क्यों न हो! तो आईये बात करते हैं तानाशाहों के इस खट्टे-मीठे रिश्ते की…

शुरुआत में थे दुश्मन

यूं तो हिटलर के शासनकाल की शुरुआत में हिटलर और मुसोलिनी के बीच बहुत दुश्मनी हुई थी. इसके पीछे बड़ा कारण भी था. असल में हिटलर की नजर मुसोलिनी के ऑस्ट्रिया पर थी. उसने 1934 में इस पर कब्जा करने की कोशिश की थी. यहां तक कि नाजियों ने ऑस्ट्रियाई चांसलर एंगलबर्ट गुलफुस की हत्या तक कर दी थी. मुसोलिनी को जब इसकी खबर मिली तो उसने अपने सैनिकों को सीमा पर भेज दिया.

उसने तय कर लिया था कि अगर जर्मन सेना नहीं मानी तो वह युद्ध करेगा. उसने हिटलर को संदेश भी भिजवाया था कि अगर वह ऑस्टिया चाहता है तो उसे उसके साथ दो-दो हाथ करने पड़ेंगे. चूंकि, हिटलर मुसोलिनी से बहुत प्रभावित था, इसलिए उसने अपनी सेना को वापस बुला लिया. बाद में जब मुसोलिनी और हिटलर की दोस्ती हुई तो आस्ट्रिया जर्मनी का हिस्सा बना.

इस तरह बने दोनों दोस्त

दोनों 1936 के आसपास मित्र बने, जब ब्रिटिश और फ्रांसीसियों ने एक बढ़े हुए इतालवी साम्राज्य के लिए मुसोलिनी की योजनाओं में हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया था. इटली ने स्पेनिश नागरिक युद्ध में सक्रिय रूप से भाग लिया था. इस कारण रुस और ब्रिटेन मुसोलिनी के खिलाफ हो गए थे. ऐसे में हिटलर ने आगे बढ़कर मुसोलिनी का साथ दिया था. जर्मनी और इटली के बीच संबंध अनुकूल हुए, तो हिटलर ने मुसोलिनी की साम्राज्यवादी परियोजनाओं का समर्थन करना शुरू कर दिया था. मुसोलिनी ने भी कोई परवाह न करते हुए हिटलर के साथ कदमताल शुरु कर दी.

Relation with Hitler and Mussolin (Pic: pinsdaddy.com)

अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में गठबंधन

द्वितीय विश्व युद्ध के पहले ही अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में हिटलर और मुसोलिनी आपस में गठबंधन कर चुके थे. यही नहीं युद्ध से पहले ही जर्मनी ने लीग ऑफ़ नेशन्स को छोड़ दिया था. पर जब मुसोलिनी को जरुरत पड़ी तो हिटलर ने बिना शर्त उनका समर्थन किया था. युद्ध के समय भी वह यूरोप की तरफ से वह मुसोलिनी की मदद करते देखा गया. ब्रिटेन और फ्रांस उसके इस रवैये से नाराज था. लेकिन हिटलर ने किसी की परवाह नहीं की. उसके लिए उस वक्त मुसोलिनी ही सब कुछ था.

हिटलर ने जेल से रिहा कराया

1943 में, एक युद्ध के दौरान मुसोलिनी की हार हुई और उन्हें जेल में डाल दिया गया था. उन्हें प्रधानमंत्री पद से हटा भी दिया गया था. लोग कहने लगे थे कि मुसोलिनी की कहानी खत्म हो गई है. पर, जब हिटलर को इस बात का पता चला तो वह मुसोलिनी को बचाने के लिए आगे बढ़ा. संयोग से जिसने मुसोलिनी को गिरफ्तार किया था, वह हिटलर का जानने वाला निकला. हिटलर के संदेश पर वह उनसे मिलने आया और फिर उन्हीं के कहने पर उसने मुसोलिनी को मुक्त कर दिया था. इसके बाद हिटलर ने ही मुसोलिनी को इटली के एक हिस्से का प्रभारी बनवाया था.

एक-दूसके के बड़े प्रशंसक

हिटलर मुसोलिनी का एक बड़ा प्रशंसक था. वह मुसोलिनी के ‘रोम पर मार्च’ से बहुत प्रभावित था. इससे प्रेरित होकर उसकी नाजी सेना ने युद्ध के दौरान कुछ ऐसी ही रणनीति अपनाने की कोशिश की थी, लेकिन वह असफल रहा. मुसोलिनी ने नाजी पार्टी के लिए कई प्रकार की वित्तीय सहायता भी दी थी. सिर्फ यही नहीं उसने अपने अर्धसैनिक बलों के साथ हिटलर के सैनिकों को प्रशिक्षण देने की अनुमति भी दी थी. बदले में हिटलर ने भी जरुरत पड़ने पर मुसोलिनी की कई मौकों पर मदद की. मुसोलिनी भी पीछे कहाँ रहने वाला था. उन्होंने हिटलर के कार्यों और नीतियों की कई बार प्रशंसा की थी. जबकि, दोस्ती से पहले वह कई बार इनको लेकर निराशा जाहिर करता रहता था.

मुसोलिनी गुरु, तो हिटलर शिष्य!

मुसोलिनी का फासीवाद 1920 के दशक का था, जबकि उस समय हिटलर का राजनीतिक परिदृश्य में कोई नामोनिशान तक नहीं था. इसलिए माना जाता है कि हिटलर ने मुसोलिनी से बहुत कुछ सीखा था. वह मुसोलिनी की तुलना में छोटा भी था. कहा जाता है कि उन दोनों के बीच शिष्य और गुरु जैसा रिश्ता भी था. हिटलर ने मुसोलीनी से कई सारे गुर सीखे थे. खासकर वह मुसोलिनी द्वारा बोली जाने वाली भिन्न भाषाओं में धाराप्रवाह वक्तव्य से बहुत प्रभावित था.

Hitler And Mussolini (Pic: reference.com)

यह कुछ एक लम्हें थे, जब हिटलर, मुसोलिनी के साथ एक अच्छे दोस्त की तरह खड़ा था. ऐसे लम्हें और भी हो सकते हैं. पर इन लम्हों से एक बात तो स्पष्ट है कि जिस तरह से हिटलर, मुसोलिनी के साथ अंतिम समय तक खड़ा रहा, वह इस ओर इशारा करता है कि वह मन से मुसोलिनी को पसंद करता था. मुसोलिनी भी भले ही शुरुआत में हिटलर के सिद्धांतों से असहमत से दिखा हो. पर, अंतत: जब वह युद्ध हारने के बाद पकड़ा गया और हिटलर ने उन्हें बचाया तो वह मन से उसका कर्जदार हो गया था.

पर यह दोस्ती कुछ ऐसी थी, जिसने समूचे विश्व को खतरे में डाल दिया था. कहते हैं, दोस्त एक-दुसरे को सद्कर्म करने के प्रति प्रेरित करते हैं, पर यहाँ तो कूकर्म हुआ, जिसने दोस्ती की महिमा को भी कलंकित कर दिया. सदा-सदा के लिए…

Web Title: Relation with Hitler and Mussolini, Hindi Article

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