पुर्तगालियों का भारत में उपनिवेश शुरू हो चुका था. इनके इतिहास की बात करें तो, 1505 में पुर्तगाली सम्राट ने फ्रांसिस्को डी अल्मेडा को भारत का गवर्नर नियुक्त किया.

आगे, 1507 में गुजराती नौसेना के हाथों उसका बेटा मारा गया. इसके बाद अलफांसों डी अलबुकर्क को गवर्नर बनाया गया. अलफांसों ने भारत में पुर्तगाली सत्ता स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई. 1510 में उसने गोवा पर अपना कब्ज़ा कर लिया, जो कि भारत के उपनिवेश में पुर्तगालियों का प्रमुख स्थान बना.

इसके बाद पुर्तगालियों ने भारत में अपना विस्तार करना शुरू कर दिया. उन्होंने मुग़ल बादशाह हुमायूं के शासनकाल से लेकर शाहजहां के शासनकाल तक प्रबल रूप से अपना उपनिवेश जारी रखा.

लेकिन, इस दौरान दोनों के संबंधों में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिला. एक वक़्त ऐसा भी आया जब मुग़ल बादशाह शाहजहां से दुश्मनी मोल लेने पर पुर्तगालियों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया. इसके फलस्वरूप मुग़ल सेना के सामने उन्हें घुटने टेकने पड़े थे.

हालांकि, पुर्तगालियों और मुगलों के बीच मधुर संबध भी रहे हैं. ऐसे में हमारे लिए मुग़लों और पुर्तगालियों के मध्य बनते-बिगड़ते रिश्तों के बारे में जानना दिलचस्प रहेगा. 

तो चलिए जानते हैं मुगलों का पुर्तगालियों के बीच उनके खट्टे मीठे रिश्ते के बारे में ...  

अकबर को ईसाई धर्म अपनाने में असफल रहे पुर्तगाली!

पुर्तगालियों का गोवा के साथ ही हुगली नदी जैसे अधिकांश क्षेत्रों पर कब्ज़ा हो चुका था. ये जहाजों को लुटने और हुगली नदी के पास अपना आतंक दिखाते रहे.  1571 में बीजापुर और अहमदनगर के शासकों ने पुर्तगालियों को निकालने की योजना भी बनाई, मगर वो सफल नहीं हो सके थे.

इसी कड़ी में अकबर 1572 में पहली बार किसी पुर्तगाली व्यापारी से मिले. कुछ साल बाद जब एंटोनियो केबरेल सूरत आया, तो अकबर की मुलाकात दोबारा पुर्तगालियों से हुई.

अकबर को हमेशा से हर किसी धर्म के बारे में जानने में दिलचस्पी रही है. जब अकबर और पुर्तगालियों के बीच अच्छे सम्बन्ध बन गए, तब अकबर ने  ईसाई धर्म के बारे में भी जानना चाहा. इसके लिए बंगाल के जनरल फादर जूलियन और कुछ अन्य स्रोतों से थोड़ा बहुत इसाई धर्म के बारे में समझ सके.

जब अकबर की जिज्ञासा और बढ़ी. तब उन्होंने गोवा में सन्देश पत्र भेजकर दो ज्ञानी पादरी को बुलाने का निवेदन किया. पुर्तगालियों को इनकी जिज्ञासा को देखकर बड़ी ख़ुशी हुई, क्योंकि वो अकबर को इसाई धर्म का अनुयायी बनाने का सपना देखने लगे. 1580 में दो पादरियों को अकबर के पास भेजा गया. इस तरह अकबर के शासनकाल के दौरान करीब तीन बार ये मिशन चलता रहा.

लेकिन, पुर्तगालियों को सफलता नहीं मिल सकी. उनका मिशन न तो अकबर और न ही उनके दरबारियों को इसाई मत में परिवर्तित कर सका. यहां तक उन्होंने जहाँगीर को भी ईसाई धर्म में बदलना चाहते थे .

कहते हैं इसके पीछे भी अकबर की एक अलग मंशा थी वो पुर्तगालियों से हथियार लेना चाहते थे. वहीं जहांगीर भी अपने पिता से विद्रोह करना चाहता था. इसके लिए उसको पुर्तगालियों की मदद चाहिए थी. ईसाई धर्म उनके लिए महत्वपूर्ण नहीं था.

परन्तु, पुर्तगाली अधिकारी अकबर और जहांगीर की इस मंशा को समझ चुके थे. उन्होंने उनकी मदद से इंकार कर दिया, फिर मुगलों से पुर्तगालियों की दूरी बनती चली गई.

Christian Paintings in Mughal Period (Representative Pic: indianexpress)

जहांगीर के साथ पुर्तगालियों के बनते-बिगड़ते रिश्ते  

आगे, जब जहांगीर गद्दी पर बैठा. इस दौरान भी कुछ सालों तक पुर्तगालियों और मुगलों के बीच एक दूसरे से दूरी कायम रही. 1606 में दोनों के बीच एक समझौता हुआ. इसके बाद उनको लाहौर और आगरा में अपने धर्म के प्रचार-प्रसार करने की छूट दे दी गई. उन्हें सड़क मार्गों पर कैथोलिक रीति रिवाजों के साथ जलसा जुलूस का भी अधिकार दे दिया गया. इस बीच मुग़ल खजाने से भी चर्च की सहायता की गई थी.

इस दौरान पुर्तगालियों को अपना उपनिवेश बढ़ाने का भी खूब अवसर प्राप्त हुआ. इसके बाद जहांगीर के बारे में एक अफवाह ने जन्म ले लिया कि, जहांगीर ने ईसाई धर्म अपना लिया है. पादरियों को भी ये लगने लग गया था कि वो जहांगीर को धर्म परिवर्तन कराने में सफल हो जायेंगे.

मगर, एक बार फिर मुग़ल और पुर्तगालियों के बीच रिश्तें में खटास पैदा हुई. दरअसल मुकारब खान जो कि जहांगीर का घनिष्ठ मित्र और कुशल सेनापति था.  1608 में उसको जहांगीर ने अपना दूत बनाकर पुर्तगाली वायसराय से मिलने गोवा भेजा, मगर, गोवा पहुंचे मुकारब खान को लंबा इंतज़ार करना पड़ा था.

हालांकि, पुर्तगाल से वायसराय वापस नहीं आ सका था. इसीलिए, मुकारब खान को लंबा इंतज़ार करना पड़ा था. इसके बाद गोवा का वायसराय ही बदल गया. 1609 में डॉन मेंडोसा ने इस पद को सभांला, मगर दोनों के बीच रिश्तों में दरार बनी रही.

क्योंकि, 1609 में पहली बार ब्रिटिश कैप्टन विलियम हाकिंस को मुग़ल दरबार में प्रवेश करने का मौक़ा मिला. वह अपने साथ भारत के साथ व्यापार करने के लिए इंग्लैंड के प्रिंस जेम्स प्रथम का जहांगीर के नाम एक प्रार्थना पत्र लेकर आया था.

Portuguese and Mughal Relations (Representative Pic: indianexpress)

अंग्रेजों से करीब होने पर पुर्तगालियों से रिश्ते में आई दरार

पुर्तगालियों ने हाकिंस को मुग़ल दरबार तक पहुँचने से रोकने के लिए भरसक प्रयास किये, लेकिन वो कामयाब न हो सके. जहांगीर ने हाकिंस का स्वागत किया.  इसको 30 हजार के वेतन पर मनसबदार नियुक्त किया.  हाकिंस के द्वारा लाये गए उपहारों को भी स्वीकार किया था. इनकी कीमत 25 हज़ार सोने के सिक्कों के बराबर थी.

अंग्रेजों के साथ बढ़ते रिश्ते को देखते हुए मुग़ल और पुर्तगालियों के संबंध में और भी गहरी दरार पैदा हो गई थी.

इसीलिए मुकारब खान से गोवा के वायसराय मेंडोसा ने भी मिलने से इंकार कर दिया, जिसके फलस्वरूप पुर्तगालियों को अपने व्यापार में भारी नुकसान उठाना पड़ा. जहाँगीर ने पुर्तगालियों को दी जाने वाली छूटों पर रोक लगा दी.

तब मेंडोसा ने एक फादर की मदद से मुकारब खान से सुलहा करना चाहा, जिसके बाद दोनों की शत्रुता फिर से ख़त्म हो गई. इस समझौते के अनुसार अंग्रेजों की जहाज को सूरत की तरफ जाने की अनुमति नहीं दी गई. यहां पुर्तगालियों को ही अनुमति थी.

जिसके बाद 1611 में ब्रिटिश दूतावास हाकिंस ने मुग़ल दरबार छोड़ दिया और पुर्तगालियों के विरुद्ध मुहीम छेड़ दी. जिसके बाद अंग्रेजों ने हिंद महासागर में पुर्तगालियों के बड़े जहाज पर कब्ज़ा करने में कामयाब रहे.

इसी बीच पुर्तगालियों के एक बचकाने हरकत से दोबारा जहांगीर से दुश्मनी हो गई.

दरअसल पुर्तगालियों ने कमजोर मुग़ल नौसेना का फायदा उठाया और मुगलों के चार जहाजों पर कब्ज़ा कर लिया था, जिसमें से कुछ सामान तो जहांगीर की मां के लिए खास थे. यही नहीं उन्होंने कुछ मुसलमानों को बंदी भी बना लिया था.

ऐसे में जहांगीर ने मुकारब खान को पुर्तगालियों से हुई क्षति वसूलने का फरमान जारी कर दिया, जो उस समय सूरत का प्रभारी था.

  Jahangir Permission of East India Company (Representative Pic: icanaffairsjournal)

शाहजहां की सेना ने पुर्तगालियों को दी करारी शिकस्त!

पुर्तगालियों के द्वारा मुगलों के जहांजों को लूटने और भारी उत्पात मचने के बाद, दोनों के बीच की दरार ने गहरी खाई को जन्म दे दिया था.

आगे, जहांगीर का पुत्र शाहजहां ने गद्दी सभांली. शाहजहां पुर्तगालियों की नीति को शुरू से समझते आया था. उसने पुर्तगालियों को मुग़ल दरबार से मिलने वाले लाभ हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया. उनके इस सपने को भी चकना चूर कर दिया, जो उन्होंने मुगलों के धर्मांतरण के सपने संजोए थे.

हालांकि, नराजगी की एक वजह ये भी थी. जहाँगीर के बादशाह बनने से पहले ही पुर्तगालियों ने मुमताज की दो दासियों को बंदी भी बना लिया था. इनके इस हरकत से बादशाह को बहुत कुठाराघात पहुंचा.

1569 में मुग़ल दरबार से एक फरमान जारी हुआ. इसके तहत पुर्तगालियों को नदी के तट तक ही सीमित कर दिया गया.

मगर, धीरे-धीरे उन्होंने यहाँ मकान बनवाए और अपनी स्थिति को दोबारा मजबूत कर लिया. वे नमक और तम्बाकू के व्यापार पर भी अपना कब्ज़ा करने लगे थे.

उस दौरान उन्होंने बच्चों को बंदी बनाकर दासी बना लिया. उनको बेचा जाने लगा. इनके इस घिनौने काम से नाखुश होकर शाहजहां ने पुर्तगालियों पर आक्रमण करने का फैसला किया. 1632 में कासिम खान के नेतृत्व में डेढ़ लाख सेना को हुगली नदी के तट पर भेज दिया. गंगा किनारे हुगली नदी सभी तरफ से खुला था. यहाँ न कोई इनका किला था न ही कोई दिवार.

ऐसे में 300 पुर्तगाली और 600 निवासी ईसाई कुछ दिनों तक मुग़ल सेना का सामना करते रहे. मगर, उनकी बड़ी सेना के सामने वो टिक न सके और घुटने टेकने पर मजबूर हो गए. कुछ तो भागने में भी कामयाब रहे. इस युद्ध में 400 पुर्तगालियों को बंदी बनाकर आगरा लाया गया था.

Hooghly River War (Representative Pic: wikipedia)

इस आक्रमण के बाद पुर्तगालियों का अस्तित्व धीरे धीरे समाप्त होने लगा था, फिर भारत में डचों और ब्रिटिशों का उपनिवेश शुरू हो गया था.

तो ये थी मुगलों और पुर्तगालियों के बीच बनते बिगड़ते रिश्ते की कहानी. 

 Web Title:  Relationship between Mughals and Portugal, Hindi Article

Feature Representative Image Credit: Navrang India