भारत की मिट्टी में ही वो बात है कि हर कोई यहां खिंचा चला आता है. किन्तु मुगलों को भारत का रास्ता दिखाने वाला बाबर खुद यहां की माटी से अंजान था. उसने कभी नहीं सोचा था कि वह भारत तक पहुंचेगा या उस पर कभी अपनी हुकूमत भी कर पाएगा, उसका निशाना तो समरकंद था.

जब बाबर का इतिहास पढ़ा जाता है, तो जिक्र होता है, 21 अप्रैल 1526 ई. को हुए पानीपत के युद्ध, 17 मार्च 1527 ई. में हुए खानवा, 29 मार्च 1528 ई. को लड़े गए चंदेरी युद्ध और 6 मई 1529 ई. के  घाघरा युद्ध का.

यह उन  युद्धों के नाम हैं, जो बाबर ने भारत को हासिल करने के लिए लड़े और जीते भी.

पर क्या वाकई बाबर भारत पर हमला करना चाहता था? आईए जानते हैं –

समरकंद था बाबर का जुनून

कहा जाता है कि बाबर का इरादा भारत पर हमला करना कभी नहीं था. उसका जुनून तो समरकंद ही था, जिसे वह हर हाल में जीतना चाहता था. उसने बार-बार और कई बार समरकंद को पाने की कोशिश में हमला किया और हर बार उसे मुंह की खानी पड़ी. बाबर के खून का एक-एक कतरा दुश्मनों को खत्म करने के लिए सींचा गया था.

14 फ़रवरी 1483 को जन्मा ज़हिर उद-दिन मुहम्मद बाबर पिता की ओर से तैमूर का पांचवा एवं माता की ओर से चंगेज खान का चौदहवां वंशज था. जाहिर सी बात है कि इन दोनों वंशों का खून उसकी असीम ताकत का कारण बना.

ऐसे में वह समरकंद को तो जीत नहीं पाया, लेकिन उसने अपना ध्यान उधर से हटा लिया और भारत का रास्ता अतिख्तयार किया. बहरहाल, भारत में बाबर के नाम को बच्चा-बच्चा जानता है, लेकिन हम बात कर रहे हैं, समरकंद की, जो कभी बाबर का ख्वाब था और एक ख्वाब बन कर ही रह गया.

बाबर के पिता उमर शेख मिर्जा फरगाना, उज्बेकिस्तान के छोटे से राज्य के शासक थे और उनकी मृत्यु के बाद महज 12 साल की उम्र में वह राजगद्दी पर बैठा था. वह ठीक से शासन भी नहीं कर पाया था कि उसके रिश्तेदारों ने उसे गद्दी से हटा दिया. इसके बाद फरगाना पर एक ओर से उसके ताऊ अहमद मिर्जा और दूसरी ओर से मामा महमूद खां ने हमला किया.

बाबर को ऐसे विश्वासघात की कतई उम्मीद न थी, अत: में वह मैदान छोड़कर भाग गया. इस दौरान वह कई गांवों और राज्योें में पहुंचा. लोगों के व्यवहार को जाना और इन्ही मुलाकातों के दौरान उसने समरकंद के बारे में पहली बार सुना.

Zahiruddin Muhammad Babur. (Pic: historydiscussion)

युद्ध में जीत तो मिली लेकिन…

बाबर जानता था कि समरकंद को तुर्की-मंगोल बादशाह तैमूर ने स्थापित किया था. इस लिहाज से वह खुद को समरकंद का उत्तराधिकारी समझता था. करीब दो साल निवार्सन में काटने के बाद बाबर ने अपनी सेना जुटाई और 1496 में समरकंद पर आक्रमण कर दिया.

यह जंग करीब 7 माह तक चली, हालांकि बाबर की सेना कम थी. किन्तु उसमें जीत का जुनून था और अपने बुलंद हौसले के कारण वह आखिरकार जंग जीत गया.

हालांकि, समरकंद अभी भी उसकी पहुंच से दूर था!

समरकंद की जंग के दौरान बाबर के एक खास सरगना ने फ़रगना पर अपना आधिपत्य जमा लिया. यह बाबर की पीठ पर छुरा भौकने के समान था, आखिर फरगाना उसके पिता का राज्य जो था.

फिर क्या था, बाबर ने फरगाना को हासिल करने के लिए चढ़ाई शुरू कर दी. वह बात और है कि अपने बादशाह का यह फैसला सैनिकों को कुछ खास समझ में नहीं आया और उन्होंने वहीं बाबर का साथ छोड़ दिया.

बिना सेना के बाबर फरगाना को हासिल नहीं कर सकता था और अब सेना के बिना समरकंद पर शासन भी संभव न था. इस तरह उसके हाथ से दोनों जागीर निकल गईं और वह अकेला रह गया.

यह पहली चोट थी, जो बाबर को मिली और यहीं से उसे समरकंद को हर हाल में पाने की लालसा हुई.

Babur in Samarkand. (Pic: bada)

फिर शुरू हुआ दोबारा सफर

इस हार के बाद बाबर के पास वफादारों के नाम पर चंद सिपाही ही बचे थे. इनमें से अधिकांश उसके बचपन के साथ या उसके पिता के खास थे. इन्हीं की मदद से बाबर ने फरगाना से फिर से अपनी सेना तैयार करना शुरू किया और आखिरकार उसे इसमें सफलता मिली.

1501 में उसने अपनी छोटी सी सेना तैयार की और फिर से समरकंद का रूख किया. इस बार समरकंद पर उज़्बेक ख़ान मुहम्मद शायबानी का शासन था. उसके पास बड़ी सेना थी और खास बात यह थी कि जनता का विश्वास उसे हासिल था.

इन बातों की परवाह किए बिना बाबर ने समरकंद पर हमला बोला और देखते ही देखते उसके सैनिकों पर उज़्बेक ख़ान का कहर टूट पड़ा और बाबर को फिर से मुंह की खानी पड़ी.

शायबानी ने उसे गिरफ्तार कर लिया, लेकिन चतुर बाबर ने अपनी रिहाई के लिए उसे एक लालच भरा प्रस्ताव दे दिया. बाबर ने अपनी रिहाई के बदले शायबानी से अपनी बहन का निकाह करने का प्रस्ताव रखा. शायबानी को यह प्रस्ताव अच्छा लगा और उसने निकाह के बाद बाबर को रिहा कर दिया.

बाबर अब तक जान चुका था कि समरकंद उसकी हद से बाहर है और यही बौखलाहट उसके अंदर उबाल मारती रही. वह अपने बचे हुए सैनिकों के साथ जंगल-जंगल भटकता रहा. इसी दौरान शायबानी और कुंदुज के शासक खुसरो शाह के बीच जंग हुई, जिसमें खुसरो हार गया. उसके 4 हजार सैनिक जान बचाकर जंगल में जा छिपे.

य​हीं उनकी मुलाकात बाबर से हुई और उन्होंने बाबर की सेना में होना स्वीकार कर लिया.

Muhammad Shaybani, Sultan of Samarkand. (Pic: wikipedia)

एक और कोशिश…

नई सेना के साथ बाबर ने काबुल पर हमला बोल दिया और देखते ही देखते काबुल-गजनी के साथ आसपास के कई क्षेत्र उसके अधीन हो गए. यहीं पर बाबर ने अपने पूर्वजों की उपाधि मिर्जा का त्याग किया और बादशाह कहलाया.

दिलचस्प बात यह थी कि उसकी आंखों से समरकंद को पाने का सपना अभी जिंदा था. यही कारण था कि उसने ईरान के शासक शाह इस्माईल प्रथम से सैन्य सहायता मांगी. शाह ने उसे सहायता देने के बदले शर्त रखी कि वह सुन्नी मत त्याग कर शिया बन जाएगा. बाबर हर हाल में समरकंद चाहता था, इसलिए उसे यह बात स्वीकार करने में देर नहीं लगी.

आखिरकार वह शिया बन गया और बदले में ईरान ने उसे अपनी सैन्य ताकत दे दी.

अब और भी बड़ी सेना के साथ एक बार फिर से 1511 में फिर बाबर ने समरकंद पर हमला किया. इस बार भाग्य ने उसका साथ दिया. समरकंद पर उसकी जीत दर्ज हो गई. देखते ही देखते बुखारा, फरगाना, ताशकंद, कुंदुज और खुरासान भी उसने जीत​ लिए, लेकिन किस्मत का खेल फिर बाबर के लिए मुसीबत ले आया.

ईरानी शासन ने बाबर को हुक्म दिया कि वह उसके क्षेत्र में रहने वाली सभी सुन्नी मुस्लिमों को शिया बनवाए. यह करना बाबर के लिए मुश्किल था. हुक्म तो हुक्म था, इसलिए उसने उस पर अमल शुरू किया. नजीता यह रहा कि आम लोगों की नजरों में बाबर उनका दुश्मन बन गया.

आखिर इन क्षेत्रों में बगावत हुई और लोगों ने बाबर को राज्य छोड़ने पर मजबूर कर दिया.

यह तीसरा मौका था जब समरकंद बाबर के हाथ से फिसल गया.

Shah Ismail I, King of Iran. (Pic: pinterest)

…और फिर भारत का रुख

बाबर इस बार बुरी तरह से टूट चुका था, इसलिए उसने थक हारकर अफगानिस्तान का रुख कर लिया.  अफगानिस्तान में उसे शासन के लिए जो हिस्सा मिला, वहां यूसुफजाई जाति के लोग रहा करते थे. इस जाति के लोगों में अनुशासन की कमी थी और वे झगड़ालू प्रवृत्ति की थे. उन्हें बादशाह को कर देना या आज्ञा पालन करना मंजूर नहीं था.

बाबर ने उन्हें दबाने की कोशिश की पर इससे जनता और भड़क गई. क्षेत्र में रोजगार के अवसर कम थे. जमीन उपजाऊ नहीं थी, इसलिए लोगों का पेट नहीं भर पा रहा था. यही वजह थी कि जनता के मन में बाबर के प्रति घृणा पैदा होने लगी.

बाबर के चारों ओर दुश्मन ही दुश्मन थे. तुर्क, मंगोल, ईरानी, उज्बेग और अब अफगानी लोग बाबर के खून के प्यासे बन गए. बाबर जानता था कि यदि यहां रहा तो किसी भी वक्त उसका कत्ल हो सकता है.

चूंकि इस समय तक बाबर लगभग कंगाल हो चुका था, इसलिए उसने भारत की ओर अपना रुख करना शुरू कर दिया. वह अपने पूर्वजों के और खासतौर पर तैमूर के किस्से सुन चुका था. वह जानता था कि भारत एक धनवान देश है और वहां कभी तैमूर लंग ने हमला किया था. यहीं से उसे भारत पर आक्रमण करने का रास्ता मिला.

Samarkand in Tamerlane Era. (Pic: eurasia)

इसके बाद बाबर का भारत में आना और फिर यहां के खजानों को खाली करने का इतिहास हर कोई जानता है.

यह ऐतिहासिक सच है कि यदि बाबर समरकंद का राजा बन गया होता तो उसे भारत की राह कभी न मिलती. साथ ही भारत कई सौ सालों तक मुस्लिमों का गुलाम न होता.

समरकंद की सत्ता मिलने पर न तो बाबर भारत पर हमला करता और न हीं पानीपत और चंदेरी की लड़ाई होती!

Web Title: Samarkand: Where Babur Got his Way to India, Hindi Article

Featured Image Credit: History of Pashtuns