इतिहास में कई वीर राजा हुए, जिन्होंने अपना पूरा जीवन प्रजा की सेवा में ही निकाल दिया. यहां तक कि जरूरत पड़ने पर वे अपने प्राणों की बाजी लगाने तक से पीछे नहीं हटे. संभाजी महाराज की गिनती भी ऐसे ही राजाओं में होती है.

कहते हैं, जब मुगलों का भारत में शासन था, तो कुछ मुगल शासक निरंकुश नीति को अपनाते हुए लोगों पर जुल्म करने पर उतारू हो गए थे. ऐसे में छत्रपति संभाजी राजे ने मोर्चा संभाला और मुगलों को मुंहतोड़ जवाब दिया था. उन्होंने जुल्म के खिलाफ लड़ते हुए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति तक दे दी, लेकिन मुगलों के सामने झुकना पंसद नहीं किया.

तो आईये ऐसे वीर योद्धा को जानने की कोशिश करते हैं–

9 साल की उम्र में सीखे राजनीति के गुर

छत्रपति संभाजी राजे के जन्म को लेकर कही सटीक जानकारी नहीं मिलती, लेकिन माना जाता है कि उनका जन्म 16 वीं सदी के आसपास हुआ था.

वह मराठा साम्राज्य के संस्थापक शिवाजी के बेटे थे!

वह ठीक से चलना तक नहीं सीख पाए थे कि उनकी मां सईबाई का निधन हो गया. इस समय उनकी उम्र 2 साल की ही रही होगी. मां के निधन के बाद उनका पालन-पोषण जीजाबाई ने किया.

जैसे ही वह थोड़े बड़े हुए, पिता शिवाजी ने उन्हें अम्बेर के राजा जय सिंह के साथ रहने के लिये भेजा. इस लिहाज से 9 वर्ष की उम्र से ही उन्होंने राजनीति के पाठ पढ़ने शुरु कर दिए, ताकि वह मुगलों की रणनीति को समझकर उनका जवाब दे सकें.

बाद में शिवाजी की मृत्यु के बाद वह उनके उत्तराधिकारी बने और मराठा साम्राज्य की बागडोर संभाली. उनके निजी जीवन की बात की जाए तो संभाजी महाराज ने राजनैतिक समझौते के चलते जीवूबाई से विवाह कर लिया और मराठा रीती रिवाजों के अनुसार उन्होंने उनका नाम येसुबाई रखा.

संभाजी अपनी शौर्यता के लिये प्रसिद्ध रहे. उन्होंने बेहद कम समय के शासन काल में करीब 120 युद्ध लड़े, जिनमें उनकी सेना का पराक्रम हमेशा दुश्मन पर भारी पड़ा. कहते हैं कि उन्होंने उस समय दिल्ली के बादशाह रहे औरंगजेब की नाक में दम कर रखा था.

औरंगजेब किसी भी कीमत पर उन्हें बंदी बनाना चाहता था.

Sambhaji Maratha King ( Representative Pic: marathistars)

पुर्तगालियों ने अत्याचार किया तो…

संभाजी ने जिस वक्त सत्ता संभाली उस समय मुगलों के अलावा पुर्तगालियों ने भी लोगों का जीना दुश्वार कर रखा था. प्रजा पर उनके जुल्म लगातार बढ़ते जा रहे थे. संभाजी को इसकी खबर मिली तो उन्होंने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया.

उन्होंने पुर्तगालियों पर तब तक हमले करने बंद नहीं किए, जब तक उन्होंने लोगों पर जुल्म करने बंद नहीं किए. संभाजी के सैनिक लगातार पुर्तगालियों का सर्वनाश कर रहे थे, इस कारण पुर्तगाली बौखला चुके थे.

उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करें. उन्होंने हर संभव कोशिश की संभाजी को अपने रास्ते से हटाने की,  किन्तु अंतत: उन्हें उनके सामने अपने घुटने टेकने पड़े. इस तरह 1683 आते-आते संभाजी पुर्तगालियों को पराजित करते हुए,  लोगों को उनके जुल्मों से राहत दिलाने में सफल रहे.

औरंगज़ेब का डटकर किया सामना

संभाजी मुगलों के वर्चस्व को खत्म करना चाहते थे, किन्तु यह इतना आसान नहीं था!

उनके सामने औरंगज़ेब जैसा मुगल शासक था, जो काफी ताकतवर माना जाता था. ऊपर से उसके पास अच्छी-खासी सेना के साथ कुशल रणनीतिकार भी थे.

हालांकि, उसकी क्रूरता चरम पर थी. अपनी कट्टरता के कारण वह लोगों पर किए जाने वाले अत्याचारों की सीमा पार करता जा रहा था. यहां तक कि अपनी प्रजा पर बर्बरता करते हुए इसने हिन्दुओं के सैकड़ों मंदिरों को भी तुड़वाना शुरु कर दिया था. ऐसे में किसी भी कीमत पर उसका मुकाबला जरूरी था.

संभाजी ने इस बात को समझा और औरंगज़ेब के आधिपत्य वाले क्षेत्रों में चढ़ाई शुरु कर दी. देखते ही देखते कुछ ही दिनों में उन्होंने उसकी नाक में दम कर दिया. शिवाजी ने उसके भेजे कई सेनापतियों को मार गिराया था, इसलिए वह हमेशा उनके सामने जाने से डरता रहा. कुल मिलाकर औरंगज़ेब के लिए संभाजी गले की हड्डी बन चुके थे.

माना जाता है कि औरंगजेब के सामने संभाजी के इस तरह खड़े रहने के कारण ही बाद में बीजापुर और गोलकुण्डा से मुगलों का  शासन समाप्त हुआ.

Sambhaji Maratha (Pic: sambhajimaharaj)

आखिरी सांस तक लड़ते रहे!

इसी कड़ी में आगे बढ़ते हुए वह संगमेश्वर जा पहुंचे. वहां से वह रायगढ की तरफ बढ़ने वाले थे. इसी बीच कुछ ग्रामीणों ने उनके पास आकर अपनी कुछ समस्याओं को हल करने की गुहार लगाई. इसमें समय लगता इसलिए संभाजी ने अपनी सेना का बड़ा दल रायगढ भेज दिया. साथ ही वह अपने बचे 200 सैनिकों के साथ ग्रामीणों की मदद के लिए आगे बढ़ चले.

इसी बीच उनके साले गनोजी शिर्के ने मुगलों की 5000 सैनिकों वाली विशाल सेना के साथ उन पर हमला कर दिया. असल में वह संभाजी द्वारा कोई व्यक्तिगत लाभ चाहता था, जिसके लिए संभाजी ने मना कर दिया था, इस कारण वह मुगलों से जा मिला था. संभाजी के लिए यह औचक हमला था, साथ ही उनके पास बहुत कम सैनिक थे. ऐसे में मुगल सेना का सामना उनके लिए आसान नहीं था.

वह भाग सकते थे, लेकिन उन्होंने मुगलों का डटकर मुकाबला करने का रास्ता चुना और अंत तक उनको मारते रहे. हालांकि, वह अपनी हार को टाल नहीं सके और अंतत: अपने साथी कविकलश के साथ बंदी बना लिए गए.

संभाजी का बंदी बनाया जाना औरंगजेब के लिए सुखद खबर थी. जैसे ही संभाजी को उसके सामने पेश किया गया, वह जमकर मुस्कुराया और उन पर यातनाएं शुरु करवा दीं. इस पर भी उसका मन नहीं भरा तो उसने उनकी जुबान काटते हुए आँखें निकाल लेने का आदेश दे दिया था.

गजब की बात तो यह थी कि इतनी यातनाओं के बावजूद संभाजी का साहस नहीं टूटा. वह औरंगजेब के सामने झुके तक नहीं. यह देखकर औरंगजेब बुरी तरह बौखला गया और उसने 31 मार्च 1689 को उनको मौत दे दी.

औरंगजेब ने सोचा था कि संभाजी की मौत के मराठा साम्राज्य ख़त्म हो जाएगा, लेकिन ऐसा हो न सका. संभाजी की मृत्यु के बाद मराठाओं ने एकजुट होकर उसका सामना किया और मराठा सम्राज्य को जीतने का उसका सपना, सपना ही रह गया.

Sambhaji Maratha King (Representative Pic: cndaily)

अपने लोगों लिए सारी उम्र लड़ने वाले संभाजी जी मृत्यु को भले ही प्यारे हो गए, लेकिन उनके साहस की कहानी आगे आने वाले लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बनी. शायद यही कारण रहा कि भारतीय इतिहास में उनकी वीरता के किस्सों को एक अलग दर्जा दिया गया.

इस महायोद्धा के बलिदान को आप किस प्रकार देखते हैं?

Web Title: Sambhaji Maratha King, Hindi Article

Feature Image Credit: google