भारत जब अलग-अलग राज्यों में बंटा हुआ था, तब सदियों तक राजाओं का राज रहा.

ऐसे में कई राजा आए और चल गए. अब आज़ाद भारत में राजाओं का राज तो नहीं रहा, किन्तु उनके द्वारा किए गए कार्यों और अदम्य साहस के कई किस्से आज भी मशहूर हैं.

इसी क्रम में गुप्त राजवंश के एक राजा हुए समुद्रगुप्त!

वही समुद्रगुप्त जिन्हें, भारत का तक नेपोलियन तक कहा गया!

उन्होंने न सिर्फ कई विदेशी शक्तियों को पराजित कर अपनी शक्ति का लोहा मनवाया, बल्कि अपने बेटे विक्रमादित्य के साथ मिलकर भारत के स्वर्ण युग की शुरुआत की.

तो आईये भारतीय इतिहास में दर्ज उनकी गौरव गाथाओं को जानते हैं-

शासन से पहले अपनों से लड़ाई!

समुद्रगुप्त का जन्म कब और कहाँ हुआ, इसके कहीं पुख्ता प्रमाण नहीं मिलते. हां उनके शासन काल का जिक्र जरूर मिलता है, जोकि 330 – 380 ई. के आसपास रहा .

समुद्रगुप्त बचपन से ही कुशाग्र थे. उनके अंदर एक राजा वाले सारे गुण मौजूद थे. यही कारण रहा कि उनके पिता चंद्रगुप्त ने अपने अनेक पुत्रों में से उन्हें ही अपना उत्तराधिकारी चुना और अपने जीवनकाल में ही समुद्रगुप्त को शासन सौंपने का मन बना लिया था.

चंद्रगुप्त का यह फैसला कुछ लोगों को पसंद नहीं आया. खासकर समुद्रगुप्त के भाइयों को. उन्होंने इसका जमकर विरोध किया. यहां तक कि उन्होंने युद्ध तक छेड़ दिया था.

वह बात और है कि समुद्रगुप्त ने उनको कड़ी टक्कर दी और उनको मात देते हुए अपनी दावेदारी को पुख्ता किया. इसके बाद तो जैसे उनके हौंसलों को पंख लग गए. उन्होंने खुद को पूरी तरह से गुप्तवंश के विस्तार में झोंक दिया.

जिस समय समुद्रगुप्त सिंहासन पर बैठे, उस समय गुप्त राज्य बहुत छोटा था. सारा देश अनेक छोटे-छोटे भागों में बंटा हुआ था. इन राज्यों में परस्पर शत्रुता देखी जाती थी. ऐसे में समुद्रगुप्त ने निश्चय किया कि वह अनेक राज्यों को जीतकर अपने सम्राज्य का विस्तार करेंगे. शक्तिशाली साम्राज्य बनाने का उन्होंने दृढ निश्चय किया.

साथ ही निकल बड़े पूरे भारत को जीतने.

Samudragupta (Pic: swamirara)

…ऐसे बने भारत के नेपोलियन!

भारत जीतने के लिए चलाए गए उनके ज्यादातर अभियान हर क्षेत्र में कामयाब रहे. अपने पहले आर्यावर्त युद्ध में उन्होंने अपने विरोधी तीन राजाओं को हराकर अपनी विजय पताका फहराई.

इसके बाद उन्होंने दक्षिणापथ के युद्ध में दक्षिण के बारह राजाओं को चित्त कर दिया. इस युद्ध की खास बात तो यह थी कि वह चाहते तो हारे हुए राजाओं को मार सकते थे, किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया. इसके पीछे शायद उनकी कोई दूरदर्शी सोच रही होगी.

राज्यों का जीतने का सिलसिला यूंही आगे बढ़ता रहा, इसके तहत उन्होंने एक बार फिर से आर्यावर्त के द्वितीय युद्ध में अपने विरोधी शासकों का सामना किया और उन्हें अपने दम का एहसास कराया. इसी क्रम में उन्होंने कई विदेशी शक्तियों को भी अपनी शक्ति का लोहा मानने पर मज़बूर कर दिया.

कहते हैं कि उनसे काल खंड में उनका कोई भी ऐसा विरोधी नहीं था, जो उनके समाने पल भर भी खड़ा हो सका हो. कहते हैं कि जब तक उन्होंने संपूर्ण भारत पर विजय प्राप्त नहीं की,  तब तक उन्होंने एक दिन भी आराम नहीं किया. वह अपने राज्य को उत्तर में हिमालय, दक्षिण में नर्मदा नदी, पूर्व में ब्रह्मपुत्र नदी और पश्चिम में यमुना नदी तक फैलाने में सफल रहे. शायद यही कारण है कि उन्हें भारत का नेपोलियन तक कहा गया.

‘प्रयाग प्रशस्ति’ नामक अभिलेख में समुद्रगुप्त गौरवगाथा विस्तार से पढ़ने को मिलती है. एक प्रकार से वह समुद्रगुप्त काल ऐतिहासिक घटनाओं का दर्पण है, जिसे समुद्रगुप्त के ही दरबारी कवि हरिषेण ने तैयार किया था.

Samudragupta king Of Gupta Empire (Pic: indiancontents)

सिर्फ एक योद्धा नहीं थे समुद्रगुप्त…

पराक्रम से अलग हटकर बात करें तो वह वीणा बजाने में भी कुशल थे. उन्हें संगीत की अच्छी समझ थी. वह बहुत अच्छे संगीतकार थे. उनके द्वारा बनवाया गए कई सिक्कों में इसकी झलक देखने को मिलती है. उनमें वह वीणा लिए हुए नज़र आते हैं.

इसके अलावा वह एक कवि के रूप में विख्यात रहे. अपने समय में उन्हें कवियों का राजा भी बोला जाता था. कहते हैं कि अक्सर वह अपनी सभाओं में कविता पाठ करते थे. हालांकि, उनकी रचनाओं का संकलन कहीं नहीं मिलता, जिस कारण कई लोग इसे पूरा सच नहीं मानते.

भारत में मुद्रा के चलन में भी समुद्रगुप्त की भूमिका को अहम माना जाता है. उन्होंने शुद्ध स्वर्ण की मुद्राओं तथा उच्चकोटि की ताम्र मुद्राओं का प्रचलन करवाया. अपने शासनकाल में उन्होंने मुख्यत: सात प्रकार के सिक्कों को बनवाना शुरू किया, जोकि आर्चर, बैकल एक्स, अश्वमेघ, टाइगर स्लेयर, राजा और रानी एवं लयरिस्ट नामों से जाने गए.

वैवाहिक जीवन की बात की जाए तो समुद्रगुप्त ने कई शादियां की, लेकिन किसी से उन्हें पुत्र की प्राप्ति नहीं हई. पुत्र की प्राप्ति उन्हें अपनी पटरानी अग्रमहिषी पट्टमहादेवी से हुई. उनसे ही इसी से चंद्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य का जन्म हुआ था, जिसने बाद में गुप्त साम्राज्य को और आगे बढ़ाया.

Samudragupta Coin (Pic: coinindia)

अपने शानदार शासनकाल के बाद 380 के आसपास समुद्रगुप्त ने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं. वह भले ही अब दुनिया में नहीं हैं, किन्तु उनके व्यक्तित्व का हर एक पहलू आज भी लोगों को प्रेरित करता है, फिर चाहे वह उनकी शौर्य गाथाएं हो या फिर संगीत आदि से उनका खास लगाव.

आप क्या कहेंगे इस महापुरुष के बारे में?

Web Title: Samudragupta king Of Gupta Empire, Hindi Article

Feature Image Credit: wallpaperup