जहां तक नजर ले जाओ वहां तक बर्फ की चादर ओढ़े दिखते हैं तो बस ऊंचे-ऊंचे पहाड़.

माइनस 20 डिग्री सेल्सियस का तापमान जहां कोई भी इंसान कुछ ही मिनटों में दम तोड़ सकता है, वहीं अचानक ही किसी के कदमों की आहट होती है और फिर हवा को चीरती हुई एक गोली अचानक ही एक आदमी के पैर में लगती है.

वह घायल होकर बर्फ पर गिर पड़ता है. वह फिर से खुद को खड़े करने की कोशिश करता है, अपनी राइफल को तैयार करके चारों ओर देखता है कि तभी एक और गोली उसकी छाती को छलनी कर जाती है.

वह आखिरी सांस लेने से पहले उस बंदूक को देखना चाहता है, जिससे गोली चली पर उसे सफेद बर्फ के सिवा कुछ और दिखाई नहीं देता. कुछ ही देर में बर्फीली धुंध उसके चेहरे पर जम जाती है और फिर वही पहले सा सन्नाटा पसर जाता है.

यह किसी फिल्म की कहानी नहीं एक असली घटना का महज़ एक छोटा सा हिस्सा है.

यह उस शख्स की काहानी है जो रूसी सैनिकों के लिए काल बनके आया था. जिसे लोग ‘वाइट डेथ’ के नाम से जानते थे.

आखिर कौन था यह व्यक्ति और क्यों वह एक-एक कर रूसी सैनिकों को मार रहा था. चलिए जानते हैं–

किसान के बेटा बना स्नाइपर

सीमो की पारिवारिक पृष्ठभूमि बेहद साधारण थी. उनका जन्म किसी सोल्जर के परिवार में नहीं बल्कि फिनलैंड के गांव कारेलिया में एक किसान के परिवार में 17 दिसंबर 1905 में हुआ था. वह 8 भाई—बहनों में 7वें पुत्र थे. परिवार में छोटे होने के कारण सबके बहुत लाड़ले रहे.

पिता और अन्य भाई खेतों में काम करते थे, इसलिए सीमो भी 14 साल की उम्र से अपने खेतों में काम करने लगे. दिन भर काम करना और वक्त मिलने पर फिनिश के जंगलों में शूटिंग की प्रैक्टिस करना, बस यही सीमो की जिंदगी थी.

पहले विश्वयुद्ध की समाप्ति के कुछ ही सालों बाद दुनिया के ताकतवर देश एक बार फिर अपनी सत्ता कायम करने की कोशिश में एक-दूसरे से लड़ बैठे थे. फिनलैंड रूस की सत्ता से अब आजाद हो चुका था, लेकिन यह आजादी ज्यादा वक्त तक कायम नहीं रही.

रूस-फिनलैंड सीमा पर आए दिन विवाद होते रहते थे.

फिनलैंड में परिवार के एक नौजवान सदस्य का सेना में कम से कम एक साल तक कार्य करना अनिवार्य कर दिया गया था. सीमो ने अपने परिवार से यह जिम्मेदारी निभाई और फिनलैंड की सेना में शामिल हो गए.

बचपन से शूटिंग करने वाले सीमो सेना में आके भी वही काम करने लगे. उन्हें निशानेबाजी की इतनी समझ थी कि उसे देख उन्हें सेना में स्नाइपर की भूमिका दे दी गई. यहीं से सीमो का एक बड़ा स्नाइपर बनने की कहानी शुरू हुई.

He Is Used To Do Shooting From Early Age (Representative Pic: pintrest)

रूस ने शुरू की ‘जंग’

रूस और फिनलैंड के बीच दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत से ही मतभेद चलते रहते थे. जैसे ही दूसरे विश्व युद्ध का आगाज हुआ रूस को उन पर सीधा हमला करने का मौका मिल गया.

रूस ने 1939 में फिनलैंड पर एक बार फिर आक्रमण कर दिया था. यह आक्रमण पुराने सीमा विवाद को हवा देने के लिए किया गया था पर इस बार रूस ने पहले से ज्यादा ताकत जुटाई थी. तभी सीमो को युद्ध क्षेत्र में तैनात होने का मौका मिला.

चूंकि यह जंग सर्दियों के दिनों में हुई इसलिए इतिहास में इसे ‘विंटर वॉर’ का नाम दिया गया. फिनलैंड-रूस सीमा का रास्ता बर्फीला था… जंग के दौरान यहां शीत लहर चलती थी और तापमान माइनस 40 से माइनस 20 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता था.

ऐसे में जंग लड़ना आसान नहीं था. चूंकि मैदान साफ था और छिपने के लिए कोई जगह नहीं थी इसलिए फिनलैंड के सैनिकों को खतरा महसूस हो रहा था.

सीमो कोला नदी पर जेआर 34 की 6वीं कंपनी के साथ तैनात थे. उनके पास एक एम91 राइफल और दूरबीन था. यह रूसी सैनिकों का सामना करने के लिए पर्याप्त नहीं था पर उन्हें इसी सामान से काम चलाना था.

रूस के सैनिकों को बर्फीली मौसम में लड़ाई करने का एक अच्छा अनुभव था. वहीं सीमो के लिए यह उनकी पहली जंग थी.

जंग से पहले तैयार की ‘रणनीति’

सीमो रूसी सैनिकों का सामाना करने से पहले उनके खिलाफ रणनीति बनाने में जुट गया. उसने एक कंपनी की मदद से एक ख़ास सफेद रंग की पोशाक तैयार करवाई. उसके साथ सफेद जूते, दास्ताने और चेहरे के लिए मास्क भी सीमो ने तैयार करवाया.

इतना ही नहीं उन्होंने अपनी बंदूक पर भी सफ़ेद रंग चढ़ा दिया. जब वह यह पोशाक पहनकर तैयार हुआ तो केवल उनकी आंखें दिखाई दे रही थीं. सफेद बर्फ में उन्हें पहचान पाना आसान नहीं था.

ऐसा सीमो ने इसलिए किया क्योंकि रूसियों की नजरों से बचने के लिए उनके पास कोई जगह नहीं थी. इसलिए उन्होंने बर्फ को ही अपने छुपने का सहारा बना लिया.

अब मुख्य चुनौती थी, जिस राइफल को वह इस्तेमाल कर रहे थे उससे 150 मीटर की अधिकतम दूरी तक ही निशाना लगाया जा सकता था. इसलिए उन्हें बिना किसी की नजर में आए सैनिकों के पास आने का इंतजार करना था.

सीमो पूरी तरह से अपनी रणनीति बना चुके थे.

अब उन्हें इंतज़ार था रूसी सैनिकों के आने का!

He Planned To Beat Russia In Snow (Pic: whaleoil)

…फिर आई वो सुबह

सीमो ने अपनी रणनीति तैयार करके जंग की पूरी तैयारी कर ली थी. वह ऐसा करने वाले अपनी कंपनी के अकेले सैनिक थे. उन्होंने पूरी तैयारी कर कोला नदी के पास ही बर्फ के पीछे खुद को छिपा लिया.

वहां से रूसी सैनिकों का निकलना तय था. सीमो हमले के लिए बिल्कुल तैयार था. उन्होंने दूरबीन से रूसी सैनिकों को आते हुए देखा और अपनी राइफल तैयार की. अपनी नजर उन्होंने स्नाइपर के स्कोप पर रखी और तैयार हो गए जंग के लिए.

सैनिकों की टुकड़ी धीरे-धीरे बिखरने लगी. वह भी तैयार हो रहे थे फिनलैंड की सेना से लड़ने के लिए मगर उन्हें नहीं पता था कि वहां सेना नहीं अकेले सीमो ही हैं.

जैसे ही कुछ सैनिक सीमो की रेंज में आए उन्होंने गोली चला दी. सभी सैनिकों ने पहले आवाज सुनी और फिर अपने साथी को गिरते हुए देखा. किसी को नहीं पता चला कि आखिर गोली आई कहाँ से? वह सब गोली चलाने वाले को ढूंढ ही रहे थे कि तभी एक और गोली चली और एक और सैनिक मारा गया.

देखते ही देखते दर्जन भर से ज्यादा रूसी सैनिक मर गए थे और बाकी बचे अपनी जान की सलामती की दुआ मांग रहे थे. उसके बाद जैसे ही अँधेरा हुआ रूसी सेना थोड़ी दूर चली गई और सीमो भी वापस अपने सेफ हाउस आ गए.

सीमो ने अगले हमले के लिए दूसरे दिन का इंतजार किया. इस बार उन्होंने बराबरी से नहीं बल्कि पीछे से वार करने की योजना तैयार की. सीमो ने रुसी सैनिकों की टुकड़ी पर पीछे से हमला किया. इस बार भी उनकी तरकीब काम कर गई और फिर उन्होंने कई सारे रूसी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया. ये सिलसिला रोजाना ऐसे ही चलता रहा.

कोई नहीं जानता था कि बर्फ में वहां कौन उन पर हमला कर रहा है. हालांकि इस बात की खबर सबको लग गई थी कि कोई है जो रूसी सैनिकों के लिए काल बना हुआ है. अखबारों में भी सीमो का ज़िक्र होने लगा था.

लोग उन्हें असली नाम से तो नहीं जानते थे इसलिए उन्हें दूसरा नाम दिया गया ‘वाइट डेथ’!

Simo Haya Killed More Than 500 Russian Soldiers (Representative Pic: pintrest)

घायल हो गया ‘वाइट स्नाइपर’

सीमो ने 100 दिन में 505 रूसी सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया था!

अकेले!

वह 6 मार्च 1940 को फिर पूरी तैयारी के साथ तैनात थे, पर इस बार रूसी सैनिक ज्यादा सतर्क थे. जैसे ही उन पर हमला हुआ वह चारों दिशाओं में बंट गए.

सीमो ने गोली चलाना जारी रखा पर रूसी सैनिकों ने गोली के आने की दिशा से सीमो का पता लगा लिया और उस ओर विस्फोटक फेंकना शुरू कर दिया. इसी दौरान गोलीबारी भी हुई और रूसी सैनिक की एक गोली सीमो के चेहरे को चीरती हुई निकल गई.

वह निढ़ाल हो के बर्फ में गिर गए. रूसी सैनिक जानते थे कि अब उनका पास मौका है अपने छिपे हुए दुश्मन को ढूँढने का. वह चारों तरफ बिखर गए सीमो को ढूँढने के लिए मगर उन्हें ढूंढ नहीं पाए. वह चुप-चाप बिना हिले बर्फ में पड़े रहे. जैसे ही रूसी सैनिक वापस चले आगे वह अधमरी हालत में अस्पताल तक गए.

डॉक्टरों ने सीमो की जान बचा ली थी. वहीं दूसरी ओर रूसी सोच रहे थे कि उनका दुश्मन मारा जा चुका है.

अचानक ही जाग उठा ‘व्हाइट डेथ’

सीमो की जान तो बच गई थी मगर वह कोमा में चले गए थे. उनकी असिलयत लोगों के सामने भी आ चुकी थी. वाइट डेथ अब शांत हो चुका था. वहीं दूसरी ओर रूस और फिनलैंड का विवाद भी खत्म होने की कगार पर आ चुका था.

दोनों ही देशों ने शांति समझोते पर हामी भर दी थी. दोनों के बीच की लड़ाई ख़त्म हो गई थी. जैसे ही जंग खत्म हुई सीमो भी कोमा से जाग गए. गोली के कारण उनका चेहरा काफी ख़राब हो गया था. उन्हें पता चला कि अब जंग ख़त्म हो गई है तो उन्होंने सेना की नौकरी छोड़ दी.

वह अपनी सेवाएं दे चुके थे और अब अपने परिवार के साथ समय बिताने निकल पड़े थे. इसके बाद उन्होंने सेना के लिए कोई लड़ाई नहीं की. इसके बाद वह सारी उम्र एक किसान की तरह ही जीते रहे.

Simo Left Army After The War (Pic: tvtropes)

सीमो के बाद कोई भी स्नाइपर ऐसा नहीं आया जिसने ऐसा कारनाम किया हो. यही कारण है कि सीमो का नाम इतिहास में अमर हो गया. यह उनकी प्रतिभा और देश रक्षा की भावना ही थी जिसके चलते उन्होंने इस मुश्किल काम को भी अंजाम दिया.

आप क्या कहेंगे इस ‘वाईट डेथ’ के बारे में?

Web Title: Simo Hayha The White Death, Hindi Article

Feature Image Credit: pintrest