‘नज़रिया’ कहने और सुनने को बहुत छोटा सा शब्द है, किन्तु गौर करें तो मनुष्य ने जो जानवर से इंसान बनने का सफ़र तय किया उसका मुख्य आधार ये नज़रिया ही रहा है. जैसा कि हम सबने यही सुना है कि मानव की उत्पत्ति एक जानवर के रूप में हुई थी, जो आज के इंसानों की तरह व्यावहारिक नहीं था.

ज़रा सोच कर देखिए कि अगर उस समय किसी ने प्रकृति अथवा उसके नियमों को अलग नज़रिए से ना देखा होता तो क्या आज हम इस आधुनिक युग में जी रहे होते ?

शायद नहीं!

निश्चित रूप से हम आज भी जानवरों की तरह ही जी रहे होते.

हम सब के बीच कुछ ऐसे लोग होते हैं, जो संसार और जीवन को एक अलग ही नज़रिए से देखते हैं और अक्सर ऐसे ही लोग औरों के जीवन में बदलाव लाते हैं. साथ ही आने वाली पीढ़ी को ज्ञान की एक नयी राह दिखाते हैं. सुकरात ऐसे ही एक दार्शनिक थे. कहते हैं कि समाज में बदलाव के लिए उन्होंने हँसते-हँसते ज़हर तक पी लिया था.

तो आईये दुनिया को एक नए नज़रिए से देखने वाले इस महान दार्शनिक के जीवन से जुड़े कुछ पहलुओं को देखने की कोशिश करते हैं–

बचपन से थी संगीत में खासी दिलचस्पी

महान दार्शनिक सुकरात का जन्म 470 ईसा पूर्व ग्रीस के एथेंस में एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ. इनके पिता सोफ्रोनिस्कस एक मूर्तिकार और माता फेनारेटे एक दाई थीं. अपनी माँ का उदाहरण देते हुए सुकरात ने कहा है कि ‘मेरी माँ एक दाई थीं.

सुकरात के दौर में सभी एथेनियन पुरुषों का पढ़ना एवं लिखना अनिवार्य था. इस लिहाज से सुकरात के पिता सोफ्रोनिस्कस ने भी अपने पुत्र को पढ़ाने का मन बनाया. उन्होंने कई कठिनाइयों का सामना करते हुए सुकरात को काव्य, संगीत अथवा एथलेटिक्स की शिक्षा दिलाई.

सुकरात शुरु से ही संगीत, काव्य और घरेलू खेलकूद में काफ़ी हद तक निपुण थे. माना जाता है कि जब तक सुकरात का ध्यान दर्शनशास्त्र की तरफ आकर्षित नहीं हुआ था, तब तक उन्होंने अपने पिता के काम में हाथ बंटाया.

वहीं कुछ समय के लिए उन्होंने एथेंस की सेना में पैदल सिपाही के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं. इस दौरान उन्होंने डेलियम एम्फिपोलिस, पेलेपोन्नेसियन युद्ध तथा पोटेडिया सहित तीन युद्धों में हिस्सा लिया. यहाँ उन्होंने लोकप्रिय ऐथेनियन जनरल एल्किबिएडस की जान बचाई और युद्ध के मैदान में अपने साहस और निडरता के लिए विख्यात हुए.

Socrates (Pic : Greek)

सवाल पूछने की आदत ने बनाया दार्शनिक!

वह अपना अधिकतर समय एथेंस के सभा भवन में बिताया करते थे. सुकरात के लिए एथेंस एक कक्षा के समान और वहां आने वाले लोग विद्यार्थी के समान थे. वह वहां के विद्वान लोगों से राजनीति और नैतिकता से सम्बंधित प्रश्न पूछते थे.

दिलचस्प बात यह थी कि ज्ञानी होने के बावजूद सुकरात अपने ज्ञान के बारे में कभी बात नहीं करते थे, अपितु वह खुद के अज्ञानी होने का दावा करते थे. वह सामने वाले को ऐसा आभास कराते थे, मानो उन्हें पूछे गए प्रश्न के संबंध में कुछ भी अनुमान नहीं.

यही नहीं वह अपने ऐथेनियन साथियों से द्वंदात्मक तरीके से सवाल पूछते थे, जो वहां मौजूद सभी लोगों को पूछे गए सवाल पर तर्कसंगत तरीके से विचार करने पर विवश कर देता था. उनकी इस आदत की वजह से वह बहुतों के बीच विद्वान कहलाए.

हालांकि, कुछ लोगों ने उन्हें बदनाम भी किया.

सुकरात कितने विद्वान थे, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि प्लेटो उनसे काफ़ी प्रभावित रहे. इतने प्रभावित के उनके शिष्य तक बन गए थे. कहते हैं कि जब भी सुकरात शहर के किसी विद्वान से पूछताछ करते थे, तब वह भी उनकी बातों का आनंद उठाया करते थे.

Socrates In Agora (Pic : Spiked)

सत्य से अवगत कराने में माहिर

पश्चिमी बौद्धिक प्रक्रिया में सुकरात की पद्धति उनका सबसे बड़ा योगदान माना जाता है. इसी के द्वारा उन्होंने विभिन्न अवसरों पर न्याय अथवा अच्छाई जैसी अवधारणाओं का परीक्षण किया. इसमें वह किसी भी समस्या को हल करने के लिए उसे प्रश्नों की श्रृंखला का रूप दे देते थे. इस तरह से उन प्रश्नों के जो उत्तर सामने से आते, वह वहां मौजूद लोगों को संतुष्ट कर देते.

आज की वैज्ञानिक पद्धति में किसी भी परिकल्पना को तैयार करने के लिए सुकरात की इसी पद्धति का उपयोग किया जाता है. सुकरात को इस बात का विश्वास था कि ‘आत्मा अमर है’ तथा भगवान ने उन्हें अपने दिव्य दूत के रूप में पृथ्वी पर भेजा है. वहीं सुकरात का यह भी मानना था कि बच्चों के लिए नैतिक उत्कृष्टता माता-पिता द्वारा किए गए पालन पोषण से ज़्यादा महत्व रखती है.

सुकरात की खास बात यह थी कि वह लोगों को केवल सत्य से अवगत करते थे. उन्होंने अपनी बातें अथवा उनके साथ हुई घटनाओं को कभी भी पन्नों पर नहीं उकेरा. हालांकि उन्होंने अपने समय में ज्ञान के जो बीज बोये थे, उनसे जन्में वृक्षों ने ही सुकरात के अनमोल विचारों रूपी खजाने को दुनिया के सामने पेश किया.

यदि सुकरात को प्लेटो और एक्सनोफोन जैसे शिष्य ना मिले होते तो शायद दुनिया सुकरात जैसे महान दार्शनिक के बारे में जान भी ना पाती. आज अगर दुनिया सुकरात को जानती है, तो वह सिर्फ प्लेटो द्वारा रचित किताब अपॉलोजी में लिखे सुकरात के संवादों की वजह से. सिकंदर भी अगर महान कहलाया तो उसका श्रेय भी कहीं ना कहीं सुकरात को ही जाता है.

असल में सुकरात के शिष्य प्लेटो ने अरस्तु को शिक्षा दी और जिस कारण अरस्तु सिकंदर के महान गुरु बने.

Socrates Asking Qustions (Pic : Originalpositions)

कानून तोड़ने से अच्छा ज़हर पीना समझा

सुकरात हमेशा एथेंस के युवाओं को सद्गुण के मार्ग पर ले जाने के लिए प्रयासरत रहे. उनकी धर्म में गहरी आस्था थी. वह कानून का भी पूरी तरह से पालन करते थे. किन्तु, किसी ने सही कहा है कि ‘इस धरती पर पुण्यात्माओं को बुरे लोगों द्वारा स्वीकार नहीं जाता’.

सुकरात भी ऐसे ही बुरे लोगों का शिकार हुए, जिन्होंने उन पर तीन बड़े आरोप लगाए.

पहले आरोप के तहत कहा गया कि सुकरात देश में प्रचलित देवताओं को नहीं मानते हैं. उन पर दूसरा बड़ा आरोप यह लगा कि वह लोगों के बीच नए देवताओं को प्रतिष्ठित कर रहे हैं और तीसरे आरोप के तहत कहा गया कि वह एथेंस के युवकों को गुमराह कर रहे हैं. गजब की बात यह थी कि उन पर सिर्फ आरोप नहीं लगे, बल्कि उन्हें इसके लिए दंड भी दिया गया.

उन्हें जेल में डालते हुए मृत्यु दंड का आदेश दिया गया था.

यह सुकरात के मित्रों के लिए सहज नहीं था, इसलिए उन्होंने उन्हें जेल से आजाद कराने की योजना बना डाली. इसके तहत उन्होंने जेल के एक सिपाही को धन दिया, किन्तु सुकरात ने इसको गलत ठहराते हुए नकार दिया.

असल में वह किसी भी कीमत पर अपने देश के कानून की अवहेलना नहीं करना चाहते थे.

उन्होंने अपने अंतिम समय में कहा कि ‘अब घड़ी आ गई है कि हम अपनी राह अलग कर लें. आप जीवन की राह पर बढ़ें तथा मैं मृत्यु की!

दोनों में से अधिक आनंदमय कौन सी राह है, इसे ईश्वर पर छोड़ दें.”

यह कहते हुए सुकरात ने हँसते हुए ज़हर का प्याला पी लिया और मृत्यु को प्यारे हो गए.

Socrates’s Prison Athens (Pic : Ancient)

आज हम जो सुख भोग रहे हैं, इसका कारण सुकरात जैसी वो पुण्यात्माएं ही हैं, जिन्होंने समाज में बदलाव लाने के लिए अपने प्राणों तक की परवाह नहीं की.

सुकरात भले ही अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन अपने अनमोल विचारों में वह हमारे लिए सदैव जीवित रहेंगे. वैसे भी अच्छे विचार उस खुश्बू की तरह होते हैं, जिनकी महक फूलों के कुचल जाने के बाद भी जीवित रहती है.

आपके क्या विचार हैं इस महान दार्शनिक के बारे में, कमेन्ट-बॉक्स में अवश्य बताएं!

Web Title: Socrates : Father of Western Philosophy, Hindi Aricle

Feature Image Credit: Wikipedia