2001 में आई फिल्म ‘गदर’ आप सभी ने देखी होगी. वैसे तो यह पूरी फिल्म शानदार थी. फिर भी अगर आपसे इस फिल्म का सबसे शानदार सीन पूछा जाये तो, आपकी आंखों में सनी देओल की वह तस्वीर सामने आ जायेगी, जिसमें वह अपने हाथों में हैण्डपंप लिए होते हैं. उन्होंने हैण्डपंप को सिर्फ इसलिए उखाड़ लिया होता है, क्योंकि उनसे जबरन इस्लाम कबूल कराया जा रहा था और भारत के विरुद्ध नारेबाजी कराई जा रही थी. ऐसा ही कई सदियों पहले पंजाब के एक 14 साल के लड़के के साथ करने का प्रयास किया गया था, जिसे उसने साहस से नकार दिया था…

हालांकि, उसने सनी देओल की तरह कोई हैंडपंप तो नहीं उखाड़ा था. पर हां अपने साहस से बड़े-बड़ों की जमीन जरुर उखाड़ दी थी. अंत में उसने यह कहते हुए मौत को गले लगा लिया कि मुझे मौत कबूल है, लेकिन इस्लाम नहीं! इस 14 साल के लड़के का नाम था बालवीर हकीकत राय. तो आइये जानते हैं उनसे जुड़ी जीवन के कुछ कहानियों को:

महज 5 साल की उम्र में दी बड़े-बड़ों को मात

1719 में पंजाब के सियालकोट के व्यापारी लाला बागमल पूरी के घर एक बच्चे ने जन्म लिया, जिसका नाम रखा गया हकीकत राय. शुरुआत में हर पिता की तरह लाला बागमल भी अपने बच्चे के भविष्य को लेकर चिंतित थे. जल्द ही उन्होंने हकीकत राय का पढ़ाई शुरु करा दी. पर उन्हें नहीं पता था कि महज 4-5 साल की उम्र में उनका बेटा इतिहास तथा संस्कृत आदि विषय का अध्‍ययन इस तरह कर लेगा कि बड़े-बड़े खुद को उसके सामने बौना महसूस करने लगेंगे. चूंकि उस समय देश के सभी राजनितिक और प्रशासिनक कार्यो के लिये फ़ारसी भाषा लागू थी. सभी काम भी फ़ारसी में ही होते थे. इसलिए बागमल पूरी ने अपने पुत्र को फ़ारसी सिखाने का फैसला लिया.

मां भगवती के सम्मान के लिए लिया लोहा

जल्द ही पिता ने फारसी सीखने के लिए हकीकत का दाखिला एक मदसरे में करा दिया. ताकि उनके पढ़े-लिखे लड़के पर कोई यह कहावत न कहे कि, हाथ कंगन को आरसी क्या,और पढ़े लिखे को फ़ारसी क्या. हकीकत ने भी पिता का भरोसा नहीं तोड़ा और तेजी से फारसी सीखनी शुरु कर दी. वह बहुत कम समय में एक अच्छे स्टूडेंट बन गये थे. इस कारण उनके मुसलमान सहपाठी उनसे नफरत करने लगे.

एक दिन मौलवी साहब के आने से पहले कुछ सहपाठियों ने हकीकत राय के सामने मां भगवती का अपमान करना शुरु कर दिया. शुरु में तो हकीकत राय कुछ नहीं बोले, लेकिन जब साथियों ने हद कर दी तो उन्होंने अपने विरोध का सुर तेज कर दिया. उन्होंने साथियों से कहा, क्या यह आपको अच्छा लगेगा यदि यही शब्द मैं आपकी बीबी फातिमा (मोहम्मद की पुत्री) के लिए कहूं.

आप को भी अन्य के प्रति ऐसे शब्द नही कहने चाहिये. इस पर मुस्लिम बच्चों ने शोर मचा दिया कि इसने बीबी फातिमा को गालियां निकाल कर इस्लाम और मोहम्मद का अपमान किया है. साथ ही उन्होंने हकीकत के साथ हाथापाई भी की. दुर्भाग्य की बात तो यह थी कि मदरसे के मौलवी ने भी मुस्लिम बच्चों का ही पक्ष लिया.

…और शुरु हो गई धर्म परिवर्तन की कवायद

जल्द ही यह बात सारे स्यालकोट में फैल गई. लोगों ने हकीकत को पकड़ कर स्थानीय हाकिम अदीना बेग के समक्ष पेश किया. वह समझ गया कि यह बच्चों का झगड़ा है, मगर मुस्लिम लोग उससे मृत्यु-दण्ड की मांग करने लगे. हकीकत राय के माता-पिता ने भी दया की याचना की. तब अदीना बेग ने कहा, मै मजबूर हूं, परन्तु यदि हकीकत इस्लाम कबूल कर ले तो उसकी जान बख्श दी जायेगी. किन्तु वीर हकीकत राय ने धर्म परिवर्तन से इंकार कर दिया. अब तो काजी, मौलवी और सारे मुसलमान उसे मारने को तैयार हो गए.

ऐसे में उनके पिता बागमल के मित्रों ने कहा कि स्याकोट का वातावरण बहुत बिगड़ा हुआ है, यहां हकीकत के बचने की कोई आशा नही है. ऐसे में तुम्हे पंजाब के नवाब ज़करिया खान के पास लाहौर में फरियाद करनी चाहिये. बागमल ने ऐसा ही किया और मामला लाहौर पहुंच गया.

Stories of veer Hakikat Rai (Pic: agniveer.com)

डर और प्रलोभन भी नहीं तोड़ पाये साहस

हकीकत को लाहौर के लिए रवाना कर दिया गाया. मौलवियों को इसका पता लगा तो वह हकीकत के पीछे-पीछे चल दिए. सारे रास्ते वो हकीकत राय को डराते धमकाते रहे, तरह-तरह के लालच देते रहे और गालियां निकालते रहे, लेकिन हकीकत का साहस नहीं तोड़ पाए. आखिर दो दिन की यात्रा के बाद हकीकत राय एक बन्दी के रुप में लाहौर पहुंच गये. अगले दिन उसे पंजाब के तत्कालिक सूबेदार ज़करिया खान के समक्ष पेश किया गया.

यहां भी हकीकत के स्यालकोट से आये मुस्लिम सहपाठियों, मुल्लाओं और काजियों ने हकीकत राय को मौत की सजा देने की मांग की. नवाब ज़करिया खान समझ तो गया की यह बच्चों का झगड़ा है, मगर मुस्लिम उलमा हकीकत की मृत्यु या मुसलमान बनने से कम पर तैयार न थे.

तर्क सुनकर सूबेदार ने झुकाया लिया था सिर

लाहौर के सूबेदार ने सारे मामले को ध्यान से पढ़ा और सुना. फिर बोले, हकीकत बेटा मेरी बात मान ले और मुसलमान बन जा, मैं अपनी सुन्दर बेटी का विवाह तेरे साथ कर दूंगा. बेटा मैं पुत्रहीन हूं अगर तू मेरी पुत्री से निकाह कर लेगा तो मेरी सारी सम्पति का मालिक बन जाएगा. जिन्दगी भर मौज उड़ाएगा. अरे हकीकत अब तू ठीक तरह से सोच समझकर उत्तर दे बेटा. हकीकत राय ने मुस्कराते हुए जवाब दिया, क्या आप भी क्या सदा जीवित रहेंगे?

नवाब ने सिर नीचा करके कहा, बेटा संसार में जो जन्म लेता है वह अवश्य ही मरता है. मैं भी मरूंगा, तू भी मरेगा और यह काजी मौलवी भी जरुर मरेंगे. यह सृष्टि का है नियम अटल, जो इस दुनिया में आता है, उसे एक दिन जाना पड़ता है.

बताया… क्यों नहीं बनना था उन्हें मुसलमान!

हकीकत ने मुसलमान बनने से इंकार करते हुए एक बार फिर लाहौर के सूबेदार से पूछा, यदि मैं मुसलमान बन जाऊ तो क्या मुझे मौत नहीं आएगी? क्या मुसलमानों को मौत नही आती? तो उन्होंने कहा, मौत तो सभी को आती है. तब हकीकत राय ने कहा, तो फिर मै अपना धर्म क्यों छोड़ू़, जो सभी को ईश्वर की सन्तान मानता है. मैं ऐसे इस्लाम को क्यों कबूल करुं, जो मेरे दोस्तों द्वारा मां भगवती को कहे अपशब्दों को सही ठहराता है, और मेरे न कहने पर मुझसे जीवित रहने का भी अधिकार छीन लेता है.

मै ऐसे धर्म को दूर से ही सलाम करता हूं, जो दूसरे धर्म के लोगों को गालियां निकालना, उन्हें लूटना, उन्हें मारना और उन्हें पग-पग पर अपमानित करना अल्लाह का हुक्म मानता हो.

मां-बाप का प्यार भी न कर पाया कमजोर

हकीकत के इरादों को देखकर उनके माता-पिता को लगने लगा कि वह नहीं मानेंगे. फिर भी उन्होंने सूबेदार से एक दिन का समय मांगा, जिससे वो हकीकत राय को समझा सके. उन्हें समय दे दिया गया. रात को हकीकत राय के माता-पिता उसे जेल में मिलने गए. उन्होंने भी हकीकत राय को मुसलमान बन जाने के लिये तरह-तरह से समझाया.

मां खूब रोई अपने दूध का वास्ता तक दिया. मगर हकीकत नहीं माने. उन्होंने कहा, मां यह तुम क्या कर रही हो. तुम्हारी ही दी शिक्षा ने तो मुझे ये सब सहन करने की शक्ति दी है. मैं कैसे तेरी दी शिक्षाओं का अपमान करूं.

आपने ही मुझे सिखाया था कि धर्म से बढ़ के इस संसार में कुछ भी नहीं होता. आत्मा तो अमर होती है. मेरे मरने से तो सिर्फ मेरे शरीर का ही नाश होगा ना फिर अफसोस कैसा. मुझे आशीर्वाद दो, ताकि मैं धर्म पर अडिग रह सकूं. यह सुनकर उनके माता-पिता की आंखों से आंसुओं की गंगा बह निकली और वह वहां से निकल चले गए.

मौत के सामने भी नहीं झुके हकीकत

अगले दिन वीर बालक हकीकत राय को दोबारा लाहौर के सूबेदार के समक्ष पेश किया गया. सभी को विश्वास था कि हकीकत आज अवश्य इस्लाम कबूल कर लेगा. उससे आखरी बार पूछा गया कि क्या वो मुसलमान बनने को तैयार है. परन्तु हकीकत ने तुरन्त इससे इंकार कर दिया. अब मुलिम उलमा हकीकत के लिये सजाये मौत मांगने लगे.

ज़करिया खान ने इस पर कहा, मैं इसे मृत्यु दण्ड कैसे दे सकता हूं? यह राष्ट्रद्रोही नही है और ना ही इसने हुकूमत का कोई कानून तोड़ा है? तब लाहौर के काजियों ने कहा कि यह इस्लाम का मुजरिम है.

इसे आप हमे सौंप दें. हम इसे अपने हिसाब से सजा देंगे. दरबार में मौजूद दरबारियों ने भी काजी की हां में हां मिला दी. इस तरह हकीकत राय काजियों को सौंप दिये गये.

आखिरी समय में जुबां पर था राम का नाम

आखिरकार मौलिवी जो चाहते थे वही हुआ. बसन्त पंचमी का दिन था. वीर हकीकत राय को लाहौर की कोतवाली से निकल कर उसके सामने ही गड्डा खोद कर कमर तक उसमें गाड़ दिया गया. हकीकत को दोषी मानने वाले लोग उसे चारों तरफ से घेर कर खड़े हो गए. हकीकत राय से अंतिम बार पूछा गया, क्या वह मुसलमान बनने के लिए तैयार हैं. मौत सामने खड़ी थी, बावजूद इसके उनका जवाब वही था. मुझे मरना कबूल है पर इस्लाम नही. इस पर लाहौर के काजियों ने हकीकत राय को मारने का आदेश सुना दिया.

आदेश मिलते ही उस 14 साल के हकीकत राय पर वहां मौजूद लोगों ने पत्थर बरसाने शुरु कर दिए. हकीकत इस वक्त अपनी आंखें बंद किए हुए बस ‘राम-राम’ बोल रहा था. शीघ्र ही वह पत्थरों की चोट से लहूलुहान होकर बेहोश हो गया.

अब पास खड़े जल्लाद को उस बालक पर दया आ गयी. उसने सोचा कब तक यह बालक इस तरह से पत्थर खाता रहेगा. इससे अच्छा तो यही होगा कि मैं ही इसे मार दूं. इतना सोच कर उसने अपनी तलवार से हकीकत राय का सिर काट दिया. रक्त की धाराएं बह निकली और वीर हकीकत राय 1734 में बसन्त पंचमी के दिन अपने धर्म पर बलिदान हो गया.

Stories of Balveer Hakikat Rai (Pic: amanpreet)

ऐसे थे वार हकीकत राय, जिन्होंने मृत्यु के सामने भी अपने धर्म के लिए घुटने नहीं टेके. आखिरी वक्त भी उनकी जुबान पर सिर्फ राम का नाम था. मरकर भी अजर अमर होने जाने वाले बलिदानी वीर हकीकत राय को हम शत-शत नमन करते हैं.

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