अपना सर्वस्व लुटा कर राष्ट्रधर्म कैसे निभाया जाता है…
अपने गुरु के वचनों को सर्वोपरि कैसे माना जाता है…
और अपने दुश्मन की आँखों में आंखें डाल कर कैसे खड़ा हुआ जाता है…

यह अगर किसी एक इंसान से सीखना हो तो केवल गुरु गोविंद सिंह जी के प्यारे शिष्य बंदा सिंह बहादुर का ही नाम जुबान पर आता है. कहते हैं कि योद्धा होने से पहले बंदा सिंह बहादुल एक वैरागी थे.

तो आइये जानते हैं कि नियति ने माधो दास जैसे वैरागी को भाई बंदा सिंह बहादुर जैसा योद्धा कैसे बना दिया और उन्होंने किस तरह से मुगलों को नाकों चने चबवा दिये थे:

माधो दास से ‘बंदा सिंह बहादुर’

माधो दास का जन्म 1670 ई. में कश्मीर स्थित पुंछ जिले के राजौरी क्षेत्र में हुआ. कहते हैं कि वह महज 15 वर्ष के थे, जब उन्होंंने एक मृग को अपनी आँखों के सामने प्राण त्यागते हुए देखा. इस घटना ने उन्हें पूरी तरह से विचलित कर दिया. इतना बिचलित कि उन्होंंने वैराग्य धारण कर जानकीदास नामक वैरागी को अपना गुरु मान लिया.आगे के कुछ वर्ष जानकीदास के साथ रहने के बाद माधोदास वैरागी रामदास के सम्पर्क में आए तथा उनसे भी आध्यात्म के बारे में बहुत कुछ सीखा.

इसके पश्चात माधो दास ने योगसाधना सीखी तथा नांदेड क्षेत्र में गोदावरी नदी के तट पर अपना आश्रम बनाकर रहने लगे.

उधर दूसरी तरफ इस समयकाल में मुगलों के जुल्म बढ़ते जा रहे थे. किन्तु माधोदास को इसकी कोई खबर नहीं थी. वह तो ज्यादातर समय अपनी योगसाधना में लगे रहते थे. इसी बीच अपने दो पुत्रों की शहादत और सिख कौम की सुरक्षा की चिंता से विचलित गुरु गोविंद सिंह जी का नांदेड़ आना हुआ. स्थानीय लोगों द्वारा ने गुरु जी को माधो दास के बारे में बताया.

चूंकि, स्थानीय लोग माधोदास से बहुत प्रभावित थे इसलिए गुरु जी ने उससे मिलने की इच्छा जताई.

माधोदस को देखते ही गुरु जी समझ गए कि यह एक योद्धा है तथा इसका जन्म वैराग के लिए नहीं अपितु मजलूमों की रक्षा के लिए हुआ है. गुरु जी ने माधो दास को समझाते हुए कहा कि “राजपूत अगर वैराग धारण कर लेंगे फिर असहाय लोगों की रक्षा कौन करेगा ?”

गुरु जी के ज्ञान और उनके मासूम पुत्रों द्वारा जनहित में अपने प्राणों का बलिदान देने की कथा सुन कर माधोदास विचलित हो उठे तथा उन्होंने गुरु जी की बात मान कर शस्त्र उठाने का मन बना लिया.

3 सितंबर 1708 ई को गुरु गोविन्द सिंह जी ने माधोदास को अमृतपान कराने के बाद एक नया नाम दिया, जो था बंदा सिंह बहादुर.

Guru Nanak Ji (Representative Pic: asiasamachar)

जब रणभूमि में उठाये हथियार

गुरु जी का मार्गदर्शन मिलते ही बंदा सिंह की ऑंखें खुल गईं. उन्हें चारों ओर बेसहारा लोगों की चीख़ पुकारें सुनाई देने लगीं. दो मासूम साहिबज़ादों की शहादत से विचलित मन उन्हें चैन से सोने नहीं देता था.

1709 ई में गुरु गोविन्द सिंह जी के आदेश पर बंदा सिंह बहादुर मुग़लों से सिखों की रक्षा करने हेतु पंजाब के लिए निकल पड़े. यहाँ बंदा सिंह ने सिख सेना, मुग़लों के आतंक से परेशान हिन्दुओं तथा आम जनता की मदद से मुग़लों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया. समाना के युद्ध में बंदा सिंह के नेतृत्व में सिख सेना ने मुग़लों के लगभग दस हज़ार सैनिकों को मार कर यह युद्ध जीत लिया.

इस जीत के बाद भले ही सिख सेना के हौंसले बुलंद थे मगर बंदा सिंह बहादुर का मन अभी तक विचलित था. उनके मन की आग अभी तक शांत नहीं हुई थी. इसका कारण था दो छोटे साहिबजादों के हत्यारे वज़ीर खान का अभी तक जीवित होना.

अपने प्रतिशोध के लिए बंदा सिंह को अधिक प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ी. 1710 ई में बंदा सिंह बहादुर के संरक्षण में सिख सेना ने सरहिंद पर चढ़ाई कर दी तथा चप्पर चिड़ी के युद्ध में बंदा सिंह बहादुर ने सरहिंद के फौजदार वज़ीर खान को मौत के घाट उतार दिया.

सिख साम्राज्य के विस्तार में भूमिका

वज़ीर खान की मृत्यु और सरहिंद पर कब्ज़ा करने के साथ ही बंदा सिंह के संरक्षण में सिख साम्राज्य सतलुज से यमुना तक विस्तृत हो गया. बंदा सिंह ने मुखलिसगढ़ नामक एक गाँव बसाया और इसे अपनी राजधानी बना दिया. यहीं पर उन्होंने लोहगढ़ नामक किला भी बनवाया, जिसके कारण मुखलिसगढ़ को लौहगढ़ के नाम से जाना जाने लगा.

बंदा सिंह ने मुग़लों की मुद्रा के स्थान पर सिख धर्म के सिक्के जारी करवा दिए. बंदा सिंह द्वारा सिख धर्म के नाम से पहली बार सिक्के चलाए गए थे. देखते ही देखते कुछ ही समय में बंदा सिंह ने पंजाब में अपना राज्य स्थापित कर लिया. अगली कड़ी में उन्होंने अपने साथियों को उत्तर प्रदेश के लिए रवाना कर दिया.

यहाँ सिखों ने सहारनपुर, जलालाबाद, मुजफ्फरनगर और अन्य आस-पास के इलाकों पर कब्जा करने के साथ मुग़लों द्वारा पीड़ित जनता को राहत पहुंचाई. इधर जालंधर और अमृतसर में सिखों ने असहाय लोगों के अधिकारों के लिए युद्ध शुरू कर दिए.

Banda Singh Bahadur (Representative Pic: pentacular)

‘सुशासन’ को रखा सबसे आगे

बंदा सिंह ने शासन सँभालते ही ज़मीदारी प्रथा को हटा कर किसानों को उनके हिस्से की ज़मीन लौटा दी. उनका मानना था कि इससे किसान सम्मान सहित अपना जीवन निर्वाह कर पायेंगे. यही नहीं बंदा सिंह के शासन से पूर्व सभी वर्गों के अधिकारी जबरन वसूली तथा घुसखोरी के आदी हो चुके थे. साथ ही व्यवस्था के नियम और तरीक़े भी पूरी तरह से टूट चुके थे.

सिखों ने अपनी ताक़त का सही प्रयोग करते हुए सभी भ्रष्ट अधिकारीयों को हटा कर उनके स्थान पर ईमानदारों को पदभार सौंप दिया. इस शासन व्यवस्था से आम जनता को बहुत राहत मिली.

एक किंवदंति के अनुसार एक बार सदौरा से कुछ पीड़ित लोग अपने जमीदारों के खिलाफ़ शिकायत ले कर बंदा सिंह के पास आए. पीड़ितों से उनकी फरियाद सुनने के बाद बंदा सिंह ने अपने सैनिक बाज़ सिंह को उन पर गोली चलाने का आदेश दे दिया.

पीड़ित लोग अपनी फरियाद के बदले बंदा सिंह के ऐसे उत्तर से स्तब्ध रह गए, क्योंकि उन्होंने सुना था कि बंदा सिंह मजलूमों की रक्षा करते हैं. उन्होंने बंदा सिंह से ऐसी प्रतिक्रिया का कारण पूछा तब बंदा सिंह ने उत्तर दिया कि “आप सब हजारों की संख्या में होकर भी उन मुट्ठी भर ज़मीदारों के ज़ुल्मों से बचने का उपाए नहीं ढूँढ पाए.”

उसके बाद बंदा सिंह ने सदौरा के युद्ध में सैय्यदों और शेखों को पराजित किया तथा पीड़ितों को उनका अधिकार दिलवाया.

मुगलों की नींद हराम कर दी!

पूर्वी लाहौर से पूरे पंजाब पर सिखों के शासन ने मुग़लों की राजधानी दिल्ली और लाहौर के बीच का संचार पूरी तरह बाधित कर दिया था. इस खबर ने मुग़ल बादशाह बहादुर शाह को पूरी तरह से विचलित कर दिया. उसने पंजाब की ओर कूच कर दिया.

बहादुर शाह ने बंदा सिंह को झुकाने के लिए पूरी शाही सेना को लगा दिया. सभी सेनापतियों को ये आदेश दिया गया कि वह शाही सेना में शामिल होकर उसकी ताक़त को बढ़ाएं.

बंदा बहादुर जिन दिनों उत्तर प्रदेश की यात्रा पर थे… उन्हीं दिनों मुनिम खान के संरक्षण में मुग़ल सेना ने सरहिंद पर हमला कर दिया तथा सरहिंद सहित आस पास के इलाकों पर भी अपना कब्ज़ा जमा लिया. बंदा सिंह जब वापिस आये तब उन्होंने अपनी सेना को अंतिम युद्ध के लिए लोहगढ़ में इकठ्ठा किया. इस युद्ध में सिख सेना ने मुग़ल सेना को हरा दिया. किन्तु, उन्होंने और सेना मंगवाई तथा 60 हज़ार सनिकों के साथ लौहगढ़ किले को घेर लिया. हालांकि बंदा सिंह यहाँ से बच निकलने में कामयाब रहे.

बाद में  मार्च 1715 ई में मुग़लों ने गुरदासपुर में स्थित गुरदास नंगल गाँव को चारों तरफ से घेर लिया. यह वही जगह थी, जहां बंदा सिंह अपने साथियोंं के साथ रुके हुए थे. एक लंबे संघर्ष के बाद अंतत: मुगल बंदा सिंह को पकड़ने में कामयाब रहे.

दुश्मनों के सामने नहीं झुकाया सिर और…

दिल्ली ले जाते समय बंदा सिंह को लोहे के पिंजरे में कैद किया गया. दूसरी तरफ बाक़ी सिखों को जंजीरों से बाँधा गया था. दोबारा कोई बंदा सिंह के रास्ते पर न चल सके. इसके लिए मुगलों ने सिखों को अमानवीय यातनाएं तक दीं.

सभी सिखों के दिल्ली पहुँचने पर उन्हें प्राणदान देने के बदले अपना धर्म छोड़ने के लिए दबाब बनाया गया.  यही नहीं बंदा सिंह बहादुर के सामने ही उनके सात वर्षीय पुत्र की हत्या कर दी गयी.

अंत में मुगलों ने सारी हदें पार कर दी और बंदा सिंह की ऑंखें फोड़ कर गर्म सलाखों द्वारा उनके शारीर की त्वचा खींच ली गयी. इतनी असहनीय पीड़ा के बाद भी बंदा सिंह ने दुश्मनों के आगे सिर नहीं झुकाया और मृत्यु को प्यारे हो गये.

Banda Singh During War (Representativ Pic: punjabidharti)

असहाय लोगों के अधिकार तथा अपने लोगों की रक्षा के लिए अंतिम साँस तक सीना तान कर दुश्मनों के सामने खड़े रहने वाले बंदा सिंह बहादुर से आने वाली पीढियां निश्चय ही प्रेरणा ग्रहण करेंगी.

Web Title: Story of Brave Banda Singh Bahadur, Hindi Article

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