1704 के आसपास मुगलों का दमन चरम पर था. वह जबरन लोगों का धर्म परिवर्तन कराने में लगे हुए थे. सिक्खों के दसवें गुरु गोविंद सिंह ने इसका विरोध किया था. बागी होकर उन्होंंने मुगल सेना के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था. लाख जतन के बाद भी मुगल उन पर अपना शिकंजा नहीं कस पा रहे थे. चमकौर (Link in English) के युद्ध में उन्हें एक पल के लिए लगा था कि वह गुरू गोविन्द सिंह को पकड़ने में कामयाब हो जायेंगे, लेकिन वह अपने 40 साथियों के साथ दुश्मन को उसी के हाथों परास्त करने में सफल हुए थे. तो आईये, आज चमकौर के उस खूनी संघर्ष के पहलुओं को जानने की कोशिश करते हैं.

आनंदपुर साहिब में सिक्खों की घेराबंदी

मुगलों की सेना सामने से नहीं जीत पा रही थी, इसलिए उन्होंने धोखे से पकड़ने की साजिश की. एक गुप्तचर की सूचना पर मुगल सैनिकों ने आनंदपुर साहिब को चारों तरफ से घेर लिया. गुरु यहां अपने दल के साथ मौजूद थे. मुगल उन पर हमला कर सकते थे, लेकिन उन्होंने कोई रिस्क लेना उचित नहीं समझा. उन्हें इस बात का अंदाजा था कि गुरू के पास ज्यादा रसद नहीं है. उन्हें बाहर आना ही पड़ेगा, इसलिए उन्होंंने उनके बाहर आने का इंतजार किया.

कुछ वक्त बाद आनंदपुर (Link in English) साहिब में रसद खत्म हो गया. ऐसे में गुरू ने तय किया कि वह बाहर निकलेंगे. दल के साथियों ने उन्हें बहुत समझाया. उन्होंने कहा गुरूदेव बाहर जाने का मतलब है, मौत को दावत देना. उन्होंंने कहा हमें यहां कुछ रोज और रुकना चाहिए. तब सिक्ख गुरू ने जवाब देते हुए कहा, रसद के कारण मरने से अच्छा है कि हम दुश्मन का सामना करते हुए वीरगति को प्राप्त हो जायें. यह सुनकर पूरे दल में ऊर्जा का संचार हो गया. सभी ने एक दूसरे की हां में हां मिला दी. रात होते ही वह बड़ी चतुराई से मुगलों की आंखों में धूल झोंकते हुए वहां से निकल गये.

Story of Chamkaur Battle (Pic: WikiWikiup/Youtube)

विपरीत परिस्थितियों में नहीं खोया धैर्य

कुछ देर बात जब मुगलों को इसकी जानकारी हुई कि गुरू गोबिंद सिंह वहां से निकलने में सफल हो गये हैं, तो वह तेजी से उनकी खोज में भागे. जल्द ही उन्होंने पता लगा लिया कि गुरू गोबिंद सिंह सिरसा नदी को पार करते हुए वह इलाका छोड़ने जा रहे हैं. मुगल सैनिकों को उस जगह पर पहुंचने में देरी नहीं लगी, जहां गुरूदेव अपने दल के साथ आगे की रणनीति बना रहे थे. मुगल सैनिकों के घोड़ों की आवाज से सिक्खों के खेमे में हलचल शुरु हो गई. वह तेजी से सिरसा नदी के किनारे की ओर बढ़े. नदी का उफान चरम पर था. पानी की लहरें बहुत तेज थीं. उसे पार करना नामुमकिन सा था, लेकिन सिक्खों ने अपना धैर्य नहीं खोया.

गुरु गोबिंद सिंह ने अपने साथियों से कहा, हमें साहस से काम लेना चाहिए. हम इस नदी को पार कर लेंगे. उन्होंने अपने दल को दो भागों में बांट दिया. पहले दल में वह लोग थे, जो युद्ध कला में दक्ष थे. दूसरे दल में उन लोगों को रखा गया, जो आसानी से नदी पार कर सकते थे. पहले दल को जिम्मेदारी दी गई कि वह मुगलों को एक इंच भी आगे न बढ़ने दें. दूसरे दल को इसका फायदा उठाकर जल्द नदी को पार करने का प्रयास करना था.

योजना के तहत किया दुश्मन का मुकाबला

योजना के तहत सिक्खों के दल आगे बढ़े. पहले दल ने मुगल सैनिकों का रास्ता रोकने के लिए मोर्चा संभाला. उन्होंंने तय कर लिया था कि वह अपनी आखिरी बूंद तक मुगलों को आगे नहीं बढ़ने देंगे. वहीं दूसरे दल को जल्द से जल्द नदी को पार करके सुरक्षित स्थान पर पहुंचना था. योजना सफल होती मालूम पड़ रही थी. पहले दल ने मुगल सैनिकों के लाशों के ढ़ेर लगा दिए थे. वह एक इंच भी आगे नहीं बढ़ सके थे. गुरू गोबिंद सिंह भी अपने दल के साथ नदी की विपरीत परिस्थितियों के बीच नदी पार करने में सफल हो चुके थे. हालांकि, इस कोशिश में उन्होंने अपने सैकड़ों सिक्ख सैनिकों को खो दिया था.

इस घटना के बाद सिक्ख गुरु के पास मजह 40 लोग ही बचे थे. वह बुरी तरह थक चुके थे. वह किसी सुरक्षित जगह पर पहुंचकर आराम करना चाहते थे. कुछ ही देर में वह चमकौर के बगीचे में जा पहुंचे. यह जगह उन्हें सुरक्षित लगी. यहां रुकने की आम सहमति भी बन गई. यहां के स्थानीय लोगों ने इसमें उनकी मदद की. यहां मौजूद कच्ची हवेली में गुरूदेव को रुकने के लिए कहा गया. चूंकि यह हवेली एक ऊंचे टीले पर बनी हुई थी, इसलिए दुश्मन का सामना करना यहां से आसान था.

चमकौर में बनाई मुकाबले की योजना

कुछ देर बाद आराम करने के बाद उन्होंने आगे की योजना बनाई. वह जानते थे कि मुगल सैनिक किसी भी कीमत पर उन तक पहुंचना चाहेंगे. दुश्मन को हल्के में न लेते हुए उन्होंने अपने चालीस साथियों को छोटे-छोटे ग्रुप में बांट दिया. उनको हमेशा हथियार रखने की सलाह दी गई. साथ ही हमेशा मुकाबले के लिए सभी को तैनात कर दिया.

अब बस उनको मुगलों के आने का इंतजार था. जल्द ही मुगल सैनिक एक बड़ी संख्या में चमकौर पहुंच चुके थे. उन्होंने कच्ची हवेली को पूरी तरह से घेर लिया. वह यह जानकर खुश थे कि गुरूदेव जी के पास सिर्फ चालीस ही सैनिक बचे हुए थे. वह अपनी जीत के लिए आश्वस्त लग रहे थे.

मुगल सेना के सेनापति वजीर ख़ान ने आवाज लगाते हुए गुरूदेव को अपने साथियों के साथ आत्मसमर्पण करने को कहा. उसने कहा कि अगर वह ऐसा करते हैं, तो उनकी जान बख्श दी जायेगी. इसके जवाब में सिक्खों ने मुग़ल सैनिकों पर तीरों की बौछार कर दी. ऐसे जवाब की उम्मीद वजीर खान ने सपने में भी नहीं की थी. वह आग बबूला हो रहा था. उसके सैनिक तेजी से मरते जा रहे थे. वजीर ख़ान को लगने लगा था कि उसे गलत सूचना दी गई है, क्योंकि 40 लोगों की सेना इस तरह का जवाब नहीं दे सकती थी. जबकि, वह गलत था.

Battle of Chamkaur (Pic: Ashley Kaur/youtube)

40 सिक्ख, विशाल सेना पर भारी पड़े

सिक्ख सैनिक चारों तरफ से घिरे होने के बावजूद बिना डरे हुए दुश्मन को खत्म करने में लगे हुए थे. चूंकि, मुगल सैनिक संख्या में बहुत ज्यादा थे, इसलिए सिक्खों के तीर जल्दी ही खत्म हो गये. ऐसे में मुगलों को एक पल के लिए लगा कि वह अब जीत जायेंगे. वह तेजी से आगे बढ़े, तभी उन्होंने देखा कि सिक्ख अपनी तलवार और भालों के साथ उनके स्वागत के लिए खड़े थे. उनकी आंखों में लावा फूट रहा था. वह दुश्मन पर टूट पड़े. वजीर खान को जब लगा कि वह नहीं जीत पायेंगे तो उन्होंने पूरी सेना को एक साथ होकर सिक्खों पर हमला बोलने का आदेश दे दिया. मुगलों का यह दांव काम आया और वह कई सिक्खों को मारने में कामयाब रहे.

सिक्ख बहुत कम संख्या में बचे थे. जबकि, वजीर खान के पास अभी भी एक बड़ी संख्या में सैनिक मौजूद थे. उनका सामना करना आसान नहीं था, इसलिए बचे हुए सिक्खों ने अपने गुरू से कहा कि ‘गुरु जी आप यहां से निकल जाइये तब तक हम दुश्मन को रोकते हैं’. यह सुनकर गुरु गोविंद सिंह जी नाराज होने लगे. उन्होंने कहा मेरी जान और तुम्हारी जान में कोई अंतर नहीं है. हम साथ रहेंगे और अंतिम समय तक लड़ेंगे.

गुरू गोबिंद सिंह की योजना ने दुश्मन को खत्म कर दिया

दूसरी तरफ संख्या कम होने की वजह से बचे हुए सिक्खों के चेहरों पर चिंता के भाव थे. गुरु गोबिंद सिंह ने इसको भांपते हुए उनको लड़ने के लिए उत्साहित किया. सभी साथियों ने उत्साहित होकर आदेश का पालन करते हुए प्राणों की आहुति देने की शपथ ली. किन्तु उन्होंने गुरु गोविंद सिंह से अनुरोध किया कि वह वहां से चले जायें. उन्होंने कहा अगर हम इस जंग में शहीद हो गये तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, परंतु अगर आपको कुछ हो गया तो पंथ का क्या होगा?

गुरूदेव को मनाना आसान नहीं था, लेकिन अंतत: सिक्ख सैनिक उन्हें मनाने में कामयाब रहे. दो साथियों के साथ उनको वहां से रवाना कर दिया गया. दुश्मन को इसकी भनक तक नहीं लगी. सब एक बड़ी प्लानिंग के साथ किया गया था. चूंकि गुरू गोबिंद सिंह इस तरह छुपकर नहीं जाना चाहते थे, इसलिए उन्होंंने मुगल सैनिकों को ललकारते हुए आवाज लगाई कि मैं जा रहा हूं हिम्मत है तो पकड़ लो. उन्होंंने दुश्मन सेना के उन सैनिकोंं पर मार गिराया, जो मशाल लेकर खड़े थे. मशालें जमीन पर गिरकर बुझ गईं. चारों तरफ सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा हो गया.

Guru Gobind Singh Ji (Pic: sikhwarriorsart)

सिक्ख गुरू को पकड़ने की होड़ लगी तो दुश्मन सेना अंधेरे में आपस में ही लड़ बैठी. इस प्रकार दुश्मन की सेना आपस में टकराकर खत्म हो गई. अगली सुबह जब वजीर खान ने यह नजारा देखा तो उसने अपना सिर पकड़ लिया. एक तरफ उसकी सेना खत्म हो चुकी थी. दूसरी तरफ वह गुरू गोबिंद सिंह को भी पकड़ने में नाकाम हो चुका था.

Web Title: Story of Chamkaur Battle, Hindi Article

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