‘बाबू मोशाय ! जिंदगी लंबी नहीं बड़ी होनी चाहिए ….!’

‘आनंद’ फिल्म का ये मशहूर डॉयलाग सटीक बैठता है, महिलाओं में क्रांति की अलख जगाने वाली और आजाद हिंद फौज में मुख्य भूमिका निभाने वाली लक्ष्मी सहगल पर.

याद कीजिए वो वक्त, जब देश आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था. इस दौरान कई नायकों ने अपना सबकुछ लगा दिया. इसमें महिलाओं का सहयोग भी सराहनीय रहा. हम और आप ऐसे कई नायकों को जानते भी हैं, पर कई से आज भी हम अनजान हैं.

इन्हीं में से एक थीं लक्ष्मी सहगल !

लक्ष्मी सहगल का परिचय कुछ ऐसा है कि उन्हें सुभाष चंद्र बोस की करीबी बताया जाता है. इतनी करीबी कि वह आजाद हिंद फौज का हिस्सा भी रहीं.

ऐसे में लक्ष्मी सहगल की संघर्षमयी कहानी को जानना रोचक रहेगा-

अपनी मां की फोटोकॉपी थीं लक्ष्मी !

रानी लक्ष्मीबाई रेंजीमेंट में कैप्टन रहीं. उनका जन्म 24 अक्टूबर सन 1914 को एक साधारण से तमिल परिवार में हुआ. पिता डॉ. एस स्वामीनाथन पेशे से वकील थे और मां अम्मुकुट्टी समाज सेविका और स्वतंत्रता सेनानी. बचपन से ही लक्ष्मी को अच्छी तालीम मिली.

उनके करीबी बताते हैं कि लक्ष्मी अपनी मां की फोटोकॉपी थीं. यही कारण रहा कि पढ़ने लिखने से लेकर संस्कारों तक सभी पैमानों में लक्ष्मी फिट बैठती थीं.

आप सोचिए कैसी होती है, वो स्थिति जब 16 साल की उम्र में पिता का साया किसी बेटी के सिर से उठ जाए ? यकीनन दुखों का पहाड़ एक साथ टूट पड़ता है. मगर ये वक्त भी लक्ष्मी की हिम्मत को नहीं हिला सका. वह 1930 का साल था, जब एस. स्वामीनाथन यानी लक्ष्मी के पिता दुनिया को अलविदा कह गए.

इस मुश्किल भरे वक्त में लक्ष्मी ने खुद को संभाला और 1932 में विज्ञान से लक्ष्मी ने अपनी ग्रेजुएशन पूरी की. इसके बाद कभी भी लक्ष्मी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. उन्होंने डॉक्टरी को अपना पेशा बनाया. उन्हें अपने इस पेशे से बहुत मुहब्बत थीं.

इससे जुड़ने के लिए उन्होंने 1938 में मद्रास मेडिकल कॉलेज से एम.बी. बी. एस की डिग्री ली.

A young Dr Lakshmi Sehgal (Pic: Yahoo)

…और गरीब मजदूर बने मुरीद !

एक दिलचस्प किस्सा भी इससे जुड़ा है. इस किस्से के बारे में कम ही लोग जानते हैं. असल में उनके अंदर मरीजों की सेवा का एक गजब का जुनून था. वह यह कभी नहीं देखती थीं कि मरीज गरीब है या फिर अमीर. उसके पास पैसे हैं या नहीं.

उनकी दिली तमन्ना यही रहती थी कि मरीज जल्द से जल्द स्वस्थ्य हो जाए. वो अपना तन मन धन सबकुछ मरीज पर न्यौछावर कर देती थीं. यही वजह थी कि जो भी महिला उनके पास इलाज के लिए आतीं वो उनकी मुरीद हो जातीं.

लक्ष्मी के घर पर आया मरीज कभी खाली हाथ लौटकर नहीं जाता था.

महिला डॉक्टर बनने के बाद लक्ष्मी को विदेश जाने का भी मौका मिला. सन 1940 में वो सिंगापुर चली गईं. यहां शुरुआती दिनों में ही उन्होंने कैंप लगाकर कई प्रवासी मजदूरों की सेवा की. उनमें सेवा करने का जुनून अपनी मां से हासिल था.

जिंदगी का ‘टर्निंग प्वाइंट’ !

कहते हैं सिंगापुर ही लक्ष्मी सहगल की जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट भी बना. यहां 1942 में  उन्होंने ‘भारतीय स्वतंत्रता संघ’  में सदस्यता लेकर उन लोगों की मदद करना शुरु किया, जो घायल युद्धबंदी थे. यह वो वक्त था, जब अंग्रेजों ने सिंगापुर को जापान को सौंप दिया था.

लक्ष्मी ने प्रवासी मजदूरों पर हो रहे जुल्मों-सितम को देखा था.

लिहाजा, उन्होंने अपने मन में संकल्प लिया कि वो इन मजदूरों के हक के लिए कुछ न कुछ जरुर करेंगी. इसी दौरान 2 जुलाई 1943 को नेताजी सुभाष चंद्र बोस भी सिंगापुर आए.

लक्ष्मी के दिल में एक आग जल ही रही थी और इसी का असर रहा कि वो सुभाष चंद्र बोस के विचारों के प्रभाव से खुद को नहीं रोक पाईं. बोस से एक घंटे की मुलाकात में ही लक्ष्मी ने उन्हें बताया कि वो उनके साथ जुड़ने की इच्छुक हैं और वो एक फौज बनाना चाहती हैं.

सुभाष चंद्र बोस ने भी लक्ष्मी सहगल के अंदर का जस्बा देखा था, लिहाजा उन्होंने ‘रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट’ बनाने की घोषणा की. इसमें वह वीर नारियां शामिल की गयीं, जो देश के लिए अपनी जान दे सकती थीं.

22 अक्टूबर, 1943 में डॉ. लक्ष्मी ने रानी झाँसी रेजिमेंट में ‘कैप्टन’ पद पर कार्यभार संभाला. अपने साहस और अद्भुत काम की बदौलत बाद में उन्हें ‘कर्नल’ का पद भी मिला, जो एशिया महाद्वीप में किसी महिला को पहली बार मिला था.

Dr Lakshmi Sehgal (Pic: thehindu.com)

जब आजाद हिन्द फौज का हिस्सा बनीं

डॉ. लक्ष्मी को सहगल टाइटल शादी के बाद मिला. शादी से पहले वो लक्ष्मी स्वामीनाथन के रूप में जानी जाती थीं. कहा जाता है कि राष्ट्रवादी आंदोलन से प्रभावित लक्ष्मी डॉक्टरी पेशे से निकलकर आजाद हिंद फौज़ में शामिल हुईं.

वो लोगों के बीच जाकर उनकी समस्याएं सुनना पसंद करती थीं. उनसे किसी का दुख नहीं देखा जाता था. डॉ. लक्ष्मी की अगुवाई में आजाद हिन्द फौज की महिला बटालियन रानी लक्ष्मीबाई रेजीमेंट ने कई जगहों पर अंग्रेजों से लड़ाई भी लड़ी.

उनके साहस ने ये बात जगजाहिर कर दी कि देश की नारियां चूडिय़ां तो पहनती हैं, लेकिन वक्त आने पर वो बन्दूक भी उठा सकती हैं और उनका निशाना पुरुषों के मुकाबले कम नहीं होता.

500 महिलाओं की फौज का नेतृत्व

जैसा कि हमने पहले बताया कि लक्ष्मी सहगल सुभाष चंद्र बोस के काफी करीब थीं. यही कारण था कि, जब-जब सुभाष चंद्र बोस को आजादी की लड़ाई में लक्ष्मी की जरुरत पड़ी, लक्ष्मी ने उनका बखूबी साथ दिया.

आजाद हिन्द फौज में डॉ. लक्ष्मी को एक मुश्किल जिम्मेदारी मिली थी. उनको महिलाओं को इस फौज में भर्ती करवानी थी. उन्होंने ये काम भी बड़ी ही समझदारी के साथ किया.

जिस जमाने मे औरतों का घर से निकालना भी जुर्म समझा जाता था, उस दौरान उन्होंने 500 महिलाओं की एक फ़ौज तैयार की. डॉ. लक्ष्मी ने हमेशा अमीरी गरीबी का विरोध किया.

वह हमेशा सभी को एक समान नजरों से देखती थीं.

इसके बाद वो वक्त भी सामने आया, जब लक्ष्मी सहगल गिरफ्तार हुईं.

द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की शिकस्त के बाद ब्रिटिश सेनाओं ने आजाद हिंद फ़ौज के सैनिकों की भी धरपकड़ शुरू की. इसी धरपकड़ में 4 मार्च 1996 को लक्ष्मी भी सिंगापुर में गिरफ्तार कर ली गईं. उन्हें भारत लाया गया.

हालांकि, आजादी के लिए तेजी से बढ़ रहे दबाव के बीच उन्हें रिहा कर दिया गया.

जब शादी के बंधन में बंधीं लक्ष्मी !

ये बात है देश के आजाद होने से ठीक पहले की. इसी दौरान डॉ. लक्ष्मी की शादी की बात चली. कर्नल प्रेम कुमार शहगल का रिश्ता उनके लिए आया. आपको जानकर हैरानी होगी, लेकिन ये सच है कि उन्होंने इसके लिए फौरन ही हामी भर दी.

जिस साल देश आजाद हुआ यानी सन 1947 में उनकी शादी कर्नल प्रेम कुमार सहगल के साथ हुई. इस तरह कैप्टन लक्ष्मी से कैप्टन लक्ष्मी सहगल हो गयीं.  कैप्टन सहगल की दो बेटियां सुभाषिनी अली और अनीसा पुरी हैं.

राजनीति में भी डॉ. लक्ष्मी ने अपनी सहभागिता दी.

सन 1971 में वो मर्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ी और राज्यसभा में पार्टी का प्रतिनिधित्व किया. वो अखिल भारतीय जनवादी महिला समिति (ऑल इण्डिया डेमोक्रेटिक्स वोमेन्स एसोसिएशन) की संस्थापक सदस्यों में भी रहीं.

स्वतंत्रता आंदोलन में उनके अभूतपूर्व योगदान और संघर्ष को देखते हुए उन्हें 1998 में पद्मविभूषण सम्मान से नवाजा गया.

 

Freedom fighter Captain Lakshmi Sahgal (Pic: ndtv.com)

जैसे-जैसे डॉ. लक्ष्मी की उम्र बढ़ रही थी, बीमारियां भी उन्हें अपनी आगोश में ले रही थी. 19 जुलाई 2002 का वो दिन कोई नहीं भूल सकता, जब डॉ. लक्ष्मी को दिल का दौरा पड़ा. इसके बाद उन्हें फौरन कानपुर के हैलेट अस्पताल में भर्ती कराया गया.

जहां उन्हें ब्रेन हैमरैज भी हुआ, जिसके बाद वह उबर नहीं सकी और कोमा में चली गईं. 5 दिन तक जिंदगी से लड़ाई लड़ने के बाद आखिर वो जिंदगी की जंग हार गईं. आज भले ही वह इस दुनिया में नहीं है, लेकिन उनके काम ने उन्हें आज भी सभी के सामने जिंदा रखा है.

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Web Title: Struggling Stoty of Captain Lakshmi Sahga, Hindi Article

Feature Image Credit: The Better India