हिंदुस्तान राजा, महाराजाओं का देश रहा है! एक वक्त ऐसा था, जब यहां 500 से ज्यादा रियासतें हुआ करती थीं और राजाओं के अधीन राज्य की पूरी प्रजा थी.

हम सब जानते हैं कि 1600 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में प्रवेश कर चुकी थी और इसी के साथ आधिकारिक तौर पर अंग्रेजों का यहां आना शुरू हो गया और धीरे-धीरे बदलावों का दौर भी शुरू हुआ. भारत में शासन के लिए ‘गवर्नर’ पद का उदय भी अंग्रेजों के आने के बाद ही हुआ.

जाहिरतौर पर अंग्रेज भारत की दौलत को लूटना चाहते थे लकिन इसके लिए इन्हें भारत में अपनी पैठ बनानी थी, जिसके लिए इन्होंने यहां की छोटी-बड़ी लगभग सभी रियासतों से अपनी शर्तों के अनुसार संधि की.

इसी संधि की एवज में अंग्रेजों ने व्यापार का बहाना लगाकर राजाओं के बीच अपनी पकड़ बनानी शुरू कर दी. हालांकि केवल अंग्रेज ही इनकी दौलत और संसाधन पर नजर नहीं रख रहे थे बल्कि ये और भी दूसरे आक्रमणकारी लुटेराें के निशाने पर थे. इसका फायदा अंग्रेजों ने उठाया और इन हमलावरों से रक्षा करने की शर्त रखकर रियासतों के साथ एक ‘संधि’ की.

लेकिन ये संधि कैसे भारत के लिए नासूर बन गई, आइए जानते हैं –

अंग्रेजों की धोखेबाज विस्तार योजना!

बात सन 1700 की है, इस समय तक ईस्ट इंडिया कंपनी ने हिंदुस्तान के भीतर अपना अच्छा-खासा विस्तार कर लिया था. कंपनी की स्थापना का मुख्य उद्देश्य पूर्वी देशों में व्यापार के लिए इंग्लैंड को मदद करना था.

मैसूर रियासत हैदर अली के समय से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रही थी, और ये लड़ाई टीपू सुल्तान के दौर में भी जारी रही. टीपू ने अंग्रेजों के खिलाफ कई लड़ाईयों में फ्रांसीसियों का साथ दिया था. इससे अंग्रेज आगबबूला हो गए और अब वो किसी भी तरह से टीपू को रोककर फ्रांसीसियों के साथ को खत्म कर देना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने 1797 में लॉर्ड आर्थर वेलेजली को भारत का नया गवर्नर जनरल बना कर भेजा.

लॉर्ड वेलेजली ने मैसूर के विनाश की योजना बनाई थी, वहीं उसका उद्देश्य भारत में ब्रिटिश शासन का विस्तार करना और ईस्ट इंडिया कंपनी के बाहर व्यापार को खोलना था. इसके लिए भारत में ब्रिटिश नियंत्रण को बढ़ाया जाना बहुत जरूरी था. लॉर्ड वेलेजली को इन्हीं निहित उद्देश्यों के साथ भारत की जिम्मेदारी सौंपी गई थी.

हालांकि वेलेजली को इस बात की जानकारी थी कि ये काम इतना आसान नहीं है, लिहाजा उसने एक तरकीब खोजी और ‘सहायक संधि’ का एक नया फॉर्मूला पेश किया गया. इस संधि का उद्देश्य कंपनी को सर्वोच्च शक्ति के रूप में देशभर में प्रतिष्ठित करना था और सबसे खास बात ये थी कि फ्रांसिसियों के बढ़ते प्रभाव को इस संधि द्वारा पूरी तरह खत्म करना था.

Lord Wellesley (Pic: pinterest)

रियासतों के साथ सहायक संधि

सहायक संधि की शर्तों के अनुसार कंपनी संबंधित रियासत या राज्य को बाहरी आक्रमण से बचाएगी, लेकिन इसके बदले में उसके सारे व्यापार का जिम्मा अंग्रेज सरकार को दे दिया जाएगा. वहीं, भारतीय राजाओं के विदेशी संबंध कंपनी के अधीन होंगे और राज्यों को कंपनी की अनुमति के बगैर किसी यूरोपीय व्यक्ति को सेवा में रखने की मनाही होगी, इसी के साथ राज्यों को अपनी राजधानी में एक अंग्रेज अधिकारी को भी अपने खर्चे पर स्थाई तौर पर रखना होगा.

इस संधि का सबसे पहला शिकार हैदराबाद के निजाम बने.

जब 1795 ई. में खारदा की लड़ाई के दौरान निजाम ने अंग्रेजों से मदद मांगी तो उन्होंने कोई भी मदद नहीं दी, इसके बाद से ही वह ईस्ट इंडिया कंपनी से नफरत करने लगे थे. लेकिन अंग्रेजों को अब संधि करनी थी इसलिए उन्होंने निजाम के ऊपर अपनी सेना समाप्त करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया और इस प्रकार निजाम को आखिरकार संधि स्वीकार करनी पड़ी. वहीं अंग्रेजों ने इस संधि की एवज में कर्नाटक के पूर्वी और बंबई से लगते एक बड़े पश्चिमी हिस्से पर कब्जा कर लिया था.

फिर मैसूर की बारी आई, और वेलेजली ने टीपू को हराने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी, हालांकि टीपू सुल्तान इस संधि के खिलाफ थे, लेकिन उन पर दबाव डाला गया, यहां तक कि उनके राज्य पर हमला भी किया गया. अपने इस आखिरी युद्ध में टीपू की हार हुई और अंग्रेजों ने मैसूर रियासत के पूर्वी और पश्चिमी हिस्से पर कब्जा कर मैसूर राज्य पर अपना कठपुतली सुल्तान बैठा दिया. इसी के साथ अब मैसूर को सहायक संधि स्वीकार करने में कोई भी परेशानी नहीं थी.

इसके बाद 1801 ई. में अवध के नवाब को भी लॉर्ड वेलेजली के साथ सहायक संधि करनी पड़ी. जिसके तहत नवाब को रुहेलखंड, गोरखपुर और दोआब का एक हिस्सा कंपनी के सैनिकों के रखरखाव के लिए छोड़ना पड़ा. इस संधि के प्रावधान के बाद नवाब ने अपनी सेना को खत्म कर दिया और ईस्ट इंडिया कंपनी की एक सैनिक टुकड़ी को अवध में रखा गया.

इस समय तक मराठा साम्राज्य पांच बड़े प्रमुखों के द्वारा अपना शासन चलाता था, पूना में पेशवा, बड़ौदा में गायकवाड़, ग्वालियर में सिंधिया, इंदौर में होल्कर और नागपुर में भोंसले थे. लेकिन इनमें एकता नहीं होने के चलते पेशवा बाजीराव द्वितीय ने 31 दिसंबर 1802 को बेसीन में इस सहायक संधि पर हस्ताक्षर कर दिए.

Tipu Sultan’s Father Hyder Ali. (Pic: wikimediacommons)

..और भुगतना पड़ा नुक्सान

अब तक लगभग सभी बड़ी रियासतों पर अंग्रेजों का कब्जा हो चुका था जिसका परिणाम ये हुआ कि इन रियासतों के राजा सेना विहीन हो गए और अपने राज्य की सुरक्षा के लिए पूरी तरह से अंग्रेजों पर आश्रित हो गए. सबसे घातक बात यह रही कि राज्यों ने अपनी स्वतंत्रता, राष्ट्रीय चरित्र.. वो चीजें जो देश की शान से जुड़ी थीं, उन्हें बेचकर उन्होंने अपनी सुरक्षा से खतरा मोल ले लिया था. और इसके बाद सहायक संधि वाले राज्यों का दीवाला निकलना शुरू हो गया.

अंग्रेज सरकार अपने और सेना के खर्चों की पूर्ति के लिए लगातार आर्थिक मदद की मांग करने लगी, जिसके कारण राज्यों पर बोझ बढ़ता चला गया और अंग्रजों ने उनकी जमीन हड़पनी शुरू कर दी. सेना रखने का अधिकार न होने के चलते राज्य के सैनिक बेराजगार हो गए, ऐसे में वह चोरी, डैकती जैसे कामों को अंजाम देने लगे, इस तरह वह न तो अपनी जमीन बचा पाए और न हीं अपने पैसे. वहीं, अंग्रेज अधिकरियों ने राज्य के प्रशासन में अत्यधिक हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया था.

इस तरह सहायक संधि की नीति भारतीय राजा-महाराजाओं और सुल्तानों पर भारी पड़ रही थी. हालांकि संधि में रियासतों को बाहरी आक्रमणों से तो बचाव का प्रावधान था, लेकिन खुद अंग्रेज सरकार ने इसके एवज में अपने सैनिकों के द्वारा रियासतों की संपदा को लूटना शुरू कर दिया था.

Subsidiary Alliance Policy of Lord Wellesley And Its Effect On India. (Pic: burdenlakemarket)

इतिहासकारों ने सहायक संधि को रियासतों के लिए एक असफल प्रयास करार दिया है. वेलेजली ने रियासतों के आंतरिक प्रशासन को मजबूत और कुशल बनाने का प्रयास नहीं किया और अंग्रेजों की ये लूट की नीति कारगर रही.

इस तरह से भारत की संपदा और संसाधनों की लूट करने वाली लॉर्ड वेलेजली की इस सहायक संधि के बारे में आपका क्या कहना है, हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं.

Web Title: Subsidiary Alliance Policy of Lord Wellesley and its Effect on India, Hindi Article

Featured Image Credit: howlingpixel