यूं तो दिल्ली के तख्त पर अनेक शासक विराजमान हुए, किन्तु 14वीं सदी में ‘मोहम्मद बिन तुगलक’ ने जो छाप छोड़ी, वह किसी दूसरे शासक में देखने को नहीं मिली!

इस शासक की खास बात यह थी कि यह अपने लम्बे-चौड़े साम्राज्य के लिए नहीं, बल्कि अपने सख्त और कई बार अजीब से फैसलों के लिए जाना गया.

अगर आपने गौर किया हो तो, आज भी जब कोई कोई अजीब फैसला करता है, तो हम और आप उसकी तुलना ‘मोहम्मद बिन तुगलक’ के फैसलों से करते हुए ‘तुगलकी फरमान’ की संज्ञा दे देते हैं.

तो आईए दिल्ली सल्तनत पर शासन करने वाले इसे शासक को जानने की कोशिश करते हैं–

1325 ईस्वी में बना दिल्ली का सुल्तान

‘मुहम्मद बिन तुगलक’ का जन्म 1300 के आसपास तुगलक वंश के संस्थापक गयासुद्दीन तुगलक घर में हुआ. चूंकि, पिता तुगलक वंश के राजा थे, इसलिए उसका बचपन राजसी तरह से बीता. अच्छी शिक्षा-दीक्षा के साथ वह बड़ा हुआ और अपने कौशल से लोगों का दिल जीतने में कामयाब रहा.

नतीजा यह रहा कि वह जल्द ही साम्राज्य के कामकाज में सक्रिय हो गया. इसी क्रम में उसके पिता ने उसे 1321-1322 में डेक्कन के वारंगल शहर में जाने को कहा.

वारंगल  में इसलिए क्योंकि, वहां पर हिंदू विरोधियों ने तुगलक साम्राज्य के खिलाफ मोर्चा खोल रखा था. वह सीधे तौर पर उसके विरोध में थे.

‘मुहम्मद बिन तुगलक’ को जिम्मेदारी सौंपी गई थी कि वह किसी भी कीमत पर इस विद्रोह को खत्म करे. एक प्रकार से यह उसकी परीक्षा भी थी कि वह तुगलक साम्राज्य को संभालने के काबिल है भी या नहीं.

बहरहाल, ‘मुहम्मद बिन तुगलक’ इसमें खरा उतरा.

उसने न सिर्फ हिंदू विरोधियों के खिलाफ चढाई की बल्कि, बल के प्रयोग से हिंदुओं के विद्रोह को दबा दिया. आगे भी वह समय-समय पर अपनी कुशलता प्रदर्शित करता रहा.

नतीजा यह रहा कि पिता के बाद 1325 ईस्वी में वह दिल्ली के तख्त पर काबिज हुआ.

Sultan Muhammad bin Tughluq (Representative Pic: whatshappbangalore)

ये ‘तुगलकी फरमान’ साबित हुए गलत…

सत्ता पर काबिज होते ही ‘मुहम्मद बिन तुगलक’ ने अपने साम्राज्य को अपने हिसाब से बदलना शुरु कर दिया. इसके लिए उसने कई परिवर्तन किए. असल में वह पूरे भारत पर तुगलक साम्राज्य का विस्तार चाहता था.

इसके लिए उसने 1329 में दिल्ली की जगह देवगिरी को अपनी राजधानी बना दिया, जिसे दौलताबाद के नाम से जाना गया. दिलचस्प बात तो यह थी कि इस फैसले के तहत सिर्फ राजधानी को नहीं बदला गया था, बल्कि दिल्ली की आबादी को भी दौलताबाद में स्थानांतरित होने का आदेश दिया था. आगे चलकर ‘मुहम्मद बिन तुगलक’ का यह फैसला उसके शासनकाल का सबसे गलत फैसला साबित हुआ.

अपने राजा के आदेशानुसार लोगों ने दौलताबाद की तरफ बढ़ना शुरू तो कर दिया था, किन्तु कुछ लोग वहां कभी पहुंच नहीं पाए. रास्ते में ही उन्होंंने अपना दम तोड़ दिया. वहीं दूसरी तरफ जो दौलताबाद पहुंचने में सफल भी रहे, वह वहां की पानी की किल्लत के कारण मौत के नजदीक पहुंचने लगे. अंतत ‘मुहम्मद बिन तुगलक’ को अपनी राजधानी को वापस दिल्ली ही स्थानांतरित करना पड़ा.

इसके अलावा अपने एक दूसरे सख्त फैसले के लिए वह जाना जाता है. इसके तहत उसने रातों-रात चांदी के सिक्कों की जगह तांबे के सिक्कों को चलन में लाने का आदेश दे दिया था. जबकि, उसने तांबे के जो सिक्के जारी किए थे, वे अच्छे नहीं थे. आसानी से उनकी नकल की जा सकती थी.

बाद हुआ भी कुछ ऐसा ही. लोगों ने नकली सिक्के अपने घर में ही बनाने लगे, इससे राजस्व की भारी क्षति हुई और फिर उस क्षति को पूरा करने के लिए उसने करों में भारी वृद्धि भी की, जिस कारण लोग उससे नाराज रहने लगे.

Daulatabad Fort (Pic: wanderant)

30 लाख सैनिकों के बावजूद…

खैर, इस सबके बावजूद भारत पर राज करने का उसका सपना मरा नहीं. उसने कई राज्यों पर कब्जा करने के लिए एक योजना तैयार की. इसके तहत उसने आसपास के राज्यों के शासकों को अपने साथ मिलाना शुरु कर दिया.

अपने इसी कदम की बदौलत वह 1329 तक करीब 30 लाख सैनिक इकट्ठा करने में सफल तो हो गया, किन्तु एक बड़ी चूक कर बैठा. वह सेना बढ़ाने की धुन में इस तरह डूब गया था कि, उसने बिना किसी योग्यता के लोगों को अपनी सेना में भर्ती कर लिया. इनमें तो कई ऐसे थे, जोकि सिर्फ कहने के लिए ही सैनिक थे.

ऊपर से उसने सभी सैनिकों को साल भर तक भुगतान करने का जिम्मा ले रखा था. इस तरह उसके राजस्व पर इसका गहरा असर पड़ा.

खैर, जैसे-तैसे वह आगे बढ़ता रहा और अपने साम्राज्य विस्तार के इरादे से हिमाचल प्रदेश के कुल्लू-कांगड़ा के क्षेत्र में सेना के साथ जा पहुंचा. वह हिमालय को पार करते हुए चीन पर आक्रमण करना चाहता था, किन्तु यह हो न सका.

हिमालय पहुंचते ही उसे वहां के स्थानीय लोगों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा.

दिन-ब-दिन कम हुआ राजस्व और…

चूंकि, उसकी सेना में पहाड़ी इलाके में लड़ने में सक्षम नहीं थी, इसलिए उसको भारी नुक्सान झेलना पड़ा. इस अभियान में उसके करीब 10,000 सैनिकों की मृत्यु हो गई. मजबूरन उनको पीछे हटना पड़ा और वापस आना पड़ा.

अपने इन कुछ गलत फैसलों की वजह से उसका राजस्व दिन-ब-दिन कम होता चला गया. आर्थिक हालत कुछ यूं हो चली कि जिंदगी ने भी उसका साथ छोड़ दिया और 1351 में उसने हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद लीं.

माना जाता है कि उसके शासनकाल में ‘सल्तनत-ए-दिल्ली’ का भौगोलिक क्षेत्रफल सर्वाधिक रहा, जिसमें लगभग पूरा भारतीय उपमहाद्वीप शामिल था.

Muhammad bin Tughluq Army (Representative Pic: twcenter)

दिलचस्प बात तो यह है कि ‘महुम्मद बिन तुगलक’ को बेहद विद्वान शासकों में शुमार किया जाता है. कहते हैं कि वह अपने वजीरों और रिश्तेदारों पर भी हमेशा संदेह करता था और किसी भी शत्रु को कमतर नहीं समझता था.

किन्तु, सत्ता के नशे में चूर उसने कई गलत फैसले किए, जिनके कारण वह पूरे भारत को जीतने का अपना सपना पूरा नहीं कर सका. अगर वह अपनी प्रजा के बारे में सोचता, तो शायद वह एक अच्छा राजा बन सकता था.

वैसे आप का तुगलकी फरमान और तुगलक के बारे में जो भी ख्याल हो, कमेन्ट बॉक्स में अवश्य बताएं!

Web Title: Sultan Muhammad bin Tughluq, Hindi Article

Featured Image Credit: wallup