अमूमन किसी भी व्यक्ति के प्रति लोगों की आम राय होती है, किन्तु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन पर सबकी एक राय नहीं होती!

उसके समाज में दो पहलू होते हैं. एक पहलू उसकी अच्छी छवि प्रदर्शित करता है, तो दूसरे पहलू में उसकी नकारात्मक छवि होती है.

‘दस्यु रानी’ फूलन देवी एक ऐसा ही नाम है, जो सोचने पर मजबूर कर देता है कि उसके बारे में क्या कहें…

तो आईये कोई आम राय बनाने से पहले उनके जीवन के तमाम पहलुओं को टटोलने की कोशिश करें–

बचपन से ही निर्भीक थीं फूलन

10 अगस्त 1963 का दिन यूपी के जालौन जिले के गाँव गोरहा के मल्लाह देवी दीन के लिए नई मुसीबत लेकर आया था. मुसीबत इसलिए क्योंकि उसके घर बेटी ने जन्म लिया था. वहीं अगर बेटा हुआ होता तो जश्न का माहौल होता.

अब बेटी ने जन्म लिया था तो चिंता से मल्लाह का सिर फटा जा रहा था. चिंता उसको पालने की, चिंता उसको बड़ा करने की और चिंता उसकी शादी की. खैर! सच तो यह था कि उसके घर बेटी जन्म ले चुकी थी, जिसे वह झुठला नहीं सकता था.

देवी दीन ने अपनी बेटी का नाम रखा फूलन, जो बाद में दस्यु रानी के रुप में विख्यात हुई.

शुरुआत में पिता देवी दीन को भी इस बात का अंदाजा नहीं रहा होगा कि जिस बेटी का जन्म उसके लिए खास नहीं था, उसकी मृत्यु का दिन इतना खास हो जाएगा कि पूरे देश में हडकंप मच जाएगा.

अपने मां-बाप के छः बच्चों में फूलन दूसरे नंबर पर थी. आमतौर पर उसे गाँव की लड़कियों की तरह दब्बू और शांत होना चाहिए था, मगर वह एकदम अलग थी. इतनी अलग कि सही गलत की लड़ाई के लिए वह किसी से भी भिड़ जाती थी.

फूलन के पिता देवी दीन कड़ी मेहनत के बाद घर का खर्च चला पाते थे. सम्पति के नाम पर उनके पास केवल एक एकड़ ज़मीन थी. उनके पिता की मृत्यु के बाद उनका बड़ा भाई घर का मुखिया बना तथा अपने बेटे माया दीन के साथ मिलकर उसने देवी दीन के हिस्से की ज़मीन भी हड़प ली. जब फूलन को इस बात का पता लगा कि उसके चाचा ने उसकी ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया है, तो वह उनसे भिड़ गई.

Phoolan Devi (Pic: fusia)

11 की उम्र में ‘अधेड़’ से हुई शादी तो…

कहते हैं कि ज़मीन के लिए चाचा से बात इतनी ज्यादा बिगड़ गई थी कि हाथापाई तक पहुंच गई. मामला यहीं नहीं सुलझा अपने हक़ के लिए फूलन अपने खेत के बीचों-बीच धरने पर जा बैठी. इस पर उन्हें अपने पिता और अपनों का गुस्सा भी झेलना पड़ा, लेकिन वह नहीं मानी.

फूलन के उग्र स्वभाव से उनके पिता को अधिक चिंता होने लगी. पिता की इसी चिंता ने फूलन की  जिंदगी को एकदम से मोड़ दिया. महज 11 साल की उम्र में उनके पिता ने उनका विवाह एक अधेड़ व्यक्ति के साथ कर दिया. शुरुआत में फूलन ने इसका विरोध किया फिर अपनी नियति मानकर इसे स्वीकार कर लिया. फूलन के पिता ने उसके अच्छे भविष्य को लेकर यह कठोर फैसला लिया था, किन्तु, सही मायने में उन्होंने फूलन को जलती हुई आग के हवाले कर दिया था.

असल में फूलन के ससुराल वाले ठीक नहीं थे. यहां तक कि उसके पति का उसके प्रति व्यवहार ठीक नहीं था. जल्द ही फूलन के बर्दास्त से जब सबकुछ बाहर हो गया, तो वह भागकर अपने घर लौट आई. उसे उम्मीद थी कि उसके अपने लोग उसकी मदद करेंगे, लेकिन हुआ उल्टा!

समाज ने उसे ही बुरा भला कहना शुरु कर दिया.

उसके चचेरे भाई ने इस मौके का फायदा उठाकर एक झूठे आरोप में जेल तक करा दी थी. वहां भी उसे यातनाओं के साथ शारीरिक शोषण झेलना पड़ा. जैसे-तैसे वह जेल से निकलने में सफल रही. किसी तरह उसका जीवन स्थिर हो जाए, इसके लिए पिता ने कोशिश करके उसे दोबारा से उसके पति के घर भेज दिया, किन्तु उनका व्यवहार फूलन के प्रति नहीं बदला और उसे मजबूरन दोबारा ससुराल छोड़ना पड़ा.

दो-दो बार अपने ससुराल से भाग आई लड़की को समाज द्वारा स्वीकार करना सहज नहीं था. बाद में परिस्थितियों से तंग आकर फूलन एक ऐसे रास्ते रास्ते पर निकल पड़ी, जहां से वापसी संभव नहीं थी.

The Bandit Queen (Pic: moviemansguide)

…और थाम लिए हथियार!

असल में उसके जीवनी पर आधारित बनी फिल्म बैंडिट क्वीन की मानें तो 20 साल की उम्र में उन्हें अगवा करने के बाद उनके साथ दुष्कर्म किया गया. इस कारण वह डाकुओं के गिरोह में शामिल हो गई.

हथियार उठाने के बाद सबसे पहले फूलन अपने पति के गाँव पहुंची, जहाँ उसने उसे घर से निकाल कर लोगों की भीड़ के सामने चाकू मार दिया और सड़क किनारे अधमरे हाल में छोड़ कर चली गयी. जाते-जाते फूलन ने ये ऐलान भी कर दिया कि आज के बाद कोई भी बुढ़ा किसी जवान लड़की से शादी नहीं करेगा.

हथियार उठा लेने भर से फूलन की परिस्थियाँ नहीं बदली थीं. गिरोह में भी उसे कई प्रकार की विकट परिस्थितियों का सामना करना पड़ा. गिरोह के सरदार बाबू गुज्जर का दिल फूलन देवी पर आ गया था. किन्तु, यह बस उसकी शारीरिक भूख थी. इसके लिए वह लगातार कोशिशें करता रहता.

पहले उसने फूलन को बहलाने की कोशिश की, लेकिन कामयाब नहीं हुआ तो एक दिन उसने फूलन के साथ ज़बरदस्ती की. विक्रम मल्लाह, जिसका स्थान गिरोह में बाबू गुज्जर के बाद आता था उसने इसका विरोध किया. बावजूद इसके सरदार नहीं माना तो उसने उसकी हत्या कर दी.

गिरोह में फूट पड़ी तो…

बाबू गुज्जर की हत्या के बाद अगली सुबह विक्रम मल्लाह ने खुद को गिरोह का सरदार घोषित कर दिया. इसी बीच इनके गिरोह में जेल से भागे दो भाई श्री राम तथा लाला राम शामिल हुए, जिनके कारण फूलन के गिरोह में फूट पड़ गई. बाद में उन्होंने विक्रम मल्लाह को भी मार गिराया और फूलन को बंदी बनाकर अपने गाँव बेहमई ले आये.

यहाँ उसके साथ बारी-बारी से कई लोगों ने दुष्कर्म किया. फूलन की जगह और कोई होती तो शायद मर गई होती, किन्तु उसकी नियति ने उसके लिए कुछ और ही सोच कर रखा रखा था. उस पर हुए दुर्व्यवहार की जानकारी उसके कुछ पुराने साथियों को मिली तो मौके पर पहुंचे और फूलन को वहां से बचाकर ले गए.

वहां से निकलने के कुछ दिन बाद ही फूलन ने अपने साथी मान सिंह मल्लाह की सहायता से अपने पुराने मल्लाह साथियों को इकट्ठा कर के गिरोह का पुनः गठन किया और खुद उसकी सरदार बनी.

Phoolan Devi With Her Gang (Pic : The Quint)

बदले की आग में झुलसे निर्दोष

श्री राम और लाला राम के चंगुल से निकलने के सात महीने बाद फूलन देवी को वह मौका मिल गया, जिसका वह बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी. 14 फरवरी 1981 को इंतकाम की आग में उबल रही फूलन अपने गिरोह के साथ पुलिस के वेश में बेहमई गाँव पहुंची. यहाँ एक शादी का आयोजन था, जिसमे बाहर के गाँव के लोग भी आये हुए थे.

फूलन और उसके गिरोह ने बंदूक के ज़ोर पर पूरे गाँव को घेर लिया तथा ठाकुर जाति के 21 मर्दों को एक लाइन में खड़ा होने का आदेश दिया. उन 21 में से दो उनके पुराने गिरोह के डाकू भी थे, किन्तु ये वो नहीं थे जिन्होंने फूलन के साथ दुष्कर्म किया था. अपने दुश्मनों को वहां ना देख कर फूलन देवी बुरी तरह बौखला गयी.

उस घटना के चश्मदीद व उन 21 लोगों में एक मात्र जीवित बचे चंदर सिंह बताते हैं कि “फूलन ने सबसे पहले पूछा कि लाला राम कहाँ है. उसके मन मुताबिक जवाब ना मिलने के बाद उसने सभी को बैठने के लिए कहा, फिर खड़े होने के लिए. कई बार ऐसा करने के बाद अचानक से ही उसने अपने साथियों को फ़ायर करने का आदेश दे दिया.

सौभाग्य से वह अकेले गोली लगने के बाद भी जिंदा रहे.

Phoolan Devi In Public (Pic : blogto)

शर्तों पर किया आत्म समर्पण

इस कांड के बाद फूलन ‘बैंडिट क्वीन’ नाम से मशहूर हुई. लूट पाट करना, अमीरों के बच्चों को फिरौती के लिए अगवा करना, आने जाने वाली लौरियों को लूटना फूलन के गिरोह का मुख्य काम था. कुछ सालों तक यह चला, फिर किसी तरह से वह आत्म समर्पण के लिए राजी हुई, किन्तु इसके लिए उनकी अपनी शर्तें थीं. वह जानती थी कि उत्तर प्रदेश पुलिस उसकी जान की दुश्मन है, इसीलिए अपनी पहली शर्त के तहत मध्यप्रदेश पुलिस के सामने ही आत्मसमर्पण करने की बात कही.

दूसरी शर्त के तहत उन्होंने अपने किसी भी साथी को ‘सज़ा ए मौत’ न देने का आग्रह किया.  तीसरी शर्त के तहत उसने उस जमीन को वापस करने के लिए कहा, जो उसके पिता से हड़प ली गई थी. साथ ही उसने अपने भाई को पुलिस में नौकरी देने की मांग की.

फूलन की दूसरी मांग को छोड़कर पुलिस ने उसकी बाक़ी सभी शर्तें मान लीं. इस तरह फूलन ने 13 फरवरी 1983 को भिंड में आत्मसमर्पण किया.

The Bandit Queen As M.P. (Pic : History)

राजनीति की राह चली, लेकिन…

फूलन देवी पर 22 क़त्ल 30 लूटपाट तथा 18 अपहरण के मुकद्दमे चलाए गए. इन सभी मुकद्दमों की कार्यवाही में ही 11 साल बीत गए. सन 1993 में मुलायम सिंह की सरकार ने उन पर से सारे मुकद्दमे हटाकर, उन्हें बरी करने का मन बनाया. यहीं नहीं 1994 में वह जेल से छोड़ दी गयीं.

अपना अधिकांश जीवन बीहड़ और जेल में गुज़ारने के बाद सन 1996 में फूलन ने राजनीति में जाने की राह बनायी.  समाजवादी पार्टी के टिकट से मिर्ज़ापुर की सीट जीतकर वह सदन का हिस्सा बनी. उनका दो बार जीतना यह दर्शाता है कि कहीं ना कहीं उसने जनता के दिल में अपनी जगह बना ली थी.

किन्तु, कहते हैं न कि अतीत किसी का पीछा नहीं छोड़ता, वह किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाता है. 25 जुलाई 2001 को उनके आवास के सामने ही शेर सिंह राणा नामक एक व्यक्ति ने उसकी गोली मारकर हत्या कर दी. हत्या के बाद शेर सिंह राणा ने इस बात को स्वीकार किया कि उसने फूलन देवी को मार कर बेहमई नरसंहार का बदला लिया.

उसने यह भी कहा कि उसने बदला लेना भी फूलन देवी से ही सीखा है.

Sher Singh Rana (Pic : Theguardian)

अब आप चाहें तो फूलन देवी के साथ जो कुछ भी हुआ उसके लिए उनके प्रति सहानुभूति दिखा सकते हैं… या फिर आप उन्हें बुरा भी कह सकते हैं. किन्तु, इससे पहले यह सोचना जरूरी है कि आखिर इस पूरे कालखंड के लिए जिम्मेदार कौन था?

किसके कारण यह सब हुआ?

क्या उनके पिता इसके लिए जिम्मेदार थे, जिन्होंने कम उम्र में उनको किसी अधेड़ को सौंप दिया… या फिर यह समाज, जिसने उनके साथ गलत होने के बाद भी उन्हें ही गलत ठहराया? वो मानवरूपी दरिन्दे जिन्होंने एक के बाद एक फूलन देवी को मौत से भी ज़्यादा बदत्तर दिन दिखाए? या फिर फूलन देवी खुद जो ताक़त मिलने के बाद शायद भूल गई कि वो भी कभी कमज़ोर थीं?

ये कुछ ऐसे पहलू हैं, जिन पर सोचने के बाद ही फूलन के बारे में कोई राय बनाना ठीक होगा.

आप क्या कहते हैं फूलन देवी के बारे में?

Web Title: The Bandit Queen Phoolan Devi, Hindi Article

 Representative Feature Image Credit: Kickstarter