इमसें कोई दो राय नहीं कि भारतीय सेना का डंका पूरी दुनिया में बजता है. युद्ध के मैदान की बात हो या फिर आपातकालीन स्थिति के दौरान मुश्किल हालात में फंसे सैंकड़ों लोगों को रेस्क्यू करने की चुनौती… भारतीय सेना हमेशा देश के नागरिकों की उम्मीद पर खरा उतरती आई है.

बताते चलें कि भारतीय सेना के सैनिक अलग-अलग रेजिमेंट्स से आते हैं. कोई जाट रेजिमेंट से आता है तो कोई राजपूताना रेजिमेंट से. इसी कड़ी में ’17 पुणे होर्स रेजिमेंट’ एक ऐसा नाम है, जो अपनी निडरता और युद्ध में दुश्मन सेना के लड़ाकों को ढेर करने के लिये मशहूर है.

तो आईये लगभग दो सौ साल पहले स्थापित हुई इस रेजिमेंट के बारे में जानने की कोशिश करते हैं–

1817 में पड़ी बुनियाद

भारतीय सेना की 17 पुणे होर्स रेजिमेंट की बुनियाद 1817 में पड़ी. यह वह समय था, जब ब्रिटिशर्स भारत में पैर जमाये हुये थे. इस लिहाज से ब्रिटिशर्स के समय में ही पुणे होर्स रेजिमेंट वजूद में आयी. माना जाता है कि उस समय भारत के ब्रिटिश गवर्नर जनरल लॉर्ड हैस्टिंग्स ने इस रेजिमेंट को खड़ा किया था.

असल में हैस्टिंग्स ने इस रेजिमेंट को इसलिए बनाया था, क्योंकि वह इसमें भर्ती होने वाले सैनिकों की मदद से युद्ध के मैदान में दुश्मन को धूल चटा सके. कहते हैं कि सबसे पहले इस रेजिमेंट का नाम ऑक्सिलिएरी होर्स रखा गया था, यानि के घोड़ो पर सवार होकर लड़ने वाली फौज. इसके पीछे कारण यह बताया जाता है कि उस समय इतने संसाधन नहीं थे कि सेना टैंक या अन्य सैन्य हथियारों का इस्तेमाल कर सकते.

हालांकि, बाद में समय के साथ इसके नामों में बदलाव होता रहा. 1947 में देश आज़ाद होने के तीन साल बाद यह रेजिमेंट भारतीय सेना का हिस्सा बनी और फिर इसको 17 पुणे होर्स नाम दिया गया, जिस नाम से यह आज पूरे भारत में जानी जाती है.

The Indian Soldier (Pic: Online)

एकदम खास है इसका नारा

भारतीय सेना की हर रेजिमेंट का अपना एक  नारा होता है, जो उसकी ख़ास पहचान होता है. अगर बात गोरखा रेजिमेंट की करें, तो गोरखा रेजिमेंट का नारा है. ‘कायर हुनु भन्दा, मर्नु राम्रो’. गोरखा में लिखी गई इस पंक्ति काअर्थ है कि ‘कायरता की ज़िन्दगी जीने से बेहतर है मरना’.

उसी तरह पुणे होर्स रेजिमेंट भी अपने एक खास नारे के लिये पहचानी जाती है. यह नारा है ‘Yaad Ullal Fauk Idaheem’ फारसी में लिखी गई, इस पंक्ति का सीधा अर्थ यह है कि ‘ईश्वर का हाथ हर चीज के साथ’.

गजब की बात तो यह है कि पुणे होर्स रेजिमेंट का चिन्ह भी पंक्ति पर आधरित है. रेजिमेंट के विशेष चिन्ह पर दो तलवारों के बीच हाथ बना हुआ है, जो रेजिमेंट के नारे को साबित करता है.

पुणे रेजिमेंट के हर अधिकारी और सिपाही की वर्दी पर यह सिंबल बना होता है.

दो सौ साल पुराना इतिहास!

पुणे होर्स रेजिमेंट अपना 200 साल का सुनहरा और विजयी सफ़र तय कर चुकी है. दो सौ साल पूरे करने के बाद भी इस रेजिमेंट के सिपाही बिना थके हर मोर्चे पर सफ़ल होते हुये जीत की इबारत लिखते जा रहे हैं. 17 जुलाई 2017 को पुणे रेजिमेंट ने अपने दो सौ साल का सफ़र पूरा किया.

आपको जानकर हैरानी होगी कि पुणे रेजिमेंट के सिपाहियों ने नाज़ुक मौकों पर न सिर्फ देश के लिये बड़ी कुर्बानियां दी हैं बल्कि अन्य देशों की सुरक्षा के लिये भी युद्ध के मैदान में अपनी जान न्यौछावर की है. पुणे रेजिमेंट को दुनिया के 13 देशों में सहायता-युद्ध लड़ने का सुनहरा गौरव प्राप्त है.

पहले वर्ल्ड वार के दौरान 1915 में फ्रांस देश में आये संकट के दौरान पुणे रेजिमेंट ने फ्रांस पहुंचकर मोर्चा संभाला था. इसके अलावा पुणे रेजिमेंट के जांबाज योद्धाओं ने अपना सौ फ़ीसद देते हुये हर नाज़ुक मौकों पर भारतीय सेना का परचम लहराया है.

शायद बहुत कम लोगों को पता हो कि 1971 में हुये इंडो-पाक वार में पुणे रेजिमेंट के सिपाहियों ने युद्ध के मैदान में अहम भूमिका निभाई थी. भारतीय सेना की इस जांबाज रेजिमेंट के सिपाहियों ने अन्य रेजिमेंट के सिपाहियों के साथ लड़ते हुये पाकिस्तानी सेना के हज़ारों सैनिकों को भारतीय सेना के सामने घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था.

भारतीय सेना की ताक़त ही थी कि हज़ारों पाकिस्तानी सैनिकों ने युद्ध के मैदान में सरेंडर कर दिया था.

‘जांबाज’ जिन्होंने बढ़ाई शान

बागों में यूं ही नहीं खिल जाते फूल, दाने को ज़मीन में दफ़न होना पड़ता है.

किसी शायर की लिखी ये पंक्तियां 17 पुणे रेजिमेंट के उन सैनिकों पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं, जो पुणे रेजिमेंट का नेतृत्व करते हुये देश के लिये लड़ते हुये वीरगति प्राप्त कर गये.

शहीद लेफ्टिनेंट कर्नल अर्देशिर तारापोर और सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल इसके दो बड़े उदाहरण हैं. इन दोनों वीर सिपाहियों को उनकी शहादत के लिये भारतीय सेना का सबसे बड़े सम्मान परमवीर चक्र से नवाज़ा गया.

लेफ्टिनेंट कर्नल अर्दाशीर तारापोर साल 1965 में चाविंडा के युद्ध में पाकिस्तान की दुश्मन फौज से लड़ते हुये, वीरगति प्राप्त कर गये, तो वहीं लेफ्टिनेंट अरुण खेतरपाल मात्र अपनी छ: महीने की सर्विस में केवल 21 वर्ष की उम्र में 1971 के इंडो पाक वार में देश के लिये शहीद हो गये.

यह तो सिर्फ दो नाम हैं, ऐसे अनेक वीर इस रेजिमेंट से निकलकर आए, जिन्होंने देश की रक्षा के लिए खुद को हंसत-हंसते कुर्बान कर दिया.

Lieutenant Colonel Ardeshir Burzorji Tarapore (Pic: Bharatmatamandir)

’17 पुणे होर्स रेजिमेंट’ तो सिर्फ एक उदाहरण भर है. भारतीय सेना में ऐसी कई रेजिमेंट्स हैं, जिनके बनने की अलग-अलग कहानी है. किन्तु, इन सब में एक चीज बिल्कुल आम है और वह है इनके अंदर देश की रक्षा करने का असीम ज़ज्बा!

भारतीय सेना इनके बल पर ही दुश्मन देशों की निगाह से अपने देश की सुरक्षा करने में पूरी तरह कामयाब होती है.

हमेशा से भारतीय सैनिकों की धमक रही है और आगे भी जारी रहेगी.

इस बात में कोई शक नहीं!

Web Title: The Poona Horse Regiment, Hindi Article

Feature Image Credit: Business Insider