भारतीय राजनीति में छात्र राजनीति की भूमिका का अलग ही महत्व है. यही वजह है कि लगभग हर राष्ट्रीय पार्टी का एक छात्र संगठन भी है, जो न सिर्फ उन पार्टियों को बल्कि देश को भी भविष्य का नेता सौंपता है.

अमूमन, जहां छात्र राजनीति से जुड़े संगठनों की शुरूआत छात्रों से जुड़े मुद्दों और राजनीतिक विचारों से छात्रों को रूबरू करवाने के लिए होती है, किन्तु एबीवीपी के साथ ऐसा नहीं हुआ था. उसकी स्थापना का मकसद अन्य छात्र संगठनों से बिल्कुल अलग था.

कैसे आईए जानते हैं-

आरएसएस पर प्रतिबंध की वजह से बना!

द कारवां मैग्जीन में छपी रिपोर्ट के मुताबिक महात्मा गांधी की हत्या के बाद, देश भर में आरएसएस पर प्रतिबंध लगने के कारण इससे जुड़े लोगों का मिलना लगभग नामुमकिन सा हो गया था. अपने काम को आगे बढ़ाने के लिए और इससे जुड़े लोगों को मिलने के लिए अब कुछ इंतजामात की जरूरत पड़ी. ताकि ये अपने संगठन के काम को निरंतर रख सकें.

इन इंतजामातों ने शक्ल ली अखिल भारतीय परिषद् के रूप में, जिसके नाम के तहत संघ के लोग एकत्रित होते और आगे की नीति बनाते.

हालांकि, एबीवीपी का एक संगठन के तौर पर पंजीकरण आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हटने के बाद करवाया गया था. दिलचस्प बात तो यह थी कि  स्थापना के समय इसका उद्देश्य छात्र राजनीति नहीं, बल्कि आरएसएस के विचारों का प्रचार-प्रसार करना था!

RSS (Pic: Hesed.info)

मुंबई यूनिट गठन से आगे क्या... 

बाद में 1949 के आसपास, जब आरएसएस पर लगा प्रतिबंध हट गया, तो अचानक एबीवीपी की अहसियत उतनी नहीं रही. कुछ समय के लिए इसे साइडलाइन कर दिया गया, किन्तु, 1950 के दशक में संघ के नेताओं ने यह फैसला लिया कि वो एक सालाना कंवेंशन के जरिए एबीवीपी को संगठन के तौर पर आगे बढ़ाऐंगे. इस काम को अंजाम देने में संघ कार्यकर्ता यशवंत राव केलकर ने अहम भूमिका निभाई.

उन्होने एबीवीपी मुंबई यूनिट का गठन किया. इसके बाद एबीवीपी को फैलाने का काम शुरू किया गया. इसकी कई इकाईयां देश के कई राज्यों में खोली गई, जिसमें सबसे अहम थी बिहार और महाराष्ट्र की शाखा. दत्ताजी दिदोलकर, मोरोपंत पिंगले जैसे संघ प्रचारकों ने एबीवीपी के प्रसार में केलकर का साथ दिया. ये संघ प्रचारकों की लगन का ही नतीजा है कि आज देशभर में 30 लाख से ज्यादा युवा एबीवीपी से जुड़े हैं!

'आपातकाल' ने बढ़ाई लोकप्रियता

लगातार 25 वर्षों तक देश की सत्ता पर काबिज रह चुकी कांग्रेस पार्टी के खिलाफ 1975 आते-आते देश के लोगों में रोष की भावना बढ़ने लगी थी. कांग्रेस के खिलाफ बढ़ रही निराशा ने एबीवीपी जैसे कई संगठनों को मौका दिया कि वो लोगों से जुड़ें और अपनी पहचान बनाएं.

रामचंद्रगुहा की किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ के अनुसार जेपी आंदोलन और आपातकाल कुछ ऐसे मुख्य मुद्दे बनकर उभरे, जिन्होंने एबीवीपी को दिशा दी. उस मौके का उन्होंने खूब फायदा भी उठाया. भ्रष्टाचार और खराब कानून व्यवस्था से जूझ रहे राज्य, गुजरात और बिहार इसका केंद्र बने.

सही मायने में वहीं से एबीवीपी ने एक बड़े राजनैतिक मोर्चे की शुरूआत की.

1973-74 में एक तरफ, जहां कश्मीर और नागालैंड में हालात सुधर रहे थे. वहीं गुजरात में भ्रष्टाचार के चलते नए हालात पैदा हो रहे थे. उस समय के गुजरात के मुख्यमंत्री चिमानभाई पटेल के खिलाफ लोगों में गुस्सा बढ़ रहा था.  यहां तक कि उसकी भ्रष्ट छवि के चलते उनकी खूब खिचाई हो रही थी.

नवनिर्माण आंदोलन की शुरूआत

इसी क्रम में जनवरी को चिमान भाई पटेल के खिलाफ गुजरात के विधार्थियों ने नवनिर्माण आंदोलन की शुरूआत की. इसमें एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने भी अहम भूमिका निभाई. आगे आंदोलन ने आक्रामक रूप लिया तो केंद्र में बैठी इंदिरा सरकार को गुजरात में राष्ट्रपति शासन तक लागू करना पड़ा.

गुजरात में सफलता मिलने के बाद बिहार में भी उसे दोहराने का प्रयास किया गया!

नवनिर्माण आंदोलन से प्रेरित होकर बिहार में विधार्थी और कुछ वाम संगठनों ने सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. खाली कम्युनिस्टों पर सरकार से लड़ने की जिम्मेदारी न सौंपते हुए, एबीवीपी जैसे संगठनों ने मौके का भरपूर उपयोग करते हुए खुद को मुख्यधारा में लाने की कोशिश की.

बिहार छात्र-छात्राओं ने भ्रष्टचार के खिलाफ, जो आंदोलन शुरू किया था उसका सीधा असर उनकी कैंपस लाइफ पर पड़ रहा था.

The march of the ABVP (Pic: indiatoday.in)

1977 से 1982 के बीच बढ़ा कद

18 मार्च 1974 को  बिहार की अलग-अलग जगहों पर आंदोलन उग्र हो गया. इसमें तीन लोगों की जान चली गई, तो आंदोलन को दिशा देने वाले नेता की जरूरत महसूस की गई. इसको पूरा करने के लिए जयप्रकाश नारायण को मनाया गया. जोकि देश की आजादी में अहम भूमिका निभा चुका थे.

द कारवां मैग्जीन से हुई बातचीत में संघ प्रचारक गोविंदाचार्य ये दावा करते हैं कि एबीवीपी के बड़े छात्र नेता रामबहादुर राय ने जेपी को छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने का अनुरोध किया था. साथ ही वह उन्हें मनाने में कामयाब भी रहे थे.

इसी कड़ी में संघ प्रचारक राजकुमार भाटिया की माने तो उस समय रामबहादुर राय एबीवीपी के ऑरगेनाइजिंग सैक्रेटरी थे और गोविंदाचार्य के पास संघ की पटना डिविजन की बागडोर थी. आंदोलन के वक्त पटना युनिवर्सिटी छात्र राजनीति का एक अहम केंद्र था. इस जगह से कई छात्र नेता राष्ट्रीय नेता के तौर पर उभरे थे, जिनमें राजद के लालू यादव, भाजपा के सुशील मोदी और रविशंकर प्रसाद शामिल मुख्य नाम रहे. 

आपातकाल के समय एबीवीपी को काफी फायदा हुआ. 1977 से 1982 के बीच एबीवीपी की सदस्यता 1,70,000 से बढ़कर 2,50,000 तक पहुंच गई थी.

उग्र होने के लगते रहे हैं इल्जाम

एबीवीपी के सामने कई ऐसे मौके आए, जब उन्हें सवालों के कठघरे में खड़ा होना पड़ा. उन पर सांप्रदायिक दंगों में शामिल होने का आरोप तक लगा. कहा गया कि छात्र राजनीति विधार्थियों को मौका देती है कि वो किसी भी मुद्दे पर खुलकर बहस करें. उस पर विचार करें, लेकिन कई घटनाएं ऐसी हुई हैं जिसमें एबीवीपी ने इस तरह के रिवाज से हटकर तोड़-फोड़ मचाते हुए और हिंसक रूप में अपने विचार थोपने की कोशिश की.

किसी फिल्म की स्क्रीनिंग से लेकर किसी सेमिनार को होने से रोकने तक कई ऐसे विवाद रहें हैं, जिसके चलते एबीवीपी को छात्र संगठन के रूप में आलोचनाओं का शिकार होना पड़ा. कहते हैं कि अतिराष्ट्रवाद की भावना ही वो सबसे बड़ा पैतरा है, जो युवाओं को एबीवीपी की ओर आकर्षित करता रहा. हालांकि, एबीवीपी की ऑफिशियल वेबसाइट के मुताबिक ये संगठन देश में राष्ट्रवादी विचारों को संरक्षित कर रहा है!

चुनौतियों की डगर पर छात्र राजनीति

भारत की कुल जनसंख्या के 50 प्रतिशत लोग 25 साल से कम उम्र के हैं. 65 प्रतिशत लोगों की आयु 35 वर्ष से भी कम है. इससे ये अंदाजा लगाया जा सकता है कि राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने में युवा कितना अहम किरदार निभा रहे हैं.

इन युवा मतदाताओं की भूमिका में जो एक अहम कड़ी है, वो है छात्र राजनीति.

हालांकि, इतनी युवा जनसंख्या होने के बावजूद बहुत कम युवा ही छात्र राजनीति से जुड़ पाते हैं. इनमें महिलाओं की संख्या की हालात उसी तरह खराब है, जिस तरह से राष्ट्रीय राजनीति में है.

ईपीडब्लू की एक रिपोर्ट के मुताबिक जेएनयू, जो महिलाओँ के लिए समान अवसर और समानता के लिए नामी शैक्षणिक संस्थान माना जाता है. वहां 50 प्रतिशत महिलाएं छात्र राजनीति से बिल्कुल ताल्लुक नहीं रखती हैं. जबकि, केवल 5.6 प्रतिशत महिलाएं ही पूरी तरह छात्र राजनीति में सक्रिय हैं.

ABVP Students (Pic: newink.in)

कई बार छात्र संगठन अपनी मुख्य पार्टी के दबावों में आकर अपने कर्तव्यों और देशभर में छात्रों और समाज के प्रति उनकी जिम्मेदारियों से पीछे हट जाते हैं, जिससे छात्र राजनीति पर सवाल उठते हैं और उससे आने वाले समय की राष्ट्रीय राजनीति को नुक्सान पहुंचता है.

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Web Title: The story of ABVP and its student politics , Hindi Article

Feature Image Credit:  muslimmirror.com