जहां तक नजर जाती है, वहां तक दिखाई देता असीमित सागर, पैरों के नीचे कुछ सूखी कुछ गीली रेत, एक ओर सूरज का डूबना और दूसरी ओर नया सवेरा… सुकून भरा यह नजारा है पुदुच्चेरी!

वही पुदुच्चेरी, जो आज सियासतदानों के लिए किसी खजाने से कम नहीं, वही पुदुच्चेरी जो कभी ‘पांडिचेरी’ कहलाता था और फ्रां सीसियों की मिल्कियत था.

कहते हैं जब समूचे भारत में ब्रिटिश सेना का अधिपत्य था, तो केवल ‘पांडिचेरी’ ही था जहां एक छोटा सा फ्रांस जिंदा था. भारत में आज न तो ब्रिटिश हैं, न फ्रेंच पर फिर भी ‘पांडिचेरी’ में फ्रेंच खुशबू को महसूस किया जा सकता है.

यही वजह है कि देश-दुनिया के लोग इसे देखने के लिए खिंचे चले आते हैं!

पर आखिर कैसे भारत का एक हिस्सा पूरी तरह से फ्रेंच तौर तरीकों में ढल गया और क्यों एक छोटे से मछुआरों के गांव के लिए ब्रिटिश और फ्रांसीसी सेना के बीच युद्ध होते रहे…

आइए जानते हैं—

जब भारत आए फ्रांसीसी

भारत में मुगलों का शासन था, जब 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पुर्तगालियों को भारत का रास्ता मिला. 17वी शताब्दी के पूर्वार्ध तक उनका व्यापारिक प्रभाव भारत के अधिकांश हिस्सों पर फैल चुका था. इसके बाद नीदरलैंड और हॉलैंण्ड से आए डच व्यापारियों ने भारत में अपनी पैठ बनानी शुरू की.

15वीं शताब्दी के अंत में डच कर्नेलिस डि हाऊटमैन पहली बार भारत पहुंचा. डचों ने सन 1602 ई. तक भारत विभिन्न राज्यों में व्यापारिक केन्द्रों की स्थापना कर ली थी. भारत पर सबसे ज्यादा जोर भी पुर्तगाली और डचों का ही था.

इसके बाद भारत में प्रवेश हुआ फ्रांसीसियों का. हालांकि, अन्य यूरोपीय कंपनियों की तुलना में फ्रांसीसी देर से भारत आए थे, पर उन्हें व्यापार की अब भी बहुत सारी संभावनाएं दिखाई दे रहीं थीं. 1664 ई. में फ्रांस के सम्राट लुइ 14वें के खास मंत्री कोल्बर्ट को भारत में पुर्तगालियों और डचों के बढ़ते प्रभाव की जानकारी थी.

वह चाहते थे कि फ्रांस भी भारत में व्यापार करे, इसलिए फ्रांसीसी व्यापारिक कंपनी ‘कंपनी द इंड ओरिएंटल’ (कंपनी देस इंडस ओरिएंटल) का निर्माण किया गया.

सम्राट की इजाजत मिलने के बाद फ्रांसीसी व्यापारियों ने पहली बार भारत की राह पकड़ी. चूंकि कंपनी का निर्माण फ्रांस के सम्राट और मंत्रियों की बदौलत हुआ था, इसलिए उसके सारे खर्च की जिम्मेदारी भी सरकार की थी.

इस तरह से इसे सरकारी कंपनी ही माना गया.

कंपनी के सदस्यों में प्रमुख फ्रैंक कैरो ने भारत के विभिन्न हिस्सों का मुआयना किया. इसके बाद तय हुआ कि कंपनी अपने व्यापार की शुरूआत सूरत से करेगी. 1668 ई. में फ्रैंक कैरो ने सूरत में पहले व्यापारिक संस्थान की स्थापना की. इसके कुछ महीनों के भीतर ही फ्रैंक कैरो ने गोलकुंडा रियासत के सुल्तान से मुलाकात की और 1669 ई. मसूलीपट्टनम में दूसरे व्यापारिक संस्थान की स्थापना की.

1673ई. में फ़्रेंडोईस मार्टिन ने ‘पांडिचेरी’ का रुख किया और यहां कंपनी का मुख्यालय बनाया. इसके बाद व्यापार को गति मिलती गई और बंगाल के नवाब शाइस्ता खां से किराए पर जमीन लेकर 1692 में चंद्रनगर में भी व्यापारिक संस्थान की स्थापना कर दी गई. इस तरह गुजरात, दक्षिण भारत और बंगाल में फ्रांसीसियों का व्यापार फलने-फूलने लगा.

Portuguese India Armadas (Pic: historydiscussion.net)

भारतीय फ्रांस बन गया ‘पांडिचेरी’

फ्रांसीसियों के आने से पहले ‘पांडिचेरी’ मछवारों का छोटा सा गांव था, जिसे व्यापारिक केन्द्र बनाकर फ्रांसीसियों ने बड़े बंदरगाह की शक्ल दे दी. यह फ्रांसीसी उपनिवेशों की राजधानी बन चुका था. व्यापारिक केन्द्र होने के कारण सबसे ज्यादा सम्पन्नता यहीं थी.

बड़े व्यापारी और फ्रांस के सरकारी अधिकारी ‘पांडिचेरी’ में ही रहा करते थे. यही कारण है कि इसका विकास भी तेजी से हुआ. जनरल डूमा को फ़्रांसीसी उपनिवेश पाण्डिचेरी का गवर्नर बनाया गया, जिसने शहर का कायापलट ही कर दिया.

भारतीय सभ्यता के प्रतीक चिन्हों पर कुछ ही सालों में फ्रेंच कला का असर दिखने लगा था. यहां के मकानों के डिजाइन, रास्तों का निर्माण, गार्डन और सराय आदि का निर्माण फ्रेंच आर्किटेक्ट के हिसाब से हुआ.

‘पांडिचेरी’ के बीचों को कुछ इस तरह से निखारा गया, ताकि यहां सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा मन को शांति दे. बीच के आसपास पीस हाऊस बनाएं गए, जहां फ्रांसीसी अधिकारी कारोबारी वक्त बिताया करते थे.

शहर में लाइब्रेरी और संग्राहलयों का निर्माण शुरू हुआ. इस काल में हिन्दुओं के मंदिरों को कोई नुकसान नही पहुंचा, लेकिन चर्च का निर्माण जारी रहा. उन दिनों ‘पांडिचेरी’ की हर गली में फ्रांस की झलक मिलती थी. लोगों के कपड़ों से लेकर घरों की सजावट तक में फ्रेंच झलक थी.

फ्रांस की ही तरह ‘पांडिचेरी’ में भी फ्रेंच शिल्पकारों ने स्टेच्यू के निर्माण किए, जिसमें प्रेमी जोड़ों का आलिंगन साफ झलकता था. होटल्स में फ्रेंच रसोइयों की बनाई डिश परोसा जाना शुरू हुआ, जिसकी चर्चा बंगाल से लेकर गुजरात तक थी.

खटक रहा था यह विस्तार

1693 ई. तक फ्रांस के व्यापारियों की पकड़ भारत में मजबूत हो चुकी थी. उनके राजाओं से अच्छे संबंध थे. यह बात डच और पुर्तगाल के व्यापारियों को हमेशा से खल रही थी. खासतौर पर ‘पांडिचेरी’ यूरोपीय व्यापारियों के आंख की किरकिरी बन चुका था. यहां की खूबसूरती और शिल्पकारी डचों को भी आर्कषित कर रही थी.

इसी दौरान डचों ने ‘पांडिचेरी’ पर अपना कब्जा साबित कर दिया. उन्होंने बल प्रयोग कर ‘पांडिचेरी’ को अपना व्यापारिक केन्द्र बता दिया. यह पहला मौका था, जब फ्रेंच व्यापारियों को डचों से सामना करना पड़ रहा था. चूंकि डच व्यापारियों के पास सेना का बल था, इसलिए फ्रेंच हार गए और ‘पांडिचेरी’ पर डचों का कब्जा हो गया.

कुछ सालों तक फ्रेंच ‘पांडिचेरी’ से बाहर ही रहे. उन्होंने गुजरात और बंगाल में अपने कारोबार पर ध्यान देना शुरू किया, पर जो व्यवस्था ‘पांडिचेरी’ की वजह से सुधरी हुई थी, वह गड़बड़ाने लगी. अंत में फ्रेंच व्यापारियों ने डच व्यापारियों से संधि की. इसके तहत दोनों ने एक-दूसरे के व्यापार को विस्तार देने की बात पर सहमति दी और 1699 में ‘पांडिचेरी’ एक बार फिर फ्रांसिसीयों को मिल गया.

हालांकि, यूरोपीय व्यापारियों से फ्रांसीसियों को धोखा ही मिला और 1670 तक उनके सूरत और चंद्रनगर वाले व्यापारिक केन्द्र घाटे के कारण बंद हो गए. फ्रेंच समझ चुके थे कि यदि व्यापार करना है, तो उन्हें राजनीतिक तौर पर मजबूत होना पड़ेगा.

‘पांडिचेरी’ में चुपचाप व्यापार करते हुए फ्रेंच कारोबारियों ने 1723 में यानम, 1739 में कराईकल और 1725 में माहे में व्यापारिक संस्थान स्थापित कर लिए. 17वीं शताब्दी के मध्य आते तक ‘पांडिचेरी’ एक बड़े शहर का रूप ले चुका था.

दुश्मनी ने बिगाड़ा खेल

‘पांडिचेरी’ के विकास काल में फ्रेंच और ब्रिटिश राज के बीच सैन्य झड़पें और व्यापार हथियाने का सिलसिला जारी रहा. फ्रांस और ग्रेट ब्रिटेन देशों के वैसे भी आपस में अच्छे संबंध नही थे, जिसका असर भारत में साफ दिखाई दे रहा था.

भारत में भी इनके वर्चस्व की लड़ाई शुरू हो चुकी थी. ब्रिटेन और फ्रांस के बीच चार बार युद्ध हुए, जिसमें से तीन सबसे बड़े थे. इनकी युद्धों की पृष्ठभूमि कर्नाटक के क्षेत्र थे, इसलिए इतिहास में इन्हें कर्नाटक युद्ध का नाम दिया गया. खास बात यह रही कि इन सभी युद्ध में ‘पांडिचेरी’ को हथियानेे की मंशा केन्द्र में रही.

पहला युद्ध पांडिचेरी के गवर्नर डूप्ले के नेतृत्व में 1746—48 में लड़ा गया और फ्रांसीसियों की जीत हुई. इसके एवज में उन्होंने ब्रिटेन से उत्तरी सरकार के क्षेत्र हथिया लिए, जिन पर 7 सालों तक फ्रांसीसी अफसर बुस्सी का नियंत्रण रहा.

इस हार के बाद भी ब्रिटिश अफसर शांत नही बैठे और 1749—58 के दरमियान दूसरे युद्ध लड़ा गया. इस युद्ध् की कमान भारत में ब्रिटिश राज्य की स्थापना करने वाले रॉबर्ट क्लाइव ने सम्हाली थी. उन्होंने 1751 ई. में ब्रिटिश सैन्य शक्तियों का विस्तार किया और फ्रांस को हरा दिया. इसके बाद फ्रांस ने ब्रिटेन के साथ ‘पांडिचेरी’ के मसले पर संधि कर ली.

1756 में फ्रांसीसी सेनापति काउंट दे लाली ने मद्रास पर आक्रमण कर दिया. मद्रास की सुरक्षा की जिम्मेदारी उन दिनों ब्रिटिश अफसरों की थी, इसलिए यह फ्रांस और ब्रिटेन के बीच लड़ा गया तीसरा युद्ध कहलाया, जिसमें ब्रिटिश सेनापति सर आयरकूट ने फ्रांस को एक बार फिर धूल चटा दी.

1761 ई. में ब्रिटिशों ने ‘पांडिचेरी’ पर एक बार फिर कब्जा कर लिया.

हालांकि, 18वीं शताब्दी तक एक बार फिर ब्रिटेन और फ्रांस के बीच जंग हुई और इस बार जीत फ्रांसीसी सेना की हुई. आखिरकार ‘पांडिचेरी’ फिर से फ्रांस के अधिपत्य में आ गया. इसके बाद ब्रिटेन ने ‘पांडिचेरी’ को छोड़कर भारत के बाकी हिस्सों में कब्जा करने पर ध्यान केन्द्रित कर लिया.

A battle taking place at Pondicherry (Pic: Getty Images)

भारत का हिस्सा भारत में विलय

‘पांडिचेरी’ पर कब्जा करने के बाद सालों तक फ्रांसीसियों ने यहां राज किया. यह व्यापार की दृष्टि से एक बेहतर विकल्प था. कुछ ही सालों में पूरे भारतवर्ष में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन शुरू हो गए और 19वीं शताब्दी आते-आते तक ब्रिटिश हुकूमत की पकड़ कमजोर पड़ने लगी.

1947 में भारत आजाद हुआ. इसके बाद देश में रियासतों के विलय का काम शुरू हुआ. भारत सरकार के लिए भी ‘पांडिचेरी’ का मुद्दा गंभीर था. चूंकि यह क्षेत्र चार जिलों पांडिचेरी, कराईकल, माहेे, यानाम से मिलकर बना था. यह चारों क्षेत्र क्रमश: तमिलनाडु, केरल और आंध्रप्रदेश के अधिकार क्षेत्र में आते थे, इसलिए पांडिचेरी पर तीन राज्यों ने दावा किया.

आखिरकार 1962 में पांडिचेरी को केन्द्रशासित राज्य का दर्जा दे दिया गया.

2006 में पांडिचेरी का नाम बदलकर पुदुच्चेरी कर दिया गया. आज भी पुदुच्चेरी राजनेताओं के लिए किसी सुनहरे अवसर से कम नही है. इस राज्य को पाने के लिए सियासी जंग अब भी जारी है.

किन्तु, यदि पुदुच्चेरी को ध्यान से देखा जाए तो यह फ्रांस का ही एक हिस्सा नजर आता है. यहां आज भी फ्रेंच कॉलोनियां बसी हुई हैं. कई फ्रेंच परिवार अब भी यहां के निवासी हैं. फ्रेंच होते हुए भी अब वे पूरी तरह से भारतीय हो चुके हैं.

Pondicherry Station (Pic: India Rail Info)

तो यदि आप फ्रांस जाने की सोच रहे हैं तो पहले एक बार पुदुच्चेरीजरूर घूमकर आएं और फ्रांस की सभ्यता और शिल्पकारी को नजदीक से समझे. इसके साथ ही अपने अनुभव हमसे जरूर साझा करें.

Web Title: UK and France fought several times for Puducherry, Hindi Article

Feature Image Credit: BBC.com