आज उठा है फिर वह मानव, एक रोटी की आस में।
जीवन के इन संघर्षों में लड़ता है वह, एक रोटी की आस में।
भोर हुई फिर हुआ अंधियारा, एक रोटी क‍ी आस में।
श्रीकृष्ण से मिलने गए सुदामा, एक रोटी की आस में।।

आशुतोष शर्मा की लिखी यह चंद पंक्तियां शायद कुछ खास वर्ग के लोगों ने न सुनी हों. जो रोटी की कीमत समझता है, वह इन शब्दों के मोल से भी वाकिफ है.

रोटी ही वो चीज है कि जिसके लिए गरीब दामन फैलाता है और अमीर अपना बटुआ.

सामान्य अर्थों में रोटी को भोजन के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन अकेली रोटी की क्षमता भी कम नहीं है. कहते हैं कि इस धरती पर इंसान जो कुछ कर रहा है, उसके पीछे कहीं न कहीं रोटी की ही आस है.

यानी रोटी, प्रेरणा है, ताकत है और सपना है!

रोटी की इससे अच्छी परिभाषा हो ही नहीं सकती और 1857 के 'चपाती आंदोलन' से बड़ा उदाहरण इसका दूसरा कोई नहीं. बेशक इस अजीबोगरीब आंदोलन का जिक्र सुनकर आपकी त्यौरियां चढ़ गई होंगी और आप सलाह देना चाहते होंगे कि 1857 में भारत का पहला स्वंतत्रता संग्राम लड़ा गया.

पर जरा ठहर जाएं और एक बार 'चपाती आंदोलन' पर गौर करें –

आंदोलन का एकमात्र सबूत, वो खत!

सन 1857 की क्रांति का जितना वृहद और व्यापक चित्रण हमारे इतिहासकारों ने किया है उतनी तवज्जो 'चपाती आंदोलन' को नहीं मिली. शब्दों से अर्थ लगाया जाए तो लगेगा शायद यह भूखों को रोटी बांटने की कोई मुहिम होगी या फिर रोटी बनाने की कोई प्रतियोगिता. पर नहीं यह कुछ और ही था, क्या था यह आज भी एक सवाल है!

इस आंदोलन के बारे में मार्च 1857 में ईस्ट इंडिया कंपनी के सैन्य सर्जन डॉ गिल्बर्ट हैडो ने पहली बार जिक्र किया था. उन्होंने भारत से ब्रिटेन अपनी बहन को एक खत लिखा, जिसमें उन्होंने 'चपाती आंदोलन' का जिक्र किया. शायद भारतीय इतिहास में यह खत अकेला सबूत है कि भारत में ऐसा भी कोई आंदोलन हुआ था.

हैडो ने अपने खत में लिखा कि ''वर्तमान में पूरे भारत में एक रहस्यमय आंदोलन चल रहा है. वह क्या है कोई नहीं जानता? उसके पीछे की वजहों को आज तक तलाशा नहीं गया है? यह कोई धार्मिक आंदोलन है या कोई गुप्त समाज का षड्यंत्र? कोई कुछ नहीं जानता. कुछ पता है तो बस यह कि इसे 'चपाती आंदोलन' कहा जा रहा है.''

हैडो के खत से जाहिर है कि यह कोई छोटी-मोटी घटना नहीं थी, बल्कि एक ऐसा आंदोलन था जिसने ब्रिटिश हुकूमत की नींद हराम कर दी थी.

तभी तो हैडो ने इसे जरूरी समझा और इतना जरूरी की अपनी बहन तक खबर भिजवाई.

Two British Sepoy Officers. (Pic: wikipedia)

90 हजार पुलिसकर्मी हुए आंदोलन में शामिल

बहरहाल, इस आंदोलन पर सबसे पहली नजर मथुरा में पदस्थ मजिस्ट्रेट मार्क थॉर्नहिल की गई. एक रोज वे अपनेे घर से थाने पहुंचे और पाया कि उनकी टेबिल पर कुछ सफेद से गोल बिस्किट जैसी चीज रखी है, जो पहली नजर में किसी गंदे केक की तरह दिखती है. उस पर काले-काले धब्बे भी हैं. चपाती का यह अजीब वर्णन इसलिए है, क्योंकि ब्रिटिश चपाती से परिचित नहीं थे और मार्क ने अपने आला अधिकारियों को चपाती की कुछ यही परिभाषा सुनाई थी.

मार्क ने मेज से चपातियों को हटाया और सिपाही को बुलाकर उसके बारे में पूछा? सिपाही ने बताया कि एक भारतीय सिपाही को गांव से थैला मिला है, जिसमें इसी तरह की चपातियां भरी हुई हैं.

भारतीय सिपाही से पूछा गया, तो पता चला कि एक गांव के भारतीय चौकीदार ने यह बोरा थमाया है. चौकीदार से पूछा गया तो पता चला कि कोई रात को जंगल के रास्ते आया था और यह चपातियों से भरा बोरा देकर गया है. साथ ही कहा कि इसी तरह की और चपातियां बनाई जाएं और दूसरे गांव भिजवाई जाएं.

मार्क को यह एक मजाक सा लगा. फिर भी जांच जरूरी थी.

कुछ दिनों में खबरें आनी शुरू हुईं कि इस तरह के बोरे आसपास के लगभग हर गांव, हर चौकी के पास मिल रहे हैं.

मार्क ने मामले को गंभीरता से लिया और जांच शुरू की. इस जांच में भारतीय सिपाहियों की मदद का कोई फायदा नहीं मिल रहा था, क्योंकि वे स्वयं भी चपाती बनाने और बांटने में सहयोग कर रहे थे. एक अनुमान के अनुसार करीब 90 हजार से ज्यादा भारतीय पुलिसकर्मी एकजुट होकर चपातियों के बोरे एक गांव से दूसरे गांव पहुंचा रहेे थे.

दिक्कत यह थी कि चपाती तो खाने का एक पदार्थ है. उस पर किसी के हस्ताक्षर नहीं हैं, कोई संदेश नहीं लिखा. यह कोई हिंसा का साधन नहीं है, इसलिए किसी को चपाती बनाने या बांटनेे से रोका नहीं जा सकता. 

इस तरह से मार्क की नाक के नीचे गांव-गांव चपाती पहुंचती रही.

The Secret of Chapati Movement. (Pic: The Better India)

अंग्रेजों के हाथ नहीं लगा कोई सबूत

जांच के दौरान पता चला कि एक गांव में जो चपाती बनती है, वह रात भर में आपने आसपास का कम से कम 300 किमी तक का सफर तय कर दूसरे गांव में पहुंच जाती है. यानी चपाती पहुंचने की यह सुविधा उस दौर की ब्रिटिश मेल सुविधा से भी ज्यादा तेज थी. जो ब्रिटिश अधिकारियों के लिए सिर दर्द बनती जा रही थी.

कुछ सप्ताह में चपाती बांटने की यह मुहिम और तेज हुई. मध्य भारत से लेकर नर्मदा नदी के किनारे-किनारे और दूसरी तरफ नेपाल तक इसकी पहुंच बन चुकी थी.

हालांकि चपाती बांटने वालेे भी इस रहस्य से अनभिज्ञ थे कि आखिर यह काम हो क्यों रहा है? गांव में बस एक अंजान आदमी आता और रोटियों का बोरा थमाकर चला जाता. संदेश होता कि और रोटियां बनाओ और दूसरे गांव पहुंचाओ. क्यों? इसका कोई जवाब नहीं.

ब्रिटिश अधिकारियों को अपने किसी सवाल का जवाब नहीं मिल रहा था. अब कुछ था तो केवल अफवाहें.

कयास लगाए जाने लगे कि रोटियों के जरिए कोई गुप्त संदेश पहुंचाया जा रहा है? शायद कोई बहरूपियां सीमा पार करने के लिए रोटियों की मदद ले रहा है? या फिर कोई गुप्त आंदोलन की योजना बन रही है?

हालांकि यह केवल कयास थे, सबूत कुछ नहीं. रोटी पहुंचाने वाले आम आदमी थे, कहीं बच्चे, तो कहीं बुजुर्ग. ऐसे में सख्ती दिखाने का सवाल ही नहीं उठता.

1857 के विद्रोह से संबंधित कुछ दुर्लभ दस्तावेजों में लिखा है कि 5 मार्च 1857 तक चपाती अवध से रुहेलखंड और फिर दिल्ली समेत नेपाल तक पहुंच गई थी.

ब्रिटिश अधिकारियों को जब कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने आंदोलन को रोकने के​ लिए सरकारी नमक में गाय और सुअर के खून के छींटें फेंकना शुरू कर दिए. ताकि कोई हिंदू और मुस्लिम इन्हें हाथ न लगाए. अफवाह फैलाई गई कि आटे में सुअर का मांस मिलाकर बेचा जा रहा है. हालांकि यह सारी कोशिशें नाकाम रहीं.

गांव वाले अपने खेत के गेंहू से आटा पीसते और फिर चपाती बनाते और बांटते, लेकिन क्रम निरंतर जारी रहा. मध्य भारत, दिल्ली, उप्र, कलकत्ता, गुजरात तक चपाती की धमक पहुंच चुकी थी.​

ब्रिटिश तंत्र बुरी तरह हिला हुआ था, क्योंकि किसी को इस रहस्यमय आंदोलन का अर्थ समझ नहीं आ रहा था?

देश के महज कुछ लोगों को एक सहज सा प्रयास ब्रिटिश हुकूमत की नींद उड़ाने के लिए काफी था.

Men From Various Regiments of Presidency of Madras. (Pic: mikedashhistory)

...तो क्या तात्या से जुड़ा है रहस्य

कुछ ही सप्ताह और फिर माह बीते थे कि 10 मई 1857 को मेरठ से ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ पहला सशस्त्र विद्रोह फूटा. यह ​विद्रोह एक साथ, एक ही तारीख को इतने व्यापाक तरीके से सामने आया कि साफ था कि आंदोलन को भूमिगत तरीके से तैयार किया गया.

विद्रोह के कुछ सालों बाद जेडब्ल्यू शेरर ने अपनी किताब लाइफ फॉर द इंडियन रिवॉल्ट में लिखा है कि 1857 के संग्राम की रणनीति बहुत ही रहस्यमय और बेचैनी पैदा करने वाली थी. यह एक शानदार प्रयोग था, जिसे शानदार तरीके से अंजाम दिया गया.

ब्रिटिश हुकूमत को हिला देने वाली यह गतिविधि भूमिगत तरीके से तैयार हुई थी.

बाद के कुछ अध्ययनों में कहा गया कि इस रणनीति को 1850 से तात्या टोपे ने शुरू किया था, जिसे 1857 में जाकर अंजाम दिया गया.

'चपाती आंदोलन' भी शायद इसी मुहिम का हिस्सा रहा होगा. चपाती कोई हथियार नहीं था, पर उसने लोगों को एक करने में मदद की. किताब में यहां तक कहा गया है कि कुछ लोग चपाती पहुंचाने के साथ ही कान में कुछ ​फुसफुसाते थे! शायद वे कहते थे, सब लाल होगा.

इतिहास की किताबों में तात्या टोपे के बारे में लिखा है कि वे कमाल की रणनीतिकार थे. उनकी योजनाएं ऐसी होती थीं कि उन्हें समझ पाना अच्छे-अच्छे विद्ववानों के बस में नहीं था, फिर भला ब्रिटिश हुकूमत की क्या बिसात!

उन्होंने विद्रोह से पहले एक मनोवैज्ञानिक खेल खेला था और ब्रिटिश अधिकारी इस खेल में ही उलझे रह गए.

ऐसा मत है कि अंग्रेजों को भ्रमित करने के लिए विद्रोह से कुछ दिन पहले इस आंदोलन को हवा दी गई थी. तात्या टोपे और रानी लक्ष्मी बाई की सेना में चपातियों के ऐसे कई बोरे सैनिकों के साथ चलते थे. गुरिल्ला लड़ाई के दौरान कुंवर सिंह ने भी अपने सैनिकों को रोटियों के थैले थमाए थे. वे जिस गांव में रुकते, वहीं से रोटियां थैले में भर लेते थे.

Amar Balidani Tatya Tope. (Pic: Amazon)

वैसे, एक कारण यह भी बताया जाता है कि मध्य भारत में कोलेरा नाम की बीमारी का प्रकोप फैला था. इस बीमारी से पीड़ित परिवार को मदद पहुंचाने के लिए 'चपाती आंदोलन' शुरू हुआ था. हालांकि साक्ष्य तो इस बात के भी नहीं मिलते हैं.

अंतत: 'चपाती आंदोलन' अंग्रेजों के लिए हमेशा एक रहस्य ही रहा. पर उससे भी दुखद यह है कि हमारे इतिहासकारों ने भी इसे कभी टटोलने की कोशिश नहीं की!

Web Title: Untold Story of The Mysterious Chapati Movement in India, Hindi Article

Featured Image Credit: wikipedia