अंग्रेजों ने अपने शासनकाल के दौरान भारतीयों पर ढ़ेर सारे जुल्म किए. एक से बढ़कर एक अत्याचार को अंजाम दिया. जलियांवाला बाग हत्याकांड भी ऐसे ही एक क्रूर कांड की बानगी था. इस नरसंहार में लगभग 1000 लोगों (Link in English) की अग्रेजों ने निर्मम हत्या कर दी थी. माना जाता है कि इस कांड में एक अनाथ युवा के सिवा कोई भी भारतीय बचकर निकल नहीं पाया था.

इस युवा का नाम था उधम सिंह, जिसने लोगों को अपनी आंखों के सामने मरते हुए देखा. बाद में इसी युवा ने 1940 में लंदन जाकर इस घटना के जिम्मेदार माइकल ‘ओ’ ड्वायर को मार गिराया. ऐसे में सवाल यह है कि 1919 से 1940 के बीच में उधम कहां रहे? उन्होंने क्या किया? वह किस तरह से लंदन पहुंचे? और भगत सिंह के साथ उनका क्या कनेक्शन था? आईये इनके जवाब जानने की कोशिश करते हैं:

क्यों कहा गया उधम को अनाथ?

26 दिसंबर 1899 (Link in English) को पंजाब के सुनाम गांव में एक बच्चे ने जन्म लिया. नाम रखा गया शेर सिंह. अपने नाम के मुताबिक बचपन से शेर सिंह बहुत बहादुर थे. वह दौड़ना ही सीख पाये थे कि उनके पिता का देहांत हो गया. इस दुख से वह उभर पाते इससे पहले मां ने भी हमेशा के लिए अपनी आंखे बंद कर लीं. अब सिर्फ बड़े भाई का ही उन्हें सहारा था. पर समस्या यह थी कि बड़े भाई की उम्र भी इतनी नहीं थी कि वह श्रम करके उनका पालन-पोषण कर पाते.

इस कारण उन्हें अपने भाई के साथ खालसा अनाथालय में रहना पड़ा. यहीं उनको सभी उधम सिंह कहकर पुकारने लगे. जैसे-तैसे जीवन बीत रहा था कि 1917 में उनके भाई साधु सिंह भी चल बसे. भाई की मौत के बाद उधम के जीवन में कोई नहीं बचा था. वह अनाथ हो गये थे. उन्होंने खुद को लोगों की सेवा में समर्पित कर दिया था.

इसी कड़ी में वह बैशाखी के पर्व पर 13 अप्रैल, 1919 को लोगों की सेवा में जलियांवाला बाग में मौजूद थे. वह वहां आये हुए लोगों को पानी पिला रहे थे. तभी उन्होंने देखा कि एक अंग्रेज अफसर तेजी से आया. उसके साथ कई सारे अन्य सैनिक भी थे. देखते ही देखते उन्होंंने अपनी पोजिशन ली और जलियांवाला बाग के दरवाजे बंद कर दिये गये, ताकि वहां से कोई भाग न निकले.

उधम को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि यह क्या हो रहा था. वह आगे बढ़ते तभी अंग्रेज अफसर जनरल डायर ने फायरिंग के आदेश दे दिये. मिनटों में वहां लाशों के ढ़ेर लग गये. चूंकि उधम साइड में थे, इसलिए उन पर अंग्रेज सिपाहियों की नजर नहीं पड़ी. वह इस कांड से बच निकले थे. यहां से निकलकर उन्होंने ठान लिया था कि इस नरसंहार का बदला जरुर लेंगे.

Untold Story of Udham Singh (Pic: thequint.com)

गदर पार्टी में सक्रिय रहे और…

जालियांवाला बाग हत्याकांड के बाद उधम सिंह पूरी तरह से क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गये. उन्होंने गदर पार्टी को ज्वाइन कर लिया. गदर उस समय का एक सक्रिय क्रांतिकारी संगठन था, जो अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोले हुए था. साथ ही यह संगठन देश के युवाओं में देशप्रेम की भावना को हवा देने का काम करता था. चूंकि, अंग्रेजोंं से लड़ने के लिए इस संगठन को पैसों की जरुरत पड़ती रहती थी, इसलिए इस संगठन से जुड़े हुए लोग यहां-वहां पैसे की जुगत में रहते थे. अधिकतर अंग्रेजोंं के खजानों पर इनकी नज़र रहती थी.

उधम ने संगठन के इस काम के लिए अपने कदम आगे किए. वह पैसा जुटाने के लिए अमेरिका, अफ्रीका और जिम्बाब्वे जैसे देशों में घूमते रहते थे. अपनी तेजी और सक्रियता के चलते वह मशहूर हो चुके थे. दो-एक बार जेल भी जा चुके थे.

भगत सिंह के साथ कनेक्शन

भगत सिंह (Link in English) उस समय के बड़े क्रन्तिकारी हुआ करते थे. उन्हें लगा कि देश में ‘क्रांति’ की नींव कमजोर पड़ रही है, तो उन्होंने उधम सिंह को भारत वापस आने के लिए कहा. इसके बाद वह अपने साथियों व हथियारों के जखीरे के साथ भारत आये और यहां सक्रिय हो गए.

आगे उधम ने भगत सिंह के साथ मिलकर ढ़ेर सारे मिशन पूरे किए. असल में वह भगत सिंह को बहुत मानते थे. उनका भगत सिंह के साथ एक अलग किस्म का रिश्ता था. वैसे तो इन दोनों की पहली मुलाकात लाहौर की एक जेल में हुई थी, लेकिन इनको देखकर लगता था कि यह बचपन से एक दूसरे को जानते थे. दोनोंं में कई समानताएं थीं.

दोनों पंजाब से थे. दोनों क्रांतिकारी थे. दोनों को भगवान पर ज्यादा आस्था नहीं थी. दोनों सभी धर्मों को मानने वाले थे और सबसे बड़ी समानता कि दोनों को जालियांवाला बाग कांड ने बहुत प्रभावित किया था.

ड्वायर को लंदन में घुसकर मारा

अपने क्रांतिकारी कारनामों के चलते उधम पुलिस की नजर में आ चुके थे. वह किसी भी तरह से उधम को लंबे समय के लिए जेल में डालने की योजना बनाने लगे. उधम को इसकी खबर हुई तो वह पंजाब से गायब होकर कश्मीर पहुंच गए. तभी उन्हें खबर मिली कि ‘ड्वायर’ (Link In English) लदंन में था. चूंकि, उधम उसे जलियांवाला कांड का जिम्मेदार मानते थे, इसलिए उन्होंने तय किया कि वह लंदन जाकर उसका काम तमाम करेंगे.

उधम ने इसके लिए पूरी योजना बनाई और जल्द ही लंदन जा पहुंचे. अपनी योजना के तहत वह लंदन में गुप्त रुप से सक्रिय हो गये. पहले उन्होंने सभी जरुरी जानकारियों को जुटाया, फिर एक बंदूक का इंतजाम किया. अब उन्हें बस एक सही मौका चाहिए था, अपने शिकार को ठिकाने लगाने के लिए.

अचानक उन्हें जानकारी हुई कि ‘ड्वायर’ एक समारोह में भाग लेने के लिए कैक्सटन हाल पहुंचने वाला था. वह इस मौके को हाथ से निकलने नहीं देना चाहते थे, इसलिए वह पहले से ही कैक्सटन हाल में जाकर आम लोगों के साथ बैठ गये. कुछ ही देर में पूरा हॉल लोगों से खचाखच भर गया. उधम बेसब्री से ‘ड्वायर’ के आने का इंतजार कर रहे थे. इसी बीच ईस्ट इंडिया एसोसिएशन और रॉयल सेंट्रल एशियन सोसायटी की बैठक शुरु हुई. बाकी अधिकारियों के साथ ‘ड्वायर’ भी इस बैठक में मौजूद था.

बैठक के बाद जैसे ही ‘ड्वायर’ सभी को संबोधित करने के लिए मंच पर आया उधम ने उनपर बंदूक तानकर ताबड़तोड़ गोलियां बरसानी शुरु कर दी. उधम अपनी मोटी किताब के बीच में बंदूक लेकर आए थे. कुछ ही पलों में ‘ड्वायर’ जमीन पर गिर गया. (Link in English) वह मर चुका था.

गजब की बात तो यह थी कि इस घटना को अंजाम देने के बाद उधम ने भागने की कोशिश नहीं की. उनके चेहरे पर मुस्कान थी और आंखों में सुकून. अंग्रेज अफसरों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और जेल भेज दिया.

Weapon Used by Udham Singh (Pic: bestofinsta.org)

उधम सिंह के आखिरी शब्द…

बाद में उधम सिंह पर ‘ड्वायर’ की हत्या का मुकदमा चलाया गया. उनको फांसी की सजा सुनाने से पहले जज ने उनसे कहा, तुम कुछ कहना चाहोगे तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, मुझे कुछ नहीं कहना. मुझे जो करना था मैंने कर दिया. मुझे बिल्कुल अफसोस नहीं है. ‘ड्वायर’ मौत के ही लायक था. इसके कारण ही मेरे देश के लोगों की जान गई. वह असली अपराधी था, इसलिए मैंने उसे खत्म कर दिया. मुझे खुशी है कि मैंने यह काम किया.

मुझे मृत्यु का डर नहीं है मैं अपने देश के लिए मर रहा हूं…

Untold Story of Udham Singh, Death (Pic: timesofindia)

अंतत: 31 जुलाई 1940 में हंसते-हंसते देश के इस क्रांतिकारी ने फांसी को गले लगा लिया. महावीर उधम की शहादत को शत-शत नमन.

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