23 मार्च 1931 को अंग्रेजों द्वारा एक झूठी सुनवाई के बाद भगत सिंह, शिव राम राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटका दिया गया.

आसमान ने भी भारत के वीर सपूत भगत सिंह के स्वागत की तैयारी कर ली थी, जब उन्होंने कहा था कि ‘इंकलाबियों को मरना ही होता है’. उस दिन बहुत जोर की आंधी आई थी.

हिन्दोस्तान (भारत-पाकिस्तान) का ऐसा कोई घर नहीं था, जो उनकी शहादत पर फूट-फूट कर न रोया हो. जेल का वॉर्डेन चरत सिंह भी जी-भर के उस दिन रोया था. उसने अपने 30 साल के कार्यकाल में भगत सिंह जैसा क्रांतिकारी नहीं देखा था.

सभी की आंखें नम थीं और दिल में अंग्रेज सरकार के खिलाफ गुस्सा, क्योंकि भगत सिंह को गलत तरीके से फांसी दी गई थी, लेकिन भगत सिंह को फांसी से बचाने के क्या प्रयास किए गए..?

ये जानना दिचस्प रहेगा…

एक बड़ा धड़ा आज भी एम. के. गांधी को भगत सिंह की हत्या का जिम्मेदार मानता है, लेकिन गांधी जी ने फांसी के बाद इस बारे में क्या सफाई पेश की, आइए जानते हैं –

न्याय का मजाक बना कोर्ट ट्रायल

सड़कें सुबह से ही ठप थीं, बड़े-बूढ़े अपने बच्चों के साथ जेल के बाहर जमा थे, भीड़ बढ़ती जा रही थी, और अंग्रेजों के मन में एक डर बना हुआ था कि कहीं जेल के बाहर इकट्ठा भीड़ उन पर हमला न कर दे.. और शायद इसीलिए भगत सिंह को तय समय से 12 घंटे पहले ही फांसी पर लटका दिया गया.

फांसी की निंदा करते हुए मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था कि ये ‘न्याय का मजाक उड़ाया गया है.’

उधर, सरदार भगत सिंह ने जेल में रहते हुए राजनीतिक कैदी के तौर पर मिलने वाली सभी सुविधाओं को बंद कर देने पर भूख हड़ताल शुरू कर दी थी, ऐसे में वह सांडर्स हत्याकांड पर ट्रायल के लिए कोर्ट आने की स्थिति में नहीं थे.

इसका फायदा उठाते हुए जब ब्रिटिश सरकार द्वारा शिमला में सैंट्रल असेंबली सत्र के दौरान एक संशोधित बिल पेश किया गया तो उसका भी मोहम्मद अली जिन्ना ने जोरदार विरोध किया, उनका कहना था कि ट्रायल केवल एक स्वांग है. इसलिए अगर यह संशोधन हुआ तो “कोर्ट ट्रायल न्याय के लिए मात्र मजाक” बनकर रह जाएगा.

Mahomed Ali Jinnah. (Pic: tns.thenews)

मौत के जिम्मेदार…?

खैर, जिन्ना ने भगत सिंह को बचाने का क्या प्रयास किया.. इस बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन भारत के एक बड़े युवा क्रांतिकारी वर्ग को अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी से बड़ी उम्मीद थी.

शायद यही कारण रहा कि महात्मा गांधी को भी सरदार भगत सिंह की फांसी के लिए उतना ही दोषी माना गया, जितना कि ब्रिटिश सरकार इस मामले में थी. यहां तक कि कई इतिहासकारों ने  भगत सिंह की फांसी के लिए महात्मा गांधी को जिम्मेदार ठहराया था. हालांकि, महात्मा गांधी ने इस बात पर हर बार खुलकर अपना पक्ष रखा.

भगत सिंह की शहादत के बाद एक बड़ी संख्या में युवा गांधी के विरोध में था. गांधी जी को काले कपड़ों की एक माला विरोध स्वरूप दी गई, लेकिन विनम्र और अहिंसा के पुजारी गांधी ने उसे स्वीकार कर लिया.

फांसी दिए जाने के अगले दिन कराची पहुंचे गांधी ने एक संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि मैं भगत सिंह और उनके साथियों की मौत की सजा में बदलाव नहीं करा पाया, इसलिए युवा मेरे खिलाफ हैं.

Bhagat Singh Inspired People to Join freedom Movement. (Pic: The Wire)

सेवा की दुहाई

इसके बाद गांधी जी ने कराची अधिवेशन में कहा कि ये शक गलत है कि मैंने भगत सिंह को बचाने का प्रयास नहीं किया. मैंने अपनी पूरी शक्ति से वायसराय को समझाने का प्रयास किया. यहां तक कि महात्मा गांधी ने खुद कहा कि मैंने भगत सिंह की फांसी वाले दिन सुबह वायसराय को एक पत्र लिखा और उसमें मैंने अपनी सारी आत्मा उड़ेल दी.

वहीं अधिवेशन के दौरान कई और कांग्रेसी नेताओं ने अपनी सफाई में कहा कि अंग्रेज उनकी फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलने पर राजी भी हो गए थे, लेकिन एेन मौके पर फैसला वापस लेना पड़ा.

उन्होंने युवाओं खासकर नौजवान भारत सभा के सदस्यों को किसानों-मजदूरों की सेवा करने की दुहाई दी और ये आश्वासन दिलाने की कोशिश की कि उन्होंने किसानों-मजदूरों के सुख दुख में भाग लिया है.

Gandhiji was Accorded TIME Person of the Year in 1930. (Pic: myeducorner)

गांधी, भगत सिंह नहीं थे!

यहां एक युवा वर्ग ने ये तक कहा कि गांधी-इरविन समझौते में भी भगत सिंह की आजादी की शर्त डाली जा सकती थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इस पर महात्मा गांधी ने कहा कि “ऐसा नहीं हो सकता था.”

भगत सिंह को फांसी दिए जाने से 18 दिन पहले ही 5 मार्च 1931 को महात्मा गांधी और भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड इरविन के बीच एक राजनीतिक संधि (जो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हित में थी) हुई थी, जिसे गांधी-इरविन पैक्ट या समझौता कहा गया.

भगत सिंह ने कांग्रेस के बारे में कहा भी था कि कांग्रेस का आंदोलन एक दिन समझौते में तब्दील हो जाएगा. उनका मानना था कि कांग्रेस 16 आने में से केवल एक आने के लिए ही लड़ रही है और उसे वह भी हासिल नहीं होगा.

हालांकि, गांधी जी ने भगत सिंह की शहीदी के बाद अंग्रेज सरकार को लताड़ा भी. उन्होंने कहा कि अंग्रेज भगत सिंह की फांसी को कुछ समय के लिए स्थगित कर देते.

Mahatma Gandhi at Birla House. (Pic: Hindustan Times)

अहिंसा से आजादी तक

महात्मा गांधी अपने आपको खासकर आजादी की लड़ाई लड़ने वालों में से अलग रखना चाहते थे. उन्होंने भगत सिंह की फांसी का हवाला देते हुए युवाओं को चेतावनी भी दी कि वे भगत सिंह का रास्ता अख्तियार न करें.

उनका कहीं न कहीं मानना था कि मेरा रास्ता उनसे कहीं ज्यादा बेहतर है. यहां तक कि जब कानपुर में दंगे भड़क उठे तो गांधी जी ने अखबार के हवाले से कहा कि “भगत सिंह की शहादत से कानपुर के हिन्दू पागल हो गए.”

जाहिर तौर पर गांधी जी और भगत सिंह की विचारधार में बहुत बड़ा अंतर था, जहां गांधी उस समय ताकतवर रसूख रखने वाली कांग्रेस के बड़े नेता थे, जो कहीं न कहीं पूंजीपतियों के आधार स्तंभ पर खड़ी थी.

वहीं भगत सिंह का आधार समाजवादी और क्रातिकारी युवाओं का समूह था.

फिर भी महात्मा गांधी उस समय कांग्रेस के एक बड़े दिग्गज और हिन्दोस्तान के सबसे लोकप्रिय नेता थे, यही कारण था कि युवाओं को उम्मीद थी कि गांधी ही हैं, जो भगत सिंह की रिहाई करा सकते हैं.

गांधी जी ने साफ-साफ लफ्जों में कहा कि देश की स्वतंत्रता हिंसा और हत्या से प्राप्त न होगी, इसका साफ अर्थ यह था कि अहिंसा ही स्वतंत्रता का सर्वोत्तम उपाय बचा था.

किन्तु, ये सत्य है कि भगत सिंह की फांसी के 16 साल बाद ही भारत को आजादी मिल गई, और ये भी सत्य है कि आजादी के बदले में हुए हिन्दोस्तान के हिंसक बंटवारे के समय 83 हजार महिलाओं और बच्चियों का बलात्कार किया गया.

वहीं लगभग एक मिलियन या कहें कि दस लाख लोगों का नरसंहार किया गया. ये गांधी जी के अहिंसा से आजादी मिलने की धारणा के बिल्कुल विपरीत था.

Bhagat Singh and MK Gandhi. (Pic: linkedin)

‘खुश रहो अहले वतन, हम तो सफर करते हैं.’

ये आखिरी पंक्तियां भगत सिंह ने अपने भाई के लिए लिखी थीं.

Web Title: What Mahatma Gandhi did to Save Bhagat Singh Life, Hindi Article

Featured Image Credit: wikipedia/culturalindia/boomsbeat