भारत की आज़ादी में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ का महत्वपूर्ण  योगदान रहा, जो आज़ादी के सिपाहियों द्वारा लड़ा गया आखिरी आंदोलन साबित हुआ था. इस ‘अगस्त आन्दोलन’ (भारत छोड़ो आंदोलन) ने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिलाकर रख दी थी, जिसके बाद अंग्रेजों को मजबूरन भारत को गुलामी की जंजीरों से आज़ाद करना पड़ा.

हालांकि इस आन्दोलन में कई महान क्रांतिकारियों ने अपना योगदान दिया, लेकिन बहुत कम लोग इस बात से वाक़िफ़ होंगे कि आख़िर इस क्रांतिकारी नारे को किस स्वतंत्रता सेनानी ने दिया था.

वो कोई और नहीं बल्कि एक बड़े बिजनेस मैन का बेटा और मजदूर व किसानों का राजनेता 'युसूफ मेहर अली' थे.

युसूफ मेहर अली ने ‘भारत छोड़ो’ के नारे के साथ ही ‘साइमन गो बैक’ का भी नारा दिया था. यही नहीं इन्होने मजदूर व किसानों के संगठनों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई थी.

युसूफ मेहर अली एक ऐसे महान स्वतंत्रता सेनानी हुए, जिन्होंने अपनी पूरी ज़िन्दगी अंग्रेजों के विरुद्ध खुलकर जिया और भारत को आजाद कराने के बाद ही इस ज़िन्दगी से रुखसत हो गए, जिसके लिए इन्हें कई बार जेल की हवा भी खानी पड़ी.

बहरहाल, ऐसे में हमारे लिए इस शख्स के बारे में जानना दिलचस्प रहेगा, तो आइये रूबरू होते हैं आज़ादी के सिपाही युसूफ मेहर अली की ज़िन्दगी से….

खानदानी रहे मगर...

युसूफ मेहर अली का जन्म 3 सितम्बर 1903 में हुआ. इनके पिता मुंबई के बड़े व्यापारी थे. दरअसल इनके दादा ने मुंबई में एक कपड़ा मील की स्थापना की थी, जो शायद मुंबई की पहली कपड़ा मील थी. इसके बाद ही इनका परिवार दिन दूना रात चौगुना तरक्की करता चला गया.

खैर, युसूफ का पूरा नाम युसूफ जफ़र मेहर अली था. ये बचपन से देखते आये राष्ट्रवादी आंदोलनों से काफी प्रभावित हो चुके थे. इन्होंने हाईस्कूल की पढ़ाई के दौरान ही, कई आंदोलनों में युवा क्रांतिकारियों से जुड़े दस्तावेज़ों को पढ़ने लगे थे. फिर इन्होंने भारदा कॉलेज मुंबई से हाईस्कूल की पढ़ाई पूरी की और स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े.

ऐसे में दिलचस्प यह हो जाता है कि एक अमीर घराने का यह लड़का किस तरह आज़ादी की लड़ाई में कूद पड़ता है और इसी के साथ ही अमीर होने के बावजूद गरीब मजदूरों और किसानों का भी दुःख हरने का बेड़ा उठाता हैं.

Yusuf Mehar Ali (Representative Pic: midday)

‘साइमन गो बैक’ नारे की गूँज से सहम गए ब्रिटिश! 

आंदोलनों में हिस्सा लेने के दौरान भी इन्होंने अपनी पढ़ाई नहीं छोड़ी थी. आगे युसूफ़ एलफिंस्टन कॉलेज से इतिहास और अर्थशास्त्र में बीए की डिग्री हासिल की. इसके बाद ये सरकारी कॉलेज से कानून की पढ़ाई करने लगे.

इसी बीच 1928 में जब ब्रिटिशों का सात सदस्यीय समूह ‘साइमन आयोग' मुंबई पंहुचा. वैसे यह साइमन आयोग कुछ संवैधानिक सुधारों के लिए भारत आया था, लेकिन इस आयोग में ब्रिटिशों के अलावा कोई भारतीय शामिल नहीं किया गया था.

ब्रिटिशों के इस अनुचित और अपमानजनक निर्णय से आयोग के खिलाफ भारतीयों में गुस्सा टूट पड़ा. उसी साल युसूफ ने 'बॉम्बे यूथ लीग' का गठन किया और इसके बाद 'साइमन कमीशन' के खिलाफ मुहिम छेड़ दी. इसके बाद बॉम्बे बंदरगाह पर युवाओं को कुली के रूप में पहुँचने की योजना बनाई, हालांकि इनकी योजना लीक हो गई थी, मगर यह निडर क्रांतिकारी जरा भी भयभीत नहीं हुआ और अपने संगठन के युवाओं के साथ बंदरगाह पर पहुँच गया.

फिर वहां पर इन्होंने साइमन आयोग के सदस्यों का विरोध काला झंडा और ‘साइमन गो बैक’ के नारे से की. ऐसे में इन पर लाठियाँ चार्ज भी की गई, लेकिन युसूफ़ और उनके युवा क्रांतिकारियों की गूंज इतनी बुलंद हुई की. रातों रात ही प्रदर्शन की खबरें आग की तरह फ़ैल गई, जिसके बाद महात्मा गाँधी के साथ ही हर किसी के ज़बानों पर ‘साइमन गो बैक’ की सदा गूँजने लगी.

शहर भर में अंग्रेजों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया था, लोग हड़ताल पर बैठ गए थे. इसके बाद तो ‘साइमन गो बैक’ नारे के साथ ही युसूफ मेहर अली का भी नाम मशहूर हो गया.

इनकी लोकप्रियता और निडरता से अंग्रेजों को एक डर सताने लगा. जिसके फलस्वरूप अंग्रेजों ने इन्हें क़ानून की प्रेक्टिस करने पर रोक लगा दी, हालांकि इस दौरान कई राष्ट्रवादी नेता वकालत कर रहे थे, मगर अग्रेजों के द्वारा की गई इस करवाई को कोई भी नहीं रोक पाया.

खैर, इसके बावजूद युसूफ़ का जोश व ख़रोश और भी बढ़ने लगा था.

'Simon Go Back' Movment (Pic: vivacepanorama)

कई आंदोलनों में लिया हिस्सा और...

‘साइमन गो बैक’ के बाद तो इनके संगठनों से युवा बड़ी संख्या में जुड़ने लगे थे और युसूफ लगातार ब्रिटिशों की मुखालिफत करते रहे.

आगे जब ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ शरू किया गया, तब युसूफ के युवा स्वयंसेवकों ने जनता का मनोबल बनाये रखने के लिए अथक प्रयास किया.

इसके बाद 'नमक आंदोलन' (दांडी सत्याग्रह) शुरू हुआ, जिसमें युसूफ़ बड़ी जोश ख़रोश के साथ कूद पड़े. इस आन्दोलन में कई कांग्रेस नेताओं को जेल हो चुकी थी, लेकिन युसूफ़ ने लगातार तब तक इस आंदोलन को जारी रखा, जब तक की वह जेल नहीं चले गए. फिर 1930 में इनको गिरफ्तार किया गया और 4 माह की कठोर कारावास की सजा सुनाई गई.  

हालांकि इसके बाद 1932 में इनको दोबारा जेल हुई, इस बार इन पर ब्रिटिश सम्राज्य के खिलाफ साजिश रचने के जुर्म में सजा हुई थी. इस दौरान इनको कई क्रांतिकारी नेताओं से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ और उनसे कई अहम मुद्दों पर बात चीत भी हुई.

जेल से रिहा होने के बाद इन्होंने जयप्रकाश नारायण, अशोक मेहता, नरेंद्र देव और मसानी जैसे लोगों से संपर्क साधा और कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी में जा मिले. इसके बाद संगठन को एकजुट किया और किसान सहकारी समितियों और ट्रेड यूनियन को मजबूत बनाने का प्रयास करने लगे.

आगे, 1938 में विश्व सांस्कृतिक सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि मंडल का नेतृत्व किया और यहां इनको पश्चिमी की तुलना में भारतीय मुद्दों पर साहित्य की कमी महसूस हुई.जिसके बाद इन्होंने इस अंतर को भरने के लिए ‘लीडर ऑफ़ इंडिया’ नामक किताब की रचना कर डाली.

Dandi March (Representative Pic: thehindu)

8 बार गए जेल, बावजूद इसके बने मेयर

अगले कुछ सालों तक ब्रिटिशों के खिलाफ जंग जारी रखी और ‘सत्यग्रह’ आन्दोलन में बड़ी भूमिका निभाई.  इन आंदोलनों के लिए इनको कई बार जेल की हवा खानी पड़ी.

कहते है, इनको कुल 8 बार जेल जाना पड़ा था, फिर भी इन्होंने हिम्मत नहीं हारी और लगातार कुछ कर दिखाने में लगे रहे.

1942 में जब ये लाहौर की जेल में थे तब इनको 'आईएनसी' ने बॉम्बे मेयर चुनाव के लिए मनोनीत किया. चुनाव में भाग लेने के लिए युसूफ को रिहा किया गया और इन्होंने बड़ी आसानी से बॉम्बे नगरपालिका का चुनाव जीत लिया.

मेयर के पद पर युसूफ ने कई बड़े काम किये और लगातार मजदूर, व्यापारियों को मजबूत करने और नगरपालिका की समुचित वयवस्था करने की कोशिशों में लगे रहे.

‘भारत छोड़ो’ का दिया नारा और...

1942 में कांग्रेस की कुछ मांगों को नज़रंदाज़ किया गया, जिसमें भारत की पूरी आज़ादी की मांग शामिल थी. इसके तुरंत बाद बॉम्बे में गाँधी जी के नेतृत्व में एक बैठक बुलाई गई, जिसमें आंदोलन करने और उसके नारे के बारे में राय मशविरा लिया गया.

गांधी जी के सामने कई अन्य नेताओं के स्लोगन पेश किये गए, जो उन्हें पसंद नहीं आया, लेकिन युसूफ मेहर अली ने तभी इस आन्दोलन को ‘क्विट इंडिया’ (भारत छोड़ो) का नाम दिया. इस भारत छोड़ो नारे को गाँधी जी ने मंज़ूरी दे दी. इसके बाद अंग्रेजों के विरुद्ध ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ शुरू हो गया.

इसी बीच मेहर अली ने राष्ट्रव्यापी आन्दोलन का रूप देने के लिए ‘क्विट इंडिया’ नामक पुस्तिका भी प्रकाशित कर डाली, जो आंदोलन के नारे को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इसकी कई प्रतियाँ हाथों हाथ बिक गई थी.

आगे इस भारत छोड़ो आन्दोलन में कई समाजवादियों को जोड़ा और इसका अच्छे तरीके से निर्वहन भी किया. इसके बाद बाकी क्रांतिकारियों की तरह इन्हें भी फिर से जेल जाना पड़ा, इसी दौरान इन्हें दिल का दौरा पड़ा, हालांकि जेल कर्मचारियों ने इनके बेहतर उपचार के लिए सेंट जार्ज अस्पताल ले जाने की पेशकश की, लेकिन इन्होंने अन्य बीमार स्वतंत्रता सेनानियों के लिए भी इस सुविधा की मांग कर डाली.

परन्तु ब्रिटिशों ने इससे इंकार कर दिया ऐसे में इन्होंने भी उपचार न कराने का फैसला किया, लेकिन इसी आंदोलन के बाद ही अंग्रेजों पर गहरा दबाव पड़ा था. फिर 1943 में इनको जेल से रिहा कर दिया गया.

Quit India Movment (Pic: thehindu)

जब थम गई बम्बई!

जेल से छूटने के बाद भी बीमार होने के बावजूद इन्होंने लगातार स्वतंत्रता संग्राम में अपना योगदान दिया.

वैसे खुदा भी इनकी कुर्बानियों पर मेहरबान रहा और इनको अपनी आँखों से देश की आज़ादी देखना नसीब हुआ, परन्तु आज़ादी का यह सिपाही दिन ब दिन बिमारियों में जकड़ता चला गया और हुंकार भरने वाला यह सेनानी बिस्तर पकड़ने पर मजबूर हो गया.

खैर, इस दौरान इन्होंने 1949 को अपनी चित्रों की एक प्रदर्शनी आयोजित की, जिसमें इन्होने अपने चित्र कलाओं से स्वतंत्रता संग्राम की झलकियों से रूबरू करवाया था. इसी के साथ ही इन्होने कई और भी पुस्तकों की भी रचना की थी मगर धीरे-धीरे युसूफ मेहर अली का अंतिम समय आ चुका था.

आख़िरकार 2 जुलाई 1950 को युसूफ मेहर अली ने 47 साल की ही उम्र में इस दुनिया को अलविदा कह दिया. जैसे ही यह खबर लोगों तक पहुंची इसका उन्हें बहुत दुःख हुआ. मुम्बई में गम का बादल छा गया, लोगों ने अपना प्यारा नेता जो खोया था.

मौत के अगले दिन तो मुंबई रुक सी गई. इस दिन बस, ट्रेन के साथ ही लगभग स्कूल, कॉलेज, दुकानें कारखाने और मील सभी बंद पड़े नज़र आये. सिर्फ आधिकारिक तौर पर मुंबई का स्टॉक एक्सचेंज मार्केट ही खुला रहा, लेकिन यहाँ भी व्यापार थप रहा.

फिर युसूफ मेहर अली की अंतिम यात्रा में अधिक भीड़ देखने को मिली और लोगों के आँखों में आंसू  छलक रहे थे. इसके बाद महान क्रांतिकारी को सुपुर्द-ए-खाक कर दिया गया.

खैर, इसी कड़ी में वह शहर जो कभी नहीं रुका था, मगर उस इंसान की याद में थम  सा गया था, जिसने सचमुच शहर के कल्याण और देश के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था.

Yusuf and Mumbai Station (Pic: thebetterindia/printrest)

तो ये थी एक ऐसे महान क्रांतिकारी युसूफ मेहर अली की ज़िन्दगी से जुड़ी कुछ अहम बातें,

अगर आप भी इनसे जुड़ीं कुछ बैटन के बारे में जानते हैं ,तो कृपया कमेन्ट बॉक्स में ज़रूर बताएं.         

Web Title: Both “Quit India” and “Simon Go Back” slogans were coined by Yusuf Mehar Ali, Hindi Article

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