अगर आपसे किसी भारतीय जांबाज महिला जासूस का नाम पूछा जाये तो आप अपनी बगले झांकने लगेंगे. गाहे बगाहे अगर आप किसी का नाम बताते भी हैं, तो उसमें नूर इनायत खान का नाम मुश्किल से आयेगा. शायद कई लोग जानते भी नहीं होंगे कि वह भारतीय मूल की महिला थीं. जी हां, वह भारतीय थीं. उनकी रगों में वीर टीपू सुल्तान का खून था.

अपने पूर्वज टीपू सुल्तान की ही तरह वह जांबाज थीं. हिटलर जैसे तानाशाह ने भी उनका लोहा माना था. तो आईये जानते हैं कि नूर कैसे बनीं दुनिया की सबसे बड़ी जासूस..

नूर के पिता हज़रत इनायत ख़ान टीपू सुल्तान के वंशज थे, पर उन्हें तलवारों से ज्यादा दिलचस्पी संगीत में थी. उनका यही शौक उन्हें अमेरिका खींच लाया था. इसी दौरान उनकी मुलाकात नूर की मां से हुई. बाद में दोनों नजदीक आए और शादी कर ली. नूर इनकी चौथी संतान थी. देश से दूर रहते हुए भी नूर के पिता ने भारतीय संस्कार को बनाए रखने के लिए पेरिस के बाहर अपना घर बनाया था.

घर का रखरखाव और नियम कायदे सब हिन्दुस्तानी थे. उन्होंने बच्चों में देश की मिट्टी के प्रति प्रेम बचाकर रखा था. सब कुछ हंसी-खुशी चल रहा था. इसी बीच नूर के पिता अचानक चल बसे. अब घर की सारी जिम्मेदारी नूर के कंधों पर थी. नूर स्वभाव से संवेदनशील थीं. उनके सामने सवाल था कि वह किस तरह से अपने परिवार का निर्वाह करें. चूंकि संगीत की कला उन्हें पिता से विरासत में मिली थी. इसलिए उन्होंने संगीत को ही जीविका का साधन बना लिया. इसके बावजूद भी जब परिवार की जरुरतें पूरी नहीं हो सकी तो उन्होंने बच्चों के लिए कहानियां लिखकर कमाना शुरु कर दिया था, ताकि घर का खर्च चल सके.

Noor with her Veena (Pic: experience.org)

सब जैसे-तैसे चल रहा था. इसी बीच द्वितीय विश्व युद्ध का बिगुल बज गया. चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल था. जर्मनी के हमले के बाद लोग पलायन को मजबूर थे. नूर ने भी परिवार के साथ देश छोड़ दिया और ब्रिटेन पहुंच गयीं.

ब्रिटेन पहुंचकर उन्होंने सेना में भर्ती का इश्तेहार देखा और तय किया कि वह सेना का हिस्सा बनेंगी. शुरुआत में उनके आवेदन को ठुकरा दिया गया, क्योंकि वह वहां की मूल निवासी नहीं थीं. पर बाद में उनके स्पष्टीकरण के बाद सेना का जवाब आया और साथ में ट्रेंनिग के लिए खत भी.

इस तरह अब  नूर ब्रितानी सेना का हिस्सा बन चुकी थीं. शुरुआत में उन्हें एक वायरलेस ऑपरेटर के तौर पर ट्रेन किया गया. बाद में वह देखते ही देखते ब्रितानी सेना की एक सीक्रेट एजेंट बन गईं. जल्द वह दिन भी आ गया, जिसका नूर को लम्बे समय से इंतजार था. उन्हें नाजी सेना के खिलाफ जासूस बनाकर फ्रांस भेज दिया गया. उन्होंने पेरिस में तीन महीने से ज़्यादा वक़्त तक सफलतापूर्वक अपना ख़ुफिया नेटवर्क चलाया और नाज़ियों की जानकारी ब्रिटेन तक पहुंचाई. इस मिशन के दौरान उनके कई साथी नाजियों द्वारा पकड़े गये, पर वह किसी के हाथ नहीं लगी थीं.

उन्होंने जर्मन पुलिस की नाक के नीचे अपना ऑपरेशन जारी रखा. वह बड़ी सफलता के बहुत करीब थीं, पर उनके किसी सहयोगी की बहन ने जर्मनों के सामने उनका राज खोल दिया था. इस कारण जर्मन पुलिस उन तक आसानी से पहुंच गई. पुलिस ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया था. उनके पास सरेंडर करने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नहीं था, पर नूर ने ऐसा नहीं किया. वह शेरनी की तरह जर्मनी पुलिस के लोगों पर टूट पड़ी. उन्होंने हाथापाई शुरू कर दी. तकरीबन घंटे भर की मशक्कत के बाद अंतत: उन्ह पर काबू पा लिया गया और फिर उन्हें जेल में डाल दिया गया. उनको एक ख़तरनाक क़ैदी की तरह जेल में रखा गया.

जेल के अंदर उनको हर तरह से प्रताड़ित किया गया, ताकि वह ब्रितानी ऑपरेशन के बारे में सब बता दें. लेकिन उनके हौसले को हिटलर के सैनिक नहीं तोड़ पाये. उन्होंने मार खाई, भूखी रहीं, लेकिन अपनी फ़ौज से गद्दारी नहीं की. उन्होंने दो बार जेल से भागने की कोशिश की, लेकिन विफल रहीं.

Scenes from the Program. Noor Inayat Khan (Pic: pbs.org)

नाजी नूर का असली नाम तक नहीं पता कर पाए थे. कैदी के रूप में एक साल गुजारने के बाद उन्हें दक्षिणी जर्मनी के एक यातना शिविर में भेज दिया गया. वहां उन्हें नए सिरे से प्रताड़ित किया गया. उन्हें दस महीने तक घोर यातनायें दी गईं, फिर भी उन्होंने किसी भी प्रकार की सूचना देने से मना कर दिया.

अन्त में हिटलर के सिपाही जब हार गये, तो उन्होंने मौत का फरमान सुना दिया गया. मौत के आखिरी समय नाजी नूर को डराकर पूछते रहे कि वह कौन सी सूचनाएं इकट्ठा करने के लिए ब्रिटेन से आई थीं, लेकिन उनके गले से एक भी शब्द नहीं निकला. नाजी परेशान हो चुके थे. इसलिए गुस्से में आकर एक दिन जर्मन पुलिस ने उनकी गोली मारकर हत्या कर दी. इस तरह से टीपू की यह बहादुर वंशज कुर्बान हो गई.

हिटलर जैसे तानाशाह के सामने इस तरह खड़े होने का साहस किसी भारतीय का ही हो सकता था. श्राबणी बसु ने नूर की जिंदगी पर एक किताब भी लिखी है, जिसका नाम ‘द स्पाई प्रिसेंज: द लाइफ़ ऑफ़ नूर इनायत ख़ान’ है. इसमें नूर के जांबाजी के ऐसे कई किस्से लिखे हुए हैं.

Inspirational Story of Noor Inayat Khan (Pic: 2ndww )

नूर के बलिदान की अहमियत को इसी बात से समझा जा सकता है कि ब्रिटेन की डाक सेवा ने उनके डाक टिकट जारी किए. उनकी याद में लंदन में एक स्मारक तैयार किया जा रहा है. ब्रिटेन में यह किसी भारतीय महिला की स्मृति में बनने वाला पहला स्मारक है.

Web Title: Inspirational Story of Noor Inayat Khan, Hindi Article

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