1999 के कारगिल युद्ध में देश की रक्षा के लिए कई सारे नायकों ने हंसते-हंसते मौत को गले लगा लिया. किसी भी परिस्थिति में उन्होंने अपना हौंसला नहीं खोया. दुश्मन के हर वार का उन्होंने मुंहतोड़ जवाब दिया.

कैप्टन सौरभ कालिया ऐसे ही एक नायक हैं. उनके बारे में कहा जाता है कि वह एक ऐसे हीरो थे, जिन्होंने अपने महज चंद साथियों के साथ दुश्मन की बड़ी संख्या के सामने अपनी बंदूक तान दी थी. तो आईये देश के इस विरले अमर सपूत को जानते की कोशिश करते हैं:

बचपन से थे आंखों में बड़े सपने

29 जून 1976 को अमृतसर के डॉ. एन.के. कालिया के घर एक बच्चे ने जन्म लिया. नाम रखा गया सौरभ कालिया. थोड़े बड़े हुए तो डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल पालमपुर के दरवाजे उनके लिए खुल गये. वह एक कुशाग्र बालक थे, इसलिए शिक्षक उन्हें बहुत पसंद करते थे. सौरभ के पिता बताते हैं (Link in English) कि एक दिन सौरभ अपने घर की छत पर अकेले खड़े बगीचे में लगे पेड़ों को देख रहे थे. नाश्ते का समय था, इसलिए उन्होंंने आवाज लगाई कि सौरभ नाश्ता कर लो. चूकि, सौरभ सोच में खोए हुए थे, इसलिए उन्हें पिता की आवाज सुनाई नहीं दी.

यह देखकर, उनके पिता खुद उनके पास चले गए. उन्होंने सौरभ के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘कहां खोए हो बेटा?’

सौरभ ने अपने पिता को देखा और मुस्कुराए, उन्होंने जवाब दिया, पिताजी हमारे बगीचे में ढ़ेर सारे पेड़ लगे हुए हैं, लेकिन इन सबमें केवल एक ही सबसे लंबा है. जबकि, इन सभी को एक ही सूरज की रोशनी मिलती है. एक ही मिट्टी में यह खड़े होते हैं. मैं सोच रहा था हम इंसान भी इनके जैसे ही होते हैं. हम सबको भी सब समान मात्रा में मिलता है. बावजूद इसके हमसे से कुछ आगे निकल जाते हैं और कुछ वहीं खड़े रहते हैं.

पिता ने उस वक्त साहस से लबरेज सौरभ की हां में हां जरुर मिलाई थी, लेकिन शायद उनको अंदाजा नहीं था कि सौरभ की नन्हीं आंखों में कितने बड़े सपने आकार ले रहे थे. बाद में सौरभ ने 1997 में पालमपुर एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएट पूरी की.

Story of Capt Saurabh Kalia (Pic: elitepredators)

पासिंग परेड में जाहिर किए थे इरादे

अभी तक किसी को नहीं पता था कि सौरभ का भविष्य क्या होगा! तभी इसी साल उन्होंने संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा में चयनित होकर अपने पिता का सीना चौड़ा कर दिया. वह हंसते हुए पिता का आशीर्वाद लेकर अपनी ट्रेनिंग के लिए गये. ट्रेनिंग शिविर में भी उन्होंने अपने स्कूल और कॉलेज की तरह सभी का दिल जीता.

12 दिसंबर 1998 पासिग परेड के दौरान जब सभी लोग मंच पर अपनी-अपनी बात रख रहे थे. सौरभ के बोलने का नंबर आया, तो पहले वह कुछ देर शांत रहे. फिर उन्होंने कहा, आज मुझे इस बात पर गर्व है कि मैं 4 जाट रेजिमेंट में शामिल हो गया हूं, लेकिन एक दिन आएगा जब यह यूनिट मुझ पर गर्व करेगी’.

फिर उन्हें भारतीय थलसेना में कमीशन अधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया था. उनकी पहली पोस्टिंग 4 जाट रेजिमेंट के साथ कारगिल सेक्टर में हुई थी. वहां उन्होंने अपनी छोटी सी उम्र में अदम्य साहस व वीरता का परिचय देकर दुश्मन को कारगिल युद्ध के शुरु होने से पहले भारत की ताकत का एहसास करा दिया था.

नौकरी को कुछ ही महीने हुए थे और…

सौरभ की नौकरी को कुछ ही महीने हुए थे. वह कारगिल में अपने साथियों के साथ अपनी पोस्ट पर मुस्तैद थे. इसी बीच 15 मई 1 999 (Link in English) को उन्हें एक इनपुट मिला. इसके तहत उन्हें जानकारी दी गई कि दुश्मन सेना के लोग भारतीय सीमाओं की ओर बढ़ रहे थे. यह इनपुट बहुत महत्वपूर्ण था. दुश्मन सेना के सैनिक किसी बड़ी घटना को अंजाम दे सकते थे. सौरभ ने इसको गंभीरता से लेते हुए अपनी तफ्तीश शुरु कर दी. वह अपने पांच अन्य सैनिकों अर्जुन राम, भंवरलाल बागारीया, भिका राम, मूल राम और नरेश सिंह के साथ पेट्रोलिंग पर निकल गये. उन्हें इस बात की फिक्र नहीं थी कि दुश्मन कितनी संख्या में है. उन्हें तो बस अपने देश की चिंता सताये जा रही थी.

तेजी से उन तक पहुंचने के लिए सौरभ अपने साथियों के साथ आगे बढ़े. वह जल्द ही वहां पहुंच गये जहां दुश्मन के होने की खबर थी. पहले तो सौरभ को लगा कि उन्हें मिला इनपुट गलत हो सकता है, लेकिन दुश्मन की हलचल ने अपने होने पर मुहर लगा दी. वह तेजी से दुश्मन की ओर बढ़े. तभी दुश्मन ने उन पर हमला कर दिया. दुश्मन संख्या में बहुत ज्यादा था.

दुश्मन तकरीबन 200 की संख्या में था. सौरभ ने स्थिति को समझते हुए तुरंत अपनी पोजीशन ले ली. दुश्मन सैनिकों के पास भारी मात्रा में हथियार थे. वह ए.के 47, ग्रेनेड जैसे विस्फोटक थे. इधर सौरभ और उनके साथियों के पास ज्यादा हथियार नहीं थे. इस लिहाज से वह दुश्मन की तुलना में बहुत कमजोर थे, पर उनका ज़ज्बा दुश्मन के सारे हथियारों पर भारी था.

Saurabh Kalia After Passing Out Parade (Pic: unp.me)

वह कभी पकड़े नहीं जाते, मगर…

सौरभ ने सबसे पहले दुश्मन की सूचना अपने आला अधिकारियों को दी. फिर उन्होंने अपनी टीम के साथ तय किया कि वह आंखिरी सांस तक दुश्मन का सामना करेंगे और उन्हें एक इंच भी आगे बढ़ने नहीं देंगे.

फिर तो सौरभ अपने साथियों के साथ दुश्मन की राह का कांटा बन कर खड़े रहे. उनकी रणनीतियों के सामने दुश्मन की बड़ी संख्या भी पानी मांगने लगी थी. हालांकि, दोनों तरफ की गोलाबारी में सौरभ और उनके साथी बुरी तरह ज़ख़्मी जरूर हो गये थे, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. वह मोर्चे पर वीरता के साथ डटे हुए थे.

दुश्मन बौखला चुका था, इसलिए उसने पीठ पर वार करने की योजना बनाई. इसमें वह सफल रहा. उसने चारों तरफ से सौरभ को उसकी टीम के साथ घेर लिया था. वह कभी दुश्मन के हाथ नहीं आते, लेकिन उनकी गोलियां और बारुद खत्म हो चुके थे. दुश्मन ने इसका फायदा उठाया और उन्हें बंदी बना लिया.

…यातनाएं भी नहीं तोड़ पाईं हौंसला!

दुश्मन सौरभ और उनके साथियों से भारतीय सेना की खुफिया जानकारी जानना चाहता था, इसलिए उसने लगभग 22 दिनों तक अपनी हिरासत (Link in English) में रखा. उसकी लाख कोशिशों के बावजूद कैप्टन सौरभ ने एक भी जानकारी नहीं दी. इस कारण दुश्मन ने यातनाओं का दौर शुरु कर दिया.

सभी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की धज्जियां उड़ाते हुए सौरभ कालिया के कानों को गर्म लोहे की रॉड से छेदा गया. उनकी आंखें निकाल ली गई. हड्डियां तोड़ दी गईं. यहां तक की उनके निजी अंग भी दुश्मन ने काट दिए थे.

बावजूद इसके वह सौरभ का हौसला नहीं तोड़ पाए थे. आखिरी वक्त तक उन्हें अपना देश याद रहा. उन्होंने सारे दर्द का हंसते-हंसते पी लिया. अंत में जब वह दर्द नहीं झेल सके तो उन्होंने मौत को गले लगा लिया.

कैप्टन कालिया के साथ जो हुआ, उसे सुनकर उनके रौंगटे खड़े हो जाते हैं, आंखों में आंसू आ जाते हैं और समझ आता है कि हमारी आज़ादी आखिर कितनी कीमती है और इसके लिए सैनिकों ने किस तरह का बलिदान दिया है.

इंसाफ की इंतजार में परिवार

सौरभ का परिवार आज भी गहरे सदमें में हैं. अपने 22 साल के बेटे कैप्टन सौरभ कालिया को देश के लिए कुर्बान करने वाले माता-पिता अपने बेटे से हुये इस अमानवीय व्यवहार पर आज भी इंसाफ (Link in English) हासिल करने की आस में अपनी बची हुई जिंदगी काट रहे हैं. सौरभ के परिवार ने भारत सरकार से इस मामले को पाकिस्तान सरकार के सामने और इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में उठाने की मांग की थी. मगर अफसोस आज तक उन्हें इंसाफ नहीं मिल सका.

विडंबना देखिए कि कई सारे ठोस प्रमाण होने के बावजूद इस पर कुछ ठोस न हो सका. ऐसे में सवाल उठता है कि सैनिक की शहादत पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय आखिर चुप्पी क्यों साधे बैठा है? आखिर अमानवीय व्यवहार को किस प्रकार जायज़ ठहराया जा सकता है?

Saurabh Kalia’s Parents (Pic: dailymail)

वैसे तो कैप्टन कालिया जैसे महावीरों का बदला भारतीय सेना ने ले लिया और कारगिल से पाकिस्तानियों को बेइज्जत करके खदेड़ दिया पर किसी सैनिक के साथ इस तरह के दुर्दांत व्यवहार पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को स्वतः संज्ञान लेना चाहिए, इस बात में दो राय नहीं!

Web Title: Story of Capt Saurabh Kalia, Hindi Article

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