यादें वो हसीन पल होती हैं, जिनमें हम अपने बीते कल को फिर से जीने लगते हैं. इन पलों में हम इतना खो जाते हैं कि हमें वर्तमान की तमाम मुश्किलें याद ही नहीं रहती. असल में हम अतीत में जो रहते हैं.

आपकी जिंदगी में भी कुछ ऐसी ही सुनहरी यादें ज़रूर होंगी, जिनको याद कर आपका मन भीतर से आनंदित हो उठता होगा. फिर चाहे वह सुनहरा पल आपके बचपन से जुड़ा हो, या फिर आपके स्कूल और कॉलेज में दोस्तों के साथ की गई मस्ती का ही पल क्यों न हो!

आज हम ऐसी सुनहरी यादों के पिटारे को खोल रहे हैं, जो आपके लिए एकदम अनमोल है–

बचपन की शरारतें

हम हमेशा अपने बचपन की सुनहरी यादों में खोने का मौका तलाशते रहते हैं. ऐसा हो भी क्यों न. यही वह वक्त था, जब आपको किसी भी चीज की कोई टेंशन नहीं थी और हर वक्त मस्ती और खेल में बीत जाता था. यकीनन आपने भी अपने बचपने में अपने दोस्तों, भाई-बहनों के साथ ढेर सारी मस्ती और खूब शरारतें भी की होंगी.

अपने कजिन सिस्टर-ब्रदर्स के साथ पिकनिक मनाना, उनसे किसी ना किसी बात पर लड़ना-झगड़ना और फिर बाद में सॉरी बोल फिर से एकजुट हो जाना हर किसी ने अपने बचपने में जरूर किया होता है.

इन्हीं सबसे लबरेज हर किसी का बचपन उसके लिए किसी खजाने से कम नहीं होता, जो उसे हमेशा अपने पास बुलाता ही रहता है.

Childhood (Pic: highonpoems)

संतरे की सस्ती गोलियां

ये वो टॉफीज होती थीं, जिनका लालच बच्चों को देकर उनके माता-पिता होमवर्क पूरा करने को कहते थे. बिना किसी व्रैपिंग के जार में मिलने वाली इन गोलियों को लाइमलेट की गोली या फिर आम बोलचाल में संतरे की गोली कहा जाता था.

ये काफी सस्ती होती थीं. 1 रुपये में करीब 15-20 गोलियां तो आ ही जाती थीं. बचपन में इन्हें खरीदने के लिए लोग अपने गुल्लक में 25-50 पैसे के सिक्के इक्कठे करते थे. ओरेंज फ्लेवर में आने वाली ये टॉफियां आज भी मिलती हैं, जिन्हें खाकर हर कोई अपने बचपन की सैर पर निकल पड़ता है.

इसके अलावा बचपन में स्कूल के लंच टाइम और छुट्टी के वक्त स्कूल के गेट पर मिलने वाली तमाम खट्टी-मीठी चीजें जैसे इमली, काला खट्टा बर्फ का गोला, चूरन और भी दूसरे फ्लेवर में मिलने वाली कैंडियां भी आपको बचपन की याद दिलाने के लिए काफी हैं.

स्कूल/कॉलेज डेज

बचपन के बाद बारी आती है, स्कूल की. यहां पर हमें पढ़ाई के साथ-साथ अच्छे दोस्त बनाने का मौका मिलता है. कुछ दोस्त तो ऐसे होते हैं, जिनसे हम ताउम्र दोस्ती निभाते हैं. स्कूल की पढाई पूरी करने के बाद जब हम पहली बार कॉलेज के आंगन में पैर रखते हैं, उस वक्त हर न्यूकमर को रैगिंग, वहां के माहौल आदि का डर जरूर सताता है.

बहुत से लोगों ने इस दौरान किसी बोरिंग टीचर के लेक्चर को बंक जरूर किया होता है. इसके साथ ही दोस्तों के साथ पहली फिल्म देखना, रात को पढ़ाई करने का प्लान बनाना और हमेशा अपने ग्रुप के लोगों के साथ हैंगआउट करना जैसी कुछ ऐसी यादें हैं, जिन्हें शायद ही कोई भुला पाए.

पहला-पहला प्यार

स्कूल और कॉलेज के दिनों में हर किसी की लाइफ में वह हसीन लम्हा भी जरूर आता है, जब आप किसी के प्यार में दीवाने हो जाते हैं. यह वह दौर होता है, जब किसी को पहली बार देखते ही दिल कहता है कि यह वही है, जो सिर्फ आपके लिए बना है. आग जब दोनों तरफ लगी हो तो फिर क्या कहना. दोनों एक दूसरे के प्यार में ऐसे मशरूफ हो जाते हैं जैसे वह कोई लैला-मजनू हों!

पहली बार प्यार का इजहार, पहली डेट, पहली किस जैसी बहुत सी चीजें ऐसी होती हैं, जो हमेशा के लिए उनके जहन में घर कर जाती हैं. शायद यही वजह है कि पहले प्यार को भुला पाना आसान नहीं होता.

First Love (Representative Pic: Newscult)

शक्तिमान के लिए दौड़

आजकल टीवी पर ढ़ेरों सुपर हीरोज की कहानियां दिखाई देती हैं, लेकिन जब केबल टीवी की पहुंच आम लोगों तक नहीं थी, तो उस वक्त बच्चे दूरदर्शन पर आने वाले एक ही सीरियल का इंतजार करते थे और वह था शक्तिमान!

शक्तिमान एक ऐसा सुपरहीरो था, जिसे हर बच्चा प्यार करता था. अपनी अद्भुत शक्तियों से लैस शक्तिमान एक ऐसा इंसान था, जिसने सुर्यांशियों की तपस्या और यज्ञ की मदद से अपने अंदर के सातों च्रकों को खोल उन पर कंट्रोल करना सीख लिया होता है. इन्हीं शक्तियों की बदौलत वह मानवता के खूंखार दुश्मनों से लोगों की रक्षा करता था.

उसका वह गोल-गोल घूमना, लाल ड्रेस, खुद की पहचान बचाए रखने के लिए गंगाधर की एक्टिंग-‘देवी जी- देवी जी, शक्तिमान भैय्या हमसे मिलने आए थे’…  हर किसी को आज भी याद है. खासकर शक्तिमान का वह टेढ़ी नाक वाला विलेन किलविश जिसकी नकल बचपन में आपने जरूर की होगी!

गिल्ली डंडा का क्रेज

गिल्ली डंडा एक ऐसा खेल है, जिसे बच्चे आज भी खेलते हैं. अपने देश के हर क्षेत्र में ये खेल खेला जाता है और इसे अलग-अलग नाम से जाना जाता है. ये क्रिकेट की तरह ही होता है, बस इसमें बैट और बॉल की जगह गिल्ली और डंडे का इस्तेमाल किया जाता है. ये काफी वर्षों से इंडिया में खेला जा रहा है और जानकारों का कहना है कि क्रिकेट, बेसबॉल और सॉफ्टबॉल जैसे विदेशी खेलों की बुनियाद गिल्ली डंडे के खेल से ही पड़ी है.

गिल्ली क्रिकेट की बेल्स की तरह ही 3-6 इंच की लकड़ी से बनी होती है, जबकि लकड़ी का डंडा 2-3 फीट लंबा होता है. इस खेल को खेलने के अलग-अलग नियम होते हैं. आमतौर पर इसे 8-12 साल के कम से कम 4 लड़कों के बीच खेला जाता है. क्रिकेट की तरह ही दो टीमें होती हैं और टॉस किया जाता है. इसमें जो जीतता है वह पहले खेलता है.

जमीन पर एक घेरा बनाकर उसके बीच में एक गड्ढ़ा कर दिया जाता है और फिर शुरू होता है गेम. गिल्ली को हिट करने वाले को तीन चांस दिए जाते हैं उसे मारने के. अगर गिल्ली हवा में हो और उसे दूसरी टीम का फील्डर कैच कर ले तो वह आउट हो जाता है. अगर गिल्ली दूर जा गिरती है, तो उसकी दूरी को डंडे से नापकर हिटर का स्कोर बताया जाता है.

Gilli Danda (Pic: indiablah)

ये तो महज कुछ एक उदाहरण भर हैं, जिन्हें आपने अपने बचपन में कभी ना कभी जरूर एक्सपीरियंस किया होगा.

कोई और अनुभव, अपने प्यारे बचपन का… कमेन्ट-बॉक्स में अवश्य शेयर करें.

Web Title: Golden Memories of Life, Hindi Article

Featured Image Credit: Thewealthbuilding