मुद्दा चाहे देश की राजनीति का हो या घर के राशन का… रोकना—टोकना किसी को रास नहींं आता.

हर कोई चाहता है कि जब तक वह अपनी बातों पर सब को राजी न कर लें तब तक उसे बोलते रहने का मौका मिलते रहना चाहिए.

वहीं बाकी लोगों के लिए यह किसी सिर दर्द से कम नहींं होता!

समस्या तब ज्यादा गंभीर हो जाती है जब हम सामने वाले के व्यवहार, प्रकृति और इरादों से अंजान हों.

घर और चौक—चौराहों की बात छोड़कर यदि आॅफिस की मीटिंग की बात करें तो यह समस्या बहुत बड़ी है.

चूंकि आॅफिस मीटिंग में टोके जाने का मतलब है औरों से कमतर आंका जाना. इसलिए मीटिंग में अधिकांश लोग अपनी राय रखने की बजाए चुपचाप बैठे रहते हैं.

जबकि धाराप्रवाह बोले जा रहा व्यक्ति इस बात से अंजान होता है कि वह लोगों के समय और आईडिया दोनों का नुकसान कर रहा है.

इससे लोगों की छवि पर भी बुरा असर पड़ता है. लोगों के व्यवहार को निखारने के लिए काम कर रहे विशेषज्ञों के लिहाज से यह ‘दुस्साहस’ माना जा सकता है.

जहां आप अपने आगे न तो किसी को सुनना चाहते हैं और न ही खुद रुकना चाहते हैं.

यदि आप भी अपने आॅफिस की मीटिंग्स में ऐसी समस्या का सामना करते हैं तो हमारे पास एक्सपर्ट के बताए कुछ सुझाव हैं, जो आपके बहुत काम आ सकते हैं.

चलिए जानते हैं कि… आखिर मीटिंग में सबके सामने किसी को टोकने और अपनी बात रखने का सही तरीका क्या होना चाहिए–

कल्चर समझना ‘जरूरी’

इतिहास साक्षी रहा है कि यदि टोकने का तरीका सही न हो तो वह महाभारत तक करवा सकता है.

द्रौपदी ने दुर्योधन को उसकी चाल पर टोका था. यह जरा सी टोक आगे चलकर महाभारत का कारण बनी. इसलिए किसी को टोकने से पहले उसकी संस्कृति (कल्चर) को जानना जरूरी है.

हर व्यक्ति का अपना मिजाज होता है. वह जिस परिवेश से आया है उसका गहरा असर उसकी भाषा में झलकता है. इससे आसानी से समझा जा सकता है कि बोलने वाले व्यक्ति की मनोस्थिति पर टोकने का क्या प्रभाव हो सकता है.

बिजनेस स्टैंडर्ड के कॉलमनिस्ट तरूण चक्रवर्ती ने अपनी किताब ‘डायनैमिक मेमोरी ग्रुप डिस्कशन’ में लिखा है कि भारतीय लोगों को रोक-टोक से कुछ खास परेशानी नहींं होती.

हालांकि टोकने का तरीका सभ्य होना चाहिए और टोकने वाला व्यक्ति पद में उससे ज्यादा छोटा न हो. माना जाता है कि अपने जूनियर्स के द्वारा टोका जाना भारतीय लोग कम पसंद करते हैं.

वहीं फ्रेंच लोगों की आदत होती है कि वे एक समय में कई लोगों से मिलकर अलग—अलग बातें करते हैं.

ऐसे में यदि कोई उन्हें टोके तब भी वे बुरा नहींं मानते, जबकि जर्मन लोगों को टोकना थोड़ा मुश्किल है. जर्मन संस्कृति में किसी को टोकना… यानि उसका अपमान करना है. इसलिए जब तक बहुत जरूरी न हो जर्मन लोगों को न टोकें.

अमेरिका और यूरोप की संस्कृति में टोके जाने को बहुत बुरा नहीं माना जाता, लेकिन यदि टोके जाने के बाद आपके पास कहने के लिए कोई मजबूत बात नहीं है तो आपकी किरकिरी होना तय है.

How You Should Behave In A Meeting (Pic: hokudai)

टोकने का उद्देश्य रहे साफ

मीटिंग के दौरान जिस तरह धाराप्रवाह बोलते जाना परेशानी का सबब बन सकता है. वैसे ही टोकना भी किसी समस्या से कम नहींं. यह तब ज्यादा गंभीर हो जाता है जब आपके पास टोकने का उद्देश्य कुछ खास नहीं हो.

ब्रिटिश लेखक रिची फ्राइमेन ने कॉरपरेट आॅफिस कल्चर के ऊपर कई किताबें लिखीं हैं, जिसमें वे बार—बार एक बात का जिक्र करते हैं. उनका कहना है कि जब तक टोकने के लिए ठोस उद्देश्य नहीं है तब तक कुछ भी कहना गलत है.

चूंकि किसी को टोकने के बाद आप उसके हाथ से कमान छीन लेते हैं और पूरे मैदान का मोर्चा आपके हाथ में आ जाता है. अब यदि आप सामने वाले की बातों से ज्यादा वजन वाली बातें न कर सके तो यह उस व्यक्ति का अपमान है, जिसे आपने टोका!

कई लोग इसे अहंकार की श्रेणी में भी रखते हैं.

इसलिए टोकने से पहले सामने वाले की बातों को गौर से सुनें और जहां उसे टोका है, उसी बात से अपनी बात कहना शुरू करें… ताकि सुनने वालों के लिए बातों का तारतम्य बना रहे.

टोकने से पहले सुनिश्चित कर लें कि आपकी बातें सामने वाली की बातों से ज्यादा गहरा असर छोड़ सकती हैं कि नहीं? वरना आपको शर्मिंदगी का सामना करना पड़ सकता है.

मतलब साफ़ है कि रोकने-टोकने का आपके पास मजबूत आधार होना चाहिए.

You Should Know Why You Are Interrupting Other (Pic: videoblocks)

कैसा हो टोकने का तरीका?

आजकल तकनीक का जमाना है.

हर मीटिंग दफ्तर में टेबल के आमने-सामने हो यह जरूरी नहीं. अब कांफ्रेंस या मीटिंग्स आॅनलाइन भी होती हैं. मल्टीनेशनल कंपनीज में तो यह कल्चर बहुत आम है.

बड़े पैमाने पर वीडियो और टेली-कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कई देशों के क्लाइंट एक साथ मीटिंग करते हैं. ऐसे में टोकने की जटिलता बढ़ गई है. क्योंकि यहां आमतौर पर होने वाली मीटिंग्स की तरह हाथ उठाने का मौका नहीं मिल पाता.

ऐसे में बोलने वाले को स्वयं समझना पड़ता है कि क्या कोई ऐसा भी है जो बहुत कुछ बोल नहीं रहा है? यानि वह अपनी बारी का इंतजार कर रहा है और उसे अपना पक्ष रखने का मौका मिलना चाहिए.

यदि कांफ्रेंस में ज्यादा सदस्य शामिल हैं तो बात रखने का मौका मिलना मुश्किल होता है, इसलिए सब्र रखें और अपनी बारी का इंतजार करें.

वहीं दूसरी ओर यदि मीटिंग काफ्रेंस रूम में परस्पर आमने—सामने हो रही है तो हाथ उठाकर जताएं कि आपके पास अच्छा विकल्प है.

अथवा अपनी बात कहने से पहले आवाज में सुधार लाने की कोशिश करें. ताकि बाकी लोग समझ जाएं कि अब बात कहने की बारी आपकी है.

रिची फ्राइमेन कहते हैं कि किसी भी मीटिंग में अपनी बात रखने का सबसे अच्छा समय तब है जब माहौल ज्यादा गंभीर न हो. सभी हंसी—मजाक के मूड में दिखें. इसके अलावा जब सभी अपनी बात रख रहे हों तो इस मौके को हाथ से न जाने दें.

अथवा खामोशी का फायदा उठाएं और तत्काल अपनी बात रखें.

Always Talk Humble In Meeting (Pic: aisalinkbusiness)

जब बोलने की बारी हो ‘आपकी’

टोकने के बाद आप वक्ता बन जाते हैं. ऐसे में यह न सोचे कि जो स्थिति आपसे पहले वाले वक्ता की थी वही आपके साथ बन जाए. इसलिए बोलते वक्त सुनने वालों के हाव—भाव का ध्यान रखें.

जब ऐसा महसूस हो कि आपको बोलते हुए काफी समय हो गया है और फिर भी कुछ कहना बाकी है तो माहौल को हल्का करें.

थोड़ा सा मजाक का पुट दें. सबसे अच्छा तरीका है कि खुद से स्वीकार करें कि ‘आपको बोलते हुए ज्यादा समय हो गया है’.

बातों-बातों में अपनी बची हुई बात कहने का समय भी मांग लें. इससे स्थिति सामान्य हो जाएगी.

मीटिंग में शामिल बाकी लोगों से कह सकते हैं कि ‘आप सबकी इजाज़त हो तो मैं इसे जारी रखूं’. विनम्रता से पूछने पर कोई भी आपको मना नहीं करेगा.

इस तरह लोगों को आपकी बात की अहमियत समझ में आएगी और किसी को बुरा भी नहीं लगेगा.

ध्यान रखें कि चुप रहना किसी समस्या का हल नहीं हो सकता. आपको अपनी बात कहने की आजादी है, लेकिन यह हक औरों के पास भी है.

इसलिए दायरा ऐसा बनाएं कि किसी और के हक पर अतिक्रमण न हो और आपका काम भी निकल जाए.

You Should Know When Is Your Turn To Talk (Pic: qnet)

तो देखा आपने मीटिंग में आखिर कैसे अपनी बात कहनी चाहिए और कैसे दूसरों की बातें भी सुननी चाहिए. अक्सर हम किसी मीटिंग में या तो चुप रहते हैं या फिर ज्यादा बोल जाते हैं. हमें इन दोनों ही चीजों से खुद की दूरी बनाए रखनी है.

मीटिंग में हमेशा ही ऐसे रहना चाहिए कि अपनी बात भी आप कह दें और किसी को बुरा भी नहीं लगे.

मीटिंग्स, टोकाटाकी और अपनी बात रखने के सन्दर्भ में आपके क्या अनुभव हैं… कमेन्ट-सेक्शन में अवश्य शेयर करें!

Web Title: How You Should Behave In A Meeting, Hindi Article

Featured Image Credit: kalaharimeetings