आज के दौर में हम भले ही किसी भी क्षेत्र में लगे हुए हो, किन्तु हममें से अधिकतर लोगों ने अपने स्कूल के दिनों में सामाजिक विज्ञान की किताबें जरूर पढ़ी होंगी. आपकी यादें धुंधली हो गई हो, तो बताते चलें कि यहां उसी सामाजिक विज्ञान की बात हो रही है, जिसमें हिस्ट्री, पॉलिटिकल साइंस और भूगोल का संगम हुआ करता था.

अमूमन सामाजिक विज्ञान को एक बोरिंग सबजेक्ट माना जाता रहा है… बावजूद इसके कई सारे पाठ हम पूरे के पूरे चाटकर पढ़ जाया करते थे. खास तौर पर भूगोल के पाठ!

भूगोल के इसलिए क्योंकि इनमें पृथ्वी की संरचना, पृथ्वी के बाहर का जीवन और सूरज-चांद जैसे दिलचस्प विषय जो होते थे.

हो सकता है कि आज भी आपमें से बहुत से लोग इनको पूरे चाव से पढ़ते हों, किन्तु सच तो यह है कि तेजी से बदलते वक्त में किताबें कब हमसे दूर हो गईं हमें पता ही नहीं चला!

इसलिए आईये एक बार फिर से उस अनजाने रहस्यमय तथ्यों की दुनिया में लौटने की कोशिश करते हैं–

पृथ्वी गोल है या फिर…

बचपन से हम किताबों में यही पढ़ते आए हैं कि पृथ्वी गोल है… जबकि ऐसा नहीं है. असल में पृथ्वी का आकार इक्वेटर से फैला हुआ और नॉर्थ पोल व साऊथ पोल से थोड़ा चपटा है. जिससे हम उसे गोल ना कहकर ओवल शेप का कह सकते हैं.

दरअसल ऐसा इसलिए है, क्योंकि जब पृथ्वी अपनी ही एक्सिस पर घूमती है, तो इसे ‘रोटेशन’ कहा जाता है. पृथ्वी के रोटेट करने की वजह से उसका आकार इक्वेटर से 0.3 प्रतिशत फैला हुआ है. इससे पृथ्वी की चौड़ाई नॉर्थ पोल से साऊथ पोल तक 12714 किलोमीटर है, जबकि इक्वेटर से 12756 किलोमीटर है.

इनके बीच का अंतर लगभग 42 किलोमीटर है, जोकि अंतरिक्ष से देखने पर ना के बराबर दिखाई देता है. इसलिए पृथ्वी अंतरिक्ष से देखने पर बिल्कुल अण्डाकार दिखाई देती है.

Circular/Elliptical Orbit (Pic: mellenstei)

72 प्रतिशत पानी है पृथ्वी

अंतरिक्ष से जब पृथ्वी को पहली बार देखा गया, तो पाया गया कि हमारा ग्रह नीला है. शोध करने पर पता चला कि धरती का 72 प्रतिशत हिस्सा में पानी है. जिसकी वजह से पृथ्वी को ‘ब्लू प्लैनेट’ भी कहा जाता है.

अब आप सोच रहे होगें कि अगर धरती पर 72 प्रतिशत पानी है, तो ऐसा क्यों कहा जाता है कि तीसरा विश्व युद्ध पानी के लिए होगा.

असल में बात ये है कि धरती पर 72 प्रतिशत पानी में से 97 प्रतिशत पानी खारा है, जिसे इस्तेमाल नहीं किया जा सकता और केवल 3 प्रतिशत पानी ही इस्तेमाल करने योग्य है. जोकि बर्फ, ग्लेशियर, तालाब और नदियों में है.

चांद और दो को-ऑरबिटल उपग्रह

चांद को पृथ्वी का इकलौता साथी माना जाता है, जो पृथ्वी के चारों ओर घुमता है. जबकि, वैज्ञानिकों ने एक खोज में पाया है कि चांद के अलावा दो को-ऑरबिटल क्षुद्र ग्रह (एस्टेरॉइड) भी पृथ्वी के करीब घूमते हैं. जिन्हें 3753 Cruithne और 2002 AA29 कहा जाता है.

3753 Cruithne को सन् 1986 में खोजा गया था. इसे सूरज का एक चक्कर लगाने में पृथ्वी जितना ही समय लगता है, इसलिए कहा जाता है कि यह पृथ्वी का पीछा कर रहा है. इसे पृथ्वी का दूसरा चांद भी कहा जाता है.

यह आकार में बहुत छोटा होता है, इसलिए हम इसे आंखों से नहीं देख सकते.

वहीं, दूसरी ओर 2002 AA29  एक एस्टेरॉइड है, जो पृथ्वी के साथ साल में एक बार सूरज का चक्कर लगाता है. यह घोड़े के पैर जैसी आकृति में पृथ्वी के चक्कर लगाता है. जिससे यह हर 95 साल में अपने ग्रह के बेहद करीब होता है.

वैज्ञानिकों का मानना है कि लगभग 600 वर्षों में यह सेटेलाइट ऑर्बिट में पृथ्वी के बेहद करीब  दिखाई देगा, जोकि अंतरिक्ष खोज मिशन के लिए एक अच्छा लक्ष्य बन सकता है.

इसलिए पृथ्वी में जीवन संभव

पृथ्वी को बाकी ग्रहों से अलग माना जाता है, क्योंकि यहां जीवन संभव है. पृथ्वी के पास वो सभी ज़रूरी तत्व जैसे कॉर्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोडन और ऑक्सीजन हैं, जो हमारे ग्रह को जीवन जीने लायक स्थान बनाते हैं .

सही रसायनों का मिश्रण और तापमान के चलते हम पृथ्वी पर जिंदा रह पाते हैं. पृथ्वी पर पानी का होना भी जीवों के पैदा और विकसित होने में मदद करता है. वहीं पृथ्वी के पास ओजोन लेयर के रूप में रक्षात्मक चादर भी है, जो इसे सूर्य से निकलने वाली एलट्रा वॉयलेट किरणों से बचाती है.

ये सभी कारक पृथ्वी को सबसे खूबसूरत ग्रह बनाते हैं, जहां अलग-अलग जीवों के एक साथ रहने की झलक दिखाई पड़ती है.

life is Possible on Earth (Pic: keepearthbeautiful)

दुनिया की सबसे सूखी जगह

पृथ्वी दिलचस्प रहस्यों और तथ्यों से भरी हुई है. ऐसा ही एक तथ्य है कि दुनिया की सबसे सूखी जगह उत्तरी चिली का अटाकामा रेगिस्तान है. यह धरती के सबसे बड़े और गहरे प्रशांत महासागर के पास स्थित है. यह रेगिस्तान करीब 1000 किलोमीटर तक फैला हुआ है.

इसे सबसे सूखी जगह इसलिए कहा जाता है, क्योंकि अटाकामा में कई दशकों से बारिश नहीं हुई है. इस कारण यहां फूल, पत्ते, जीव और इंसान भी ना के बराबर पाए जाते हैं. अटाकामा का वातावरण इसे जीवन उत्पत्ति के लिए उपयुक्त नहीं बनाता. इसी वजह से नासा के वैज्ञानिकों के लिए यह रेगिस्तान खोज का विषय है.

कहते हैं कि अटाकामा की स्थिति मंगल ग्रह के समान है, जो इसे मंगल से जुड़े शोध को करने में मददगार सिद्ध करती है.

‘लीप इयर’ के पीछे की कहानी

हमेशा से हम किताबों में यही पढ़ते आए हैं कि पृथ्वी को अपनी ही एक्सिस पर घूमने के लिए 24 घंटे लगते हैं, जिससे हमें एक दिन मिलता है, जबकि ऐसा नहीं है. असल में पृथ्वी अपना एक रोटेशन 23 घंटे 56 मिनट और चार सेकेंड लगते हैं. वहीं, पृथ्वी को सूर्य के चारों ओर एक यात्रा को पूरा करने के लिए 365.25 दिन लगते हैं.

एक दिन का अतिरिक्त क्वार्टर हमारे कैलेंडर सिस्टम में एक चुनौती होता है, जो एक वर्ष के रूप में 365 दिन का होता है. इसलिए अपने कैलेंडर को सूर्य की गति के सामान रखने के लिए, हर चार वर्ष में हम एक दिन जोड़ते हैं. उस एक दिन को लीप दिन कहा जाता है, और साल को लीप इयर कहा जाता है.

मौसम के बदलने की असल वजह

पृथ्वी अपनी ऑर्बिट से 23.5 डिग्री झुकी हुई है. यह झुकाव मौसम बदलने का कारण बनता है. इसी झुकाव की वजह से साल के कुछ समय सूरज उत्तरी हेमिस्फेयर की ओर झुका हुआ होता है, जबकि दक्षिणी हेमिस्फेयर दूर होता है. जब सूरज ऊंचाई पर होता है, तो उत्तरी क्षेत्र में गर्मी और दक्षिणी क्षेत्र में सर्दी होती है.

छह महीने बाद, स्थिति उलट हो जाती है.

वहीं, जब वसंत और पतझड़ शुरू होती है, तो दोनों हेमिस्फेयर सूरज से लगभग बराबर गर्मी प्राप्त करते हैं. इसलिए मौसम ना ठंड़ा होता है ना गर्म.

Earth 23.5 Degree Tilt (Pic: sunwheelgrove)

पृथ्वी के हर रंग में बेहद अनोखे रहस्य और दिलचस्प तथ्य छिपे हैं. जो दुनिया की असल परतों को खोलते हैं. अगर आप भी पृथ्वी के बारे में ऐसे ही मज़ेदार तथ्यों की जानकारी रखते हैं, तो हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं.

Web Title: Amazing Facts About Earth, Hindi Article

Featured Image Credit: Mac Wallpaper