भाग्य सबसे बली है!

कब किस ओर करवट ले ले ये कोई नहीं जानता. हर किसी के जीवन में उतार चढ़ाव आते हैं, मगर हर किसी से हमें मतलब नहीं होता. ये उतार चढ़ाव इंसान के निजी होते हैं. किन्तु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनके भाग्य और जीवन के उतार-चढ़ाव से पूरे देश को फायदा या नुकसान उठाना पड़ता है.

एक ऐसा ही नाम है बुधिया सिंह जिसके भाग्य ने उसके साथ ऐसा खेल खेला कि मैराथन में भारत को मिल सकने वाले स्वर्ण पदक का सपना चूर-चूर हो गया.

आइए जानते हैं बुधिया सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ अहम बातें–

ग़रीबी के दलदल में बीता बचपन

‘बुधिया सिंह’ भले ही इस नाम के ऊपर वक़्त की धूल ने मोटी परत चढ़ा दी हो, लेकिन ज़रा सा याद करने पर आपका दिमाग आपको ये सूचित कर देगा कि ये नाम आपने पिछली बार कब सुना था. जी हाँ ये वही बुधिया सिंह है जिसने मात्र 4-5 वर्ष की आयु में पुरी से भुवनेश्वर तक के 65 कि.मी के फासले को बिना रुके 7 घंटे और दो मिनट में पूरा कर के पूरे विश्व में तहलका मचा दिया था. उस दिन इस साढ़े चार वर्ष के बालक के तेवर देखते हुए हर भारतवासी की आँखों में ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीतने का सपना मानो फिर से जी उठा था.

ये भाग्य ही था जिसने ग़रीबी के दलदल से बुधिया को बाहर निकाल कर दुनिया के सामने ला खड़ा किया. बुधिया का जन्म वर्ष 2002 में उड़ीसा के एक छोटे से गाँव में हुआ. जब बुधिया का जन्म हुआ तब वह भारत में भूख और ग़रीबी से मर रही भीड़ का एक हिस्सा मात्र था. 2 वर्ष की आयु में उसके सर से पिता का साया भी उठ गया. पिता के गुज़र जाने के बाद उसकी माँ के लिए अपने तीन बच्चों का पेट भरना एक बड़ी मुसीबत बन गयी.

Budhia Singh (Pic : Orissapost)

800 रूपए के लिए बुधिया को बेच दिया!

अब तक बुधिया भारत की उस अनजान भीड़ का हिस्सा था जो कब जन्म लेते हैं और कब मर जाते हैं इसकी ना तो किसी को खबर होती है और ना ही फ़िक्र.

बुधिया और उसके परिवार के ग़रीबी का अंदाज़ा आप इस बात से लगा सकते हैं कि बुधिया को भर पेट भोजन और उसे कुछ पैसे मिल सकें इसलिए उसकी माँ ने उसे एक फेरी वाले को मात्र 800 रुपयों में बेच दिया दिया!

उसकी माँ को इस बात कि बिलकुल खबर नहीं थी कि वो जिस बच्चे का मोल मात्र 800 रुपए लगा रही थी वो एक असाधारण प्रतिभा का धनी था. सूत्रों के अनुसार वो फेरी वाला बुधिया से उसकी क्षमता से अधिक काम करवाता था तथा उसे मारता पीटता भी था. एक चार साल के बच्चे के लिए ये यातनाएं असहनीय थीं, लेकिन उसे ज़्यादा वक्त तक यह सब नहीं सहना पड़ा.

बिरंची दास जो एक जूडो कोच थे उन्होंने उस फेरी वाले को पैसे दे कर बुधिया को उसके यहाँ से मुक्त करवा दिया. जब बिरंची दास को बुधिया के परिवार की स्थिति का पता चला तब उन्होंने फैसला किया कि वो बुधिया को अपने घर ले जायेंगे. यहाँ बुधिया अकेला नहीं था बिरंची दास ने उसके जैसे 22 अनाथ बच्चों को पहले से अपने यहाँ पनाह दी हुई थी. बिरंची दास अपनी पत्नी गीतांजली पांडा के साथ इन सभी बच्चों की देखभाल करते थे.

उनके इस परिवार में अब बुधिया भी जुड़ गया था.

Budhia With His Mother Sukanti Devi (Pic : Runnersworld)

कोच बिरंची दास ने दिखाई ‘राह’

अभी तक बुधिया की अद्भुत प्रतिभा के बारे में बिरंची दास को भी कुछ ज्ञात नहीं था. एक दिन एक बच्चे के चिढाने पर बुधिया ने उसे अपशब्द कह दिए. बुधिया की इस हरकत से नाराज़ बिरंची ने उसे तब तक दौड़ते रहने की सज़ा सुनाई जब तक वो खुद ना उसे रुकने को कह दें.

बिरंची दास इतना कह कर अपने अन्य कार्यों में लग गए तथा बुधिया को दी गयी सज़ा के बारे में पूरी तरह से भूल गए. 4-5 घंटे बाद उन्होंने देखा की बुधिया अब तक भाग रहा था. हैरानी की बात यह थी कि इतनी देर तक दौड़ते रहने के बाद भी बुधिया की हृदयगति सामान्य थी. इस घटना के बाद बिरंची दास को बुधिया अन्य बच्चों से अलग और अद्भुत नज़र आने लगा और उसी दिन उन्होंने तय कर लिया कि वो बुधिया को ओलिंपिक के लिए तैयार करेंगे.

वह चाहते थे कि बुधिया की यह खूबी ज़ाया न हो जाए क्योंकि वह चाहते थे कि बुधिया भारत को पहला स्वर्ण दिलाए. बिरंची दास का प्रशिक्षण और बुधिया की मेहनत खूब रंग ला रही थी. बिरंची दास के प्रयासों से बुधिया कई प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेने लगा. देखते ही देखते आस-पास के क्षेत्रों में बुधिया सिंह का नाम किसी परिचय का मोहताज ना रहा. लोकप्रियता के बावजूद बिरंची दास जानते थे कि बुधिया की मंज़िल अभी बहुत दूर है और उसके लिए उसे कुछ बड़ा करना पड़ेगा.

02 मई 2006 को पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर के सिंहद्वार से एक दौड़ का आयोजन किया गया. लगभग 200 सीआरपीएफ़ जवानों के बीच दौड़ रहे मात्र साढ़े चार साल के बुधिया पर सबकी निगाहें टिकी हुई थीं. दौड़ चलती रही लोग थक कर रुकते रहे किन्तु बुधिया नहीं थका.

वो बस दौड़ता रहा और 7 घंटे 2 मिनट की दौड़ के बाद बुधिया ने पुरी से भुवनेश्वर की 65 कि.मी की दुरी को पूरा करते हुए अपना नाम ‘लिम्का गिनीज़ वर्ल्ड रिकार्ड’ में दर्ज करा लिया.

बुधिया इतनी कम आयु में इस लम्बी दूरी को तय करने वाला विश्व का पहला धावक बन गया. इसी के साथ बुधिया ने दिल्ली हाफ़ मैराथन सहित लगभग 50 प्रतिस्पर्धाओं में भी हिस्सा लिया.

Budhia With His Coach Biranchi Das (Pic : Thelogicalindian)

छूट गया कोच का साथ…

बुधिया अपनी किस्मत से लड़ कर फर्श से अर्श तक पहुँच चुका था. बिरंची दास का देखा हुआ सपना सच होने की राह पर बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ रहा था. बुधिया को मशहूर होने के कारण अब कई विज्ञापनों के प्रस्ताव आने लगे जिससे उसकी आर्थिक स्थिति भी सुधरने लगी थी. बिरंची दास को भी उनके अनाथालय के खर्च के लिए अच्छी खासी धनराशी मिलने लगी, लेकिन भाग्य को बुधिया का इतनी तेज़ी से बढ़ना रास ना आया.

बिरंची दास पर कई बाल कल्याण संस्थाओं तथा बुधिया की माँ सुकांति देवी द्वारा इल्जाम लगते रहे. उन पर बुधिया से कम उम्र में इस तरह का कठिन परिश्रम कराने तथा शारीरिक यातनाएं देने के अपराध का मुक़दमा चलाया गया. सुकांति देवी ने तो अपने और बुधिया के लिए सुरक्षा दिए जाने की भी मांग की.

बिरंची दास के लाख इंकार करने के बावजूद 13 अगस्त 2007 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. गिरफ्तारी के बाद सरकार ने बुधिया का संरक्षण अपने हाथों में ले कर उसे सरकारी स्पोर्ट्स हॉस्टल में भेज दिया.

इस घटना के कुछ समय बाद 2008 में बिरंची दास की हत्या हो गयी. शायद ये बिरंची दास की नहीं बुधिया के सुनहरे भविष्य की हत्या थी.

Biranchi Das’s Wife Geetanjli (Pic : Youtube)

आज भी है दिल में मलाल…

बिरंची दास नन्हें बुधिया की ऊँगली पकड़ कर उसे भीड़ से अलग एक नयी पहचान दिलाने ले जा रहे थे किन्तु बिरंचीदास से बुधिया का हाथ छूटते ही मानों जैसे वो इसी भीड़ में वापस कहीं खो गया.

साढ़े चार साल की उम्र में अपनी अद्भुत प्रतिभा से तहलका मचा देने वाला बुधिया सिंह आज 16 साल का हो चुका है और गुमनामी की जिंदगी जी रहा है.

एक साक्षात्कार में बुधिया ने ये कहा कि ‘एक या दो कि.मी की तेज़ दौड़ में मुझे कोई भी हरा सकता है, लेकिन 5 कि.मी दौड़ने के बाद मुझे रोकना असम्भव है. 5 कि.मी के बाद मुझे लगता ही नहीं कि मैं दौड़ रहा हूँ.’

बुधिया के अनुसार हॉस्टल में उसे कोई भी कोच लंबी दौड़ के लिए प्रशिक्षित नहीं करता. बुधिया के अनुसार उसको सबसे बड़ा अफ़सोस इस बात का है कि जब बिरंची दास की हत्या हुई तो वो उनके अंतिम दर्शन के लिए भी नहीं जा सका. उसे इस बात की जानकारी तक नहीं दी गयी. बिरंची दास की हत्या के दो दिन बाद जब कुछ पत्रकार बुधिया से बिरंची दास के बारे में बातचीत करने आये तब उसे इस दुर्घटना की जानकारी मिली. बुधिया ने हॉस्टल से बिरंची दास की पत्नी गीतांजली पांडा के पास जाने की अनुमति मांगी किन्तु उसे इंकार कर दिया गया.

अपने गुरु के आखिरी दर्शन तक बुधिया को नहीं हो पाए.

Young Budhia Singh (Pic : Anitaexplorer)

नन्हें बुधिया के जलवों ने सिनेमा तक अपनी पहचान बनाई

बुधिया की प्रतिभा पहले भी किसी से छुपी नहीं थी किन्तु उसके जीवन पर डॉक्युमेंट्री एवं फिल्म बनने के बाद उसकी कहानी देश विदेश के कई दर्शकों के सामने आई. बुधिया के जीवन पर बुधिया सिंह बार्न टू रन नामक हिंदी फिल्म बन चुकी है. इसमें मनोज वाजपेयी ने बिरंची दास तथा मयूर पटोले ने बुधिया सिंह का किरदार निभाया है.

इसकी कथा, पटकथा एवं निर्देशन सुमेंद्र पधि ने किया है. फिल्म लोगों को काफ़ी हद तक पसंद आई. इस फिल्म के जरिए बुधिया के जीवन को लोगों के सामने लाने की कोशिश की गई. जिस तरह बुधिया ने लोगों का दिल जीता उसी तरह इस फिल्म ने भी उनकी प्रशंसा पाई.

Budhia Singh Born To Run (Pic : Amazon)

भले ही हम अपने आधुनिक होने का कितना भी दावा कर लें किन्तु जब ऐसी अद्भुत प्रतिभाएं गुमनामी के गलियारों में कहीं खो जाती हैं तब अहसास होता है कि अभी हमें बहुत कुछ सीखना है. बुधिया सिंह अभी महज़ 15-16 साल का है. ईश्वर से यही प्रार्थना करनी चाहिए कि उसे फिर से बिरंची दास जैसा कोई मार्गदर्शक मिले जो उसके अंदर दम तोड़ रहे उस नन्हें मैराथन बॉय को फिर से लंबी दौड़ दौड़ना सिखाये. इसके साथ ही बिरंची दास के बुधिया द्वारा ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीतने के सपने को साकार करे.

Web Title: Budhia Singh The Youngest Marathon Runner, Hindi Article

Featured Image Credit: Thequint