बारह वर्ष के वनवास और एक वर्ष के अज्ञातवास के बाद जब पांडव-पुत्र हस्तिनापुर पहुंचे, तो उन्होंने महाराज धृतराष्ट्र के पास पहुंचकर कहा, “राजन अब हम वनवास काट चुके हैं, इसलिए आपसे आग्रह है कि आप हमारे अधिकार वापस कर दें, ताकि हम हस्तिनापुर के हित में आगे बढ़ सकें”.

फैसला पांडवों के हित में होना चाहिए था, किन्तु पुत्रमोह ने धृतराष्ट्र को ऐसा नहीं करने दिया. वह अपनी संतान दुर्योधन के सामने असहाय हो गए और पांडवों को कोई निर्णायक जवाब नहीं दे सके.

इसका परिणाम क्या हुआ जगजाहिर है!

उनका यही पुत्रमोह बाद में उनके सभी पुत्रों के वध का कारण तक बना.

कहते हैं कि उनके जीवन के इस एक फैसले ने उन्हें महाभारत का इतना बड़ा विलेन बना दिया कि उनका नाम आज भी एक नकारात्मक रूप में ही लिया जाता है.

इस सबके बीच सवाल यह है कि क्या सच में धृतराष्ट्र एक विलेन ही थे, क्योंकि तत्कालीन हस्तिनापुर पर एक लम्बे समय तक राज करने वाले शासक में कुछ तो गुण रहे होंगे!

आईये जानने की कोशिश करते हैं कि तमाम बुराइयों के बावजूद वह कौन से गुण थे, जिनके बल पर धृतराष्ट्र ने राजगद्दी पर अपना प्रभाव बनाए रखा–

भाईयों के लिए ‘स्नेह और सम्मान’

धृतराष्ट्र, पाण्डु के बड़े भाई थे.

साथ ही वह बल और विद्या में अपने भाईयों पाण्डु और विदुर से तेज थे. इस लिहाज से हस्तिनापुर की गद्दी पर सबसे पहला अधिकार उन्हीं का था, किन्तु उन्हें सिर्फ इसलिए राजा नहीं बनाया गया, क्योंकि वह जन्म से अंधे थे. उनकी जगह पाण्डु को हस्तिनापुर का शासन दिया गया.

हालांकि, पाण्डु की मृत्यु के बाद वह राजा नियुक्त किए गए…

ऐसे में वह चाहते तो अपने बेटे दुर्योधन की तरह सत्ता के लिए पहले ही हठ कर सकते थे. तब संघर्ष होता और संभवतः पाण्डु का राजा बनना सरल नहीं होता!

उनके दिल में कहीं न कहीं अपने भाईयों के लिए स्नेह ज़रूर था. पाण्डु के राजा बनाए जाने के फैसले का विरोध न करना इसका बड़ा उदाहरण माना जा सकता है.

पाण्डु ही क्यों उन्होंने अपने दूसरे भाई विदुर को भी अपने स्नेह से वंचित नहीं किया, जबकि विदुर की मां उनके पिता की एक दासी भर ही थीं. ऐसे में विदुर के लिए धृतराष्ट्र के दिल में हीन भावना आ सकती थी.

हस्तिनापुर के लिए किए जाने वाले हर फैसले में उन्होंने विदुर की सलाह जरूर ली. साथ ही उन्हें राजपाठ में प्रधानमंत्री के पद पर उचित स्थान भी दिया.

Vidura and Dhritarashtra (Pic: Wikipedia)

बल-विद्या में इतने शक्तिशाली थे कि…

धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे. इस लिहाज से उन्हें हमेशा कम आंका गया, किन्तु उन्होंने इसे कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया.

यही नहीं, अपनी दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर वह अपने ‘अंधत्व’ तक पर विजय प्राप्त करने में भी सफल रहे. यहां तक कि हस्तिनापुर का राजा बनकर उसका शासन तक चलाया. कहते हैं कि राजमहल के तमाम रास्तों को धृतराष्ट्र ने न केवल पूरी तरह याद कर रखा था, बल्कि वह लोगों की पदचाप से ही व्यक्ति की पहचान कर लेते थे.

वह कितने बलशाली थे, इसका अंदाजा भी इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब महाभारत के युद्ध के दौरान भीम ने दुर्योधन और दु:शासन को निर्दयता से मार डाला था, तो वह गुस्से से अपना आपा खो बैठे थे.

भीम उनके लिए एक दुश्मन जैसे हो गए थे. वह किसी भी तरह भीम को मार डालना चाहते थे. इसी कारण युद्ध समाप्त होते ही जब पांडव उनसे मिलने पहुंचे तो, वह तेजी से भीम की तरफ लपके. वह तो श्रीकृष्ण इस बात को भांप चुके थे, इसलिए जब धृतराष्ट्र ने भीम को गले लगाने की इच्छा जताई तो श्रीकृष्ण ने तुरंत ही भीम के स्थान पर एक लोहे की मूर्ति आगे बढ़ा दी.

कहते हैं कि यह धृतराष्ट्र के शक्तिशाली होने का ही प्रमाण था कि उन्होंने लोहे से बनी भीम की लोहे की मूर्ति को अपनी भुजाओं से चकनाचूर कर दिया था.

कहते हैं कि राजनीति और कूटनीति के भी वह महाज्ञाता थे, किन्तु जिस तरह एक छोटे से छेड़ से बड़ी नाव डूब जाती है, ठीक उसी तरह व्यक्ति की एक बुराई उसके तमाम सद्गुणों पर पानी फेर देती है.

संभवतः धृतराष्ट्र के साथ भी यही हुआ!

कूट-कूट कर भरी थी संवेदनशीलता

भीम की मूर्ति को तोड़ने के बाद धृतराष्ट्र जिस तरह से फूट-फूट कर रो रहे थे, वह उनकी संवेदनशीलता को समझने के लिए काफी है. शायद उन्हें इस बात का दु:ख था कि उनके हाथों भीम की जान चली गई है.

असल में वह इस बात से अनजान थे कि उन्होंने भीम को नहीं बल्कि उनकी मूर्ति को तोड़ा था.

बाद में श्रीकृष्ण ने उन्हें सच्चाई से अवगत कराया तो उन्होंने पांडवों को स्वीकार कर लिया था. साथ ही उनके साथ रहने रहने लगे थे. यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि उन्होंने यह उदारता तब दिखाई थी, जब पांडवों ने ही उनके प्रिय पुत्र दुर्योधन सहित दूसरे पुत्रों का बढ़ किया था.

हालांकि, द्रोपदी चीर हरण में जिस तरह से वह शांत रहे, वह उन्हें कड़े सवालों एवं आलोचनाओं के घेरे में खड़ा करता रहा. बावजूद इसके उनके दूसरे पहलुओं को देखें, तो कहीं न कहीं यह नज़र आता है कि वह संवेदना से भरे हुए थे.

पर संभवतः महत्वाकांक्षाओं के जाल में वह उलझ गए थे.

पत्नी गंधारी के प्रति रहा ‘अटूट प्रेम’

धृतराष्ट्र का विवाह गांधार की राजकुमारी गांधारी से हुआ था, जोकि बहुत सुंदर थीं. ऐसे में धृतराष्ट्र के सामने बड़ी चुनौती थी कि वह उनके साथ अपने रिश्तों को कैसे मजबूत करें, क्योंकि विवाह से पहले गांधारी धृतराष्ट्र के अंधेपन से अनजान थीं. किन्तु, अपने स्नेह के चलते धृतराष्ट्र ने इस चुनौती से पार पा लिया था. गांधारी का उनके लिए ताउम्र अपनी आंखों पर पट्टी बांध लेना इसकी ओर इशारा करता है.

यही नहीं एक लंबे समय तक गंधारी से उन्हें संतान की प्राप्ति नहीं हुई, किन्तु उनका गंधारी के लिए स्नेह कभी कम नहीं हुआ. हालांकि, इस बीच एक दासी के साथ उनके संबंधों की बात भी  कही जाती है, लेकिन गंधारी के लिए उनके मन में जो स्थान था, उसे कोई और नहीं ले पाया.

जीवन के आखिरी पड़ाव पर भी, जब धृतराष्ट्र  का जीवन से मोहभंग हो गया तो गंधारी उनके साथ वन तक गई थीं.

Dhritrashtra and Gandhari (Pic: Sagarworld)

यह तो महज कुछ एक उदाहरण भर हैं, धृतराष्ट्र के व्यक्तित्व में ऐसे कई और अच्छे गुण मौजूद थे, जो उनकी एक अलग ही तस्वीर प्रदर्शित करते हैं.

वैसे भी कहा जाता है कि मनुष्य ईश्वर की ऐसी कृति है, जिसमें अच्छाई और बुराईयां दोनों ही होती हैं. बस इनका प्रतिशत कम ज्यादा हो सकता है. यह तो व्यक्ति पर निर्भर करता कि वह किसी की बुराईयों को देखता है या फिर उसकी अच्छाईयों को अपने जीवन में उतारता है.

धृतराष्ट्र जिसे महाभारत काल का एक नकारात्मक किरदार माना जाता है, उसकी अच्छाइयों को ढूँढने की हमारी कोशिश का मतलब सिर्फ यही है कि तमाम अच्छी आदतें और गुण बेशक हमारे भीतर हों, किन्तु बावजूद उसके अपनी छोटी से छोटी बुराइयों से हमें सावधान रहना चाहिए!

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Web Title: Dhritarashtra Hero Or Villain, Hindi Article

Feature Image Credit: hardboiled