सेल्फी के साथ-साथ हमें मोबाइल-इंटरनेट ने शायरी-कविता और कहानी का दीवाना बना दिया है. अब हर कोई गालिब की मजार पर जाकर गुनगुनाना-दिल बहलाना सीख गया है.

यही तो बदलाव है, जो हमें इंसान होने का अहसास कराता है.

यूं भारत में साहित्य सदियों पहले आरंभ हो चुका था, फिर धीरे-धीरे साहित्य का दायरा बढ़ता गया.

बावजूद इसके भारतीय साहित्य आर्थिक रूप से कमजोर बना रहा. यहां तक कि हमारे कवि व रचनाकारों की पैसे के अभाव में मौत की खबरें भी आते रहीं.

आज जब हम डिजिटलाइजेशन की दुनिया में हैं, तो जानना दिलचस्प हो जाता है कि इस दौर में हमारा हिन्दी साहित्य कहां तक पहुंचा है. क्या इसमें किसी प्रकार के क्रांतिकारी बदलाव हुए हैं?

अगर हां तो क्या? आईये जानने की कोशिश करते हैं–

इतिहास के पन्नों में भारतीय साहित्य

कहा जाता है कि 7वीं से लेकर 10वीं शताब्दी में साहित्य का घरौंदा बनने लगा था. एक रिसर्च लेख की मानें तो आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने पहली बार हिंदी साहित्य के इतिहास का कालगत एवं प्रवृत्तिगत दोनों रूपों में वर्गीकरण किया.

सम्पूर्ण हिंदी साहित्य को तीन भागों में विभक्त कर उसकी सीमा का निर्धारण किया–

आदिकाल (विक्रमी संवत 1050 से 1375 तक),
मध्यकाल (विक्रमी संवत 1375 से 1900 तक),
आधुनिक काल ( विक्रमी संवत 1900 से अब तक ). आधुनिक काल को गद्यकाल नाम दिया.

11वीं शताब्दी तक अपभ्रंश के प्रभाव से हिंदी मुक्त हो चुकी थी. उसके बाद व्यापक रूप में भक्ति का आन्दोलन पूरे देश में आरम्भ हो गया और हिंदी के विविध रूपों के माध्यम से भक्तिकाव्य लिखा जाने लगा था.

सांस्कृतिक और साहित्यिक चेतना के रूप में यह एक नये युग का आरम्भ था. 15वीं शताब्दी तक आते-आते जब देश में मुगलों का साम्राज्य आया, तब साहित्य की मुख्य प्रवृत्ति में भी परिवर्तन आया. 19वीं शती के मध्य में जब देश में अंग्रेजों का राज्य स्थापित हुआ, तब सन 1857 की क्रांति ने राष्ट्रीय चेतना व राजनीतिक जागरण के क्षेत्र में आन्दोलन का रूप ले लिया.

Digitization and its Impact-on Hindi Literature (Pic: Frankel)

डिजिटलाइजेशन के बाद क्या…

डिजिटलाइजेशन के दौर में भारतीय साहित्य को नया आयाम ही नहीं मिला है, बल्कि नया रूप देखने को मिला है. इसके आने से भारतीय साहित्य पाठक तक पहुंचने लगे हैं, बेहद सुगमता से. नए युवा लेखकों व कवियों को पढ़ने सुनने का मौका पाठकों को मिल रहा है, जो कि डिजिटलाइजेशन से पहले नही था.

इससे पहले हम केवल किताबों के पन्नों तक ही सिमट कर रह जाते थे, लेकिन आजकल डिजिटल प्लेटफॉर्म ने साहित्यकारों को नया मंच दे दिया है. इसके जरिए हर वर्ग के पाठक तक पहुंचना आसान सा हो गया है. इसके साथ ही मन माफिक कंटेट या यूं कहें कि पाठक की पसंद पर काम किया जा रहा है.

बीबीसी में छपी साहित्यकार अलोक धन्वा की आलोचनात्मक बातचीत में इसका जिक्र किया गया है कि, इंटरनेट की दुनिया में दिलचस्पी बढ़ने के साथ-साथ बुक फेयर में भी युवाओं की संख्या बढ़ी है. इसके अलावा एक और रिपोर्ट बताती है कि इंटरनेट के कारण ई-बुक्स, ऑनलाइन साहित्य को बढ़ावा मिला है.

वस्तुतः अब संवाद दो तरफ़ा हो गया है. पाठक, लेखकों से तुरंत इंटरैक्ट करते हैं और लेखकों को भी अपने लेखन पर तुरंत रिएक्शन मिलने से सही दिशा में बढ़ने हेतु मदद मिलती है.

ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट का बढ़ता क्रेज

भारत गांवों का देश है. यहां पर एक चौंकाने वाला आंकड़ा सामने आया कि सबसे ज्यादा इंटरनेट यूजर्स गांवों से हैं, जबकि 25 प्रतिशत शहरी यूजर्स. इस पर इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईएएमएआई) और इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो (आईएमआरबी) द्वारा हाल ही में हुए अध्ययन के अनुसार लगभग 4.5 करोड भारतीय देशी भाषाओं में इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं.

Jaipur Literature Festival (Pic: dubeat)

भारत में कुल सक्रिय इंटरनेट प्रयोक्ताओं की अनुमानित संख्या लगभग 12.2 करोड है, जिसमें से 64 प्रतिशत लोग ग्रामीण क्षेत्र के हैं. इसी रिपोर्ट में आगे बताया गया है कि, यूजर्स बढ़ने का कारण बताया गया है कि लोग देशी भाषा के गानें, कविता,कहानी, ई-मैग्जीन, ई-बुक्स, ब्लॉग आदि पढ़न में रूचि दिखा रहे हैं.

तेजी से बढ़ी है किताबों की बिक्री

एक समय था, जब साहित्यकार किताब बेचने के लिए तरसता था. किताब मेले सुनसान पड़े रहते थे, लेकिन डिजिटलाइजेशन ने ना केवल किताबों की बिक्री बढ़ाई, बल्कि साहित्य के प्रति रूचि भी बढ़ा दी है. इसको भीड़ के रूप में किताब मेला, साहित्य सम्मेलन में देखा जा रहा है.

केवल ई-बुक्स नही, बल्कि वर्ष 2015 के मुकाबले किताबों की बिक्री 350 गुना ज्यादा बढ़ गई है.

इतना ही नहीं उपन्यासकार सुरेंद्र मोहन पाठक की किताब अमेजन की वेबसाइट पर आते ही तीस हजार से ज्यादा की प्रतियां बिक गई. ऑनलाइन शॉपिंग वेबसाइट्स ने किताबों की बिक्री भी शुरू कर दी, जोकि भारतीय साहित्य के लिए सुखद है.

खास बात यह है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म ने ना केवल युवाओं को आगे बढ़ाया है, बल्कि पुरानी किताबें भी बेस्टसेलर लिस्ट में शामिल हो चुकी हैं. साहित्य में इस तरह का परिवर्तन विकास का सूचक है.

उदाहरण के लिए, चार हिंदी की मूल किताबें पांच से छह दशक पुरानी हैं. मधुशाला (1935), गोदान (1936) और रश्मिरथी (1952) आज भी युवाओं को लुभा रही हैं. साथ ही इनको खरीदने वाले पाठक की उम्र 25-45 के बीच है.

Girls in Book Store (Pic: Indibeat)

नए-नए लेखकों का यूं उभरना

बात केवल साहित्य पढ़े, लिखे पुराने लेखक व साहित्यकारों तक सीमित नहीं रह गई है. अब इस दुनिया में पत्रकार, बीटेक या अन्य किसी विषय के जानकार अपने लेखन के दम पर पाठकों के दिल पर राज कर रहें हैं. इसमें चेतन भगत, नीलेश मिश्रा और निखिल सचान की किताबें बेस्टसेलर बन रही हैं.

इतना ही नहीं, इन्होंने लेखनी के दम पर हिंदी सिनेमा में भी जगह बनाई है, जोकि साहित्य को नई ज़िंदगी दे रहा है.

गौर करने वाली बात यह है कि 2011 पहले सरकार युवा लेखकों को साहित्य सम्मान नहीं देती थी, लेकिन 2011 के बाद जब युवाओं लेखक अपना परचम लहराने लगे, तो भारत सरकार ने 35 वर्ष तक के युवाओं को सम्मानित करने के लिए युवा पुरस्कार देना शुरू कर दिया.

इसी प्रकार अन्य प्रमुख राष्ट्रीय स्तर के मीडिया चैनल भी युवाओं को पुरस्कृत करने लगे हैं.

साहित्य के ऑनलाइन मंच

साहित्य के ऑनलाइन मंच साहित्य अकादमी, भारत-दर्शन के अलावा स्टोरी मिरर, मातृ-भारती आदि प्रकार की वेबसाइट ने नया मंच तैयार कर दिया है. इस साल तो स्टोरी मिरर द्वारा प्रकाशित एक पत्रकार विवेक अग्रवाल की किताब  ‘मुमभाई’ साहित्य अकादमी पुरस्कार देने की घोषणा की गई है.

बड़ी-बड़ी मीडिया कंपनियां जैसे आज तक, एबीपी न्यूज़, अमर उजाला ने मंच देकर साहित्य को बढ़ावा दिया है.

इस सबके साथ हम यूट्यूब को नही भूल सकते, क्यूंकि इसके जरिए हिंदी साहित्य के अलग-अलग रूप व्यंग्य, कहानी, कविता पाठ, क्षेत्रीय भाषा की कविता को नया स्वरूप मिला है. शायद यही कारण रहा कि साहित्य अकादमी ने भी यूट्यूब चैनल बना दिया.

अब तो आप सर्च करें, तो हजारों की तादाद में चैनल व वेबसाइट आते हैं. इनको पढ़ने व देखने वालों की संख्या करोड़ों में है. इतना ही नहीं आज सारे बड़े पब्लिकेशन अपनी वेबसाइट लॉन्च कर ई-बुक्स भी छापने की होड़ में हैं.

‘डिजिटलाइजेशन’ वरदान 

भारत में 1995 में इंटरनेट आ गया था, लेकिन कुछ कारणों से उतनी तेजी से नहीं बढ़ सका, जितना तेजी से बढ़ना चाहिए था. भारत में  डिजिटलाइजेशन क्रांति की बात की जाए, तो मौजूदा समय में इसका श्रेय मुख्यत: इंडियन गवर्नमेंट के ‘डिजिटल इंडिया’ अभियान और रिलायंस जियो की धूम को जाता है.

PM Modi Digital India (Pic: Narendrmodi)

इससे हर वर्ग को फायदा मिल रहा है. कहा जा सकता है कि दबे हुए साहित्य को उभारने में ये मददगार साबित हुए हैं.  जश्न-ए-रेख़्ता, जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल, कलिंगा लिटरेचर फेस्टिवल, साहित्य आज तक, अमर उजाला काव्य में उमड़ती भीड़ इसका सजीव उदाहरण है.

डॉ. कुमार विश्वास, चेतन भगत, सुदीप नागरकर के अलावा आज हर सप्ताह में तीन-चार दिन तो यूटूयूब के ट्रेंडिंग में सर्च कीजिए, तो पता चलता है कि कोई ना कोई कविता, कहानी, व्यंग्य ट्रेंड करता है.

आप भूले नहीं होंगे कि हालही में एक युवा उभरते कवि गौरव त्रिपाठी की कविता ‘गालिब हवालात में‘ ट्रेंड करने के साथ-साथ मीडिया सुर्खियों में रही.

इस लिहाज से यह कहना गलत नहीं होगा कि डिजिटलाइजेशन ने वाकई में साहित्य को संवारने का काम किया है.

आज डिजिटल लिटरेचर प्रेम ने भाषा की दीवारें तोड़कर नए मंच पर नया रंग बिखेर रही है. कवि-शायर एक मंच पर एक सुर में गा रहे हैं और हमारा साहित्य आसमां में उड़ान भर रहा है.

Web Title: Digitization and its Impact on Hindi Literature, Hindi Article

Feature Image Credit : ThoughtCo