दुर्योधन महाभारत का एक ऐसा किरदार हुआ, जिसका नाम जेहन में आते ही एक नकारात्मक इंसान की तस्वीर तैरने लगती है.

कई बार उसके कुकर्मों से हमें घृणा तक होने लगती है!

बचपन से लेकर कुरुक्षेत्र के युद्ध तक, दुर्योधन को सिर्फ उसके बुरों कामों के लिए ही जाना गया है.

फिर चाहे द्रौपदी चीर-हरण में उसकी भूमिका रही हो या फिर महाभारत के युद्ध की जमीन तैयार करने में उसकी सक्रियता… इन सबके कारण उसे नफरत ही मिली.

ऐसे में उसके अंदर निहित अच्छाईयों पर हमेशा के लिए पर्दा पड़ गया और वह इतिहास में सबसे बड़े दुराचारी के रूप जाना गया.

किन्तु क्या वह सच में इतना बुरा था, क्या उसके अंदर कोई भी अच्छाई नहीं थी?

आईये जानने की कोशिश करते हैं–

जाति-प्रथा का विरोधी!

दुर्योधन के समय काल में समाज में जाति-पात, छुआ-छूत आदि की जड़ें बहुत मजबूत थीं. उनको तोड़ना तो दूर, उन्हें चुनौती देने के बारे में कोई नहीं सोचता था. ऐसे समय में दुर्योधन ने न सिर्फ इस पर प्रहार किया, बल्कि मजबूती से उसके लिए खड़े हुए.

इस बात को काटने के लिए कहा जा सकता है कि इसमें उसका स्वार्थ निहित था, किन्तु सवाल एक्शन का है और जाति-प्रथा के नासूर का विरोध करने के लिए दुर्योधन को क्रेडिट मिलनी ही चाहिए!

महाभारत के उस दृश्य को याद कीजिए, जब द्रौपदी का स्वयंवर चल रहा था. इस स्वयंवर में एक से बढ़कर एक बड़ा नाम मौजूद था. इन राजकुमारों में पांडव और कौरव के साथ दुर्योधन का सबसे प्रिय मित्र कर्ण भी आया था.

चूंकि कर्ण सूत पुत्र थे, इसलिए वहां मौजूद लोग उन्हें इस प्रतिस्पर्धा के योग्य नहीं मानते थे. यही नहीं उनका इस मौके पर खूब अपमान किया गया. अपने दोस्त कर्ण का यूं उपहास उड़ते देख, दुर्योधन गुस्से से आग बबूला हो गया. उसने, तुरंत कर्ण के पक्ष में खड़े होकर उनका बचाव किया.

इससे पहले कर्ण को दुर्योधन ने अंग देश का राजा तब बनाया था, जब अर्जुन से प्रतिस्पर्धा के सवाल पर कर्ण को अयोग्य घोषित किया जा रहा था. तब जाति-प्रथा का विरोध करते हुए दुर्योधन ने कर्ण की वीरता को प्रमुखता दी थी.

आगे भी वह कई मौकों पर अपने दोस्त कर्ण के साथ खड़े नज़र आए. भले ही इसके पीछे उसके अपने हितों के छिपे होने की बात कहीं जाती हो, किन्तु उसकी इस पहल को सकारात्मक ही कहा जाएगा.

शायद यही कारण था कि कर्ण आखिरी सांस तक दुर्योधन के साथ खड़े रहे, फिर चाहे वह अधर्म का रास्ता ही क्यों न रहा हो.

Duryodhan and Karna (Pic: Mrinal Rai )

प्रतिभा का सम्मान करने वाला

एकलव्य की कहानी सभी ने सुनी होगी, जिसमें वह धनुष विद्या के लिए जब गुरु द्रोण के पास गए तो, उन्होंने उसे शिक्षा देने से मना कर दिया था. असल में वह भीष्म पितामह को दिए गए अपने वचन के लिए प्रतिबद्ध थे, जिसमें उन्होंने वादा किया था कि वह केवल उनके वंश के राजकुमारों को ही अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा देंगे.

बावजूद इसके एकलव्य ने हार नहीं मानी और जंगल में रहते हुए गुरु द्रोण की एक मिट्टी की प्रतिमा बनाई और उसी के सामने धनुष-बाण का अभ्यास करने लगा. समय के साथ-साथ वह बड़े होते गए और धनुष विद्या में परांगत हो गए.

द्रोणाचार्य को जब इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने एकलव्य से गुरु दक्षिणा के तौर अपना अंगूठा भेंट करने के लिए कहा. गुरु द्रोण ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वह नहीं चाहते थे कि कोई उनके पसंदीदा शिष्य, अर्जुन से ज्यादा बेहतर धनुर्धर बने.

दुर्योधन को जब इसका पता चला तो उसे यह बिल्कुल पसंद नहीं आया. उसने द्रोणाचार्य की इस बात का विरोध भी किया था. साथ ही उन्होंने एकलव्य को अपना दोस्त बना लिया था, जो बाद में उनकी सेना में भी शामिल हुए.

Eklavya and Dronacharya (Pic: speakingtree.in)

गदा-युद्ध का महावीर

महाभारत के अंतिम दौर में तय हुआ कि दुर्योधन किसी एक पांडव से युद्ध करेगा. इसमें अगर वह जीतता है, तो समूचे राज्य पर उसका अधिकार होगा. भीम ने इस मौके का फायदा उठाकर दुर्योधन को युद्ध के लिए ललकारा. देखते ही देखते दोनों के बीत द्वंद्व युद्ध शुरू हो गया. कभी भीम दुर्योधन पर भारी पड़ रहे थे, तो कभी दुर्योधन उन पर.

मामला टक्कर का था.

भीम दुर्योधन से अधिक बलवान तो थे, लेकिन दुर्योधन उनकी तुलना में कुशल ज्यादा था. उसके साथ माता गांधारी का वह आशीर्वाद भी था, जिसके अनुसार दुर्योधन का शरीर पत्थर का हो चुका था, सिवाय उसकी जांघ के!

अत: उसे हराना आसान नहीं था.

श्रीकृष्ण इस बात को जानते थे, इसलिए उन्होंने भीम को उनकी प्रतिज्ञा याद दिलाई, जो उन्होंने द्रोपदी के अपमान के समय ली थी. भीम ने श्रीकृष्ण का इशारा समझते हुए दुर्योधन की जांघों पर वार कर दिया. इससे दुर्योधन धराशायी हो गया और बाद में मृत्यु को प्यारा हो गया.

दुर्योधन चाहता तो भीम की तरह गदा युद्ध के नियमों को दरकिनार करते हुए युद्ध जीत सकता था, किन्तु उसने ऐसा न करके उसने गदा-युद्ध के नियमों का पालन किया.

हालांकि, इससे पहले उसने कई बार ऐसे नियमों को तोड़ा था. अभिमन्यु का वध किया जाना इसका बड़ा उदाहरण है.

फिर भी जिस तरह से आखिरी समय में उसने नियमों का सम्मान किया, उसके लिए उसे अच्छा कहना गलत नहीं होगा. अंत में वह हारकर भी जीतने में सफल रहा और उसने खुद को गदा युद्ध का महावीर भी साबित कर दिया.

Gada Yuddha (Pic: quora.com)

इन खूबियों को भी जानिए…

  • कई मामलों में दुर्योधन को भीम से भी ज्यादा ताकतवर माना जाता था. खासकर उसकी मल्लयुद्ध की कला में. कहते हैं कि उनकी इसी कला से प्रभावित होकर श्रीकृष्ण के भाई बलराम ने उन्हें अपना शिष्य बना लिया था और गदा कला के लिए उनको प्रशिक्षित किया.
  • दुर्योधन की एक बड़ी खूबी यह थी कि वह अपने फैसले पर हमेशा मजबूती पर खड़ा रहता था. फिर चाहे वह अनैतिक ही क्यों न हो?
    गौरतलब हो कि द्रौपदी चीरहरण के बाद सभागार में मौजूद सभी लोगों ने अपनी चुप्पी पर सफाई देते रहे, किन्तु दुर्योधन अपनी बात पर अडिग रहा. सही मायने में तो युद्धिष्ठिर ने द्रौपदी को दांव पर लगाकर उससे भी बुरा कृत्य किया था.
  • दुर्योधन को लाख बुरा कहा जाए, किन्तु सच यही है कि उसने अपने हक के लिए लड़ाई लड़ी. उसके मन में यही बात थी कि अंधे होने के कारण उसके पिता धृतराष्ट्र के साथ अन्याय हुआ था. उस अन्याय के प्रतिकार स्वरुप वह गलत मार्ग पर बढ़ता चला गया.
  • दुर्योधन को आंतरिक मन से अच्छा इंसान कहा जाता है. माना जाता है कि अगर उस पर उसके मामा शकुनि का प्रभाव न होता तो, वह बुराई के रास्ते पर न चलता. उसके गुस्सैल स्वभाव और महत्वाकांक्षा को शकुनि ने राजनीतिक ढंग से प्रयोग किया, जिसके कारण सारी कहानी बिगड़ गई थी.
    शायद इसीलिए कहा जाता है कि बुरी संगति में अच्छे से अच्छा इंसान भी बुरा हो जाता है. वह तो फिर दुर्योधन ही था.

Duryodhan (Pic: Quora)

असल में कोई भी इंसान खुद बुरा नहीं होता, उसके कर्म उसे बुरा मना देते हैं. दुर्योधन के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ, जिस कारण वह अपने तमाम अच्छे गुणों के बावजूद एक बुरे इंसान के रूप में देखा जाता है.

वह चाहता तो अपने इन अच्छे गुणों को आगे बढ़ाकर बड़ों की मदद से एक महान राजा बन सकता था, किन्तु दुर्भाग्य से उसने सिर्फ-व-सिर्फ खुद की बुराईयों को ही बढ़ाया.

जाहिर तौर पर हम सभी को इन ऐतिहासिक कहानियों से सीख लेनी चाहिए और खुद को सही दिशा में प्रेषित करना चाहिए.

आप क्या कहेंगे दुर्योधन की अच्छाई और बुराई के बारे में?

Web Title: Good Quality Of Duryodhana, Hindi Article

Feature Image Credit: bhaskar/vkalart/indiatimes