मम्मी… मैं आज खाना तभी खाऊंगा जब आप मेरी थाली में 2-4 रस से भरे रसगुल्ले रखोगी!

याद कीजिए बचपन के वो दिन जब आप सिर्फ रसगुल्ले की खातिर अपने परिवार के सदस्यों से रुसवाई कर लिया करते थे, जब तक आपकी प्लेट में दो चार रसगुल्ले न शामिल हों, आपको खाना अच्छा ही नहीं लगता था.

सच पूछिए तो रसगुल्ला है ही अपने आप में एक लाजवाब मिठाई!

भले ही आपने कितनी ही और मिठाईयां खाईं हों पर रसगुल्ले की मिठास ही ऐसी है कि, इसमें इंसान खुद-ब-खुद घुल जाता है. चाहे रूठों को मनाना हो या फिर किसी त्योहार का जश्न… इस एक मिठाई का इस्तेमाल हर जगह देखने को मिलता है.

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर ये मीठी चीज आई कहां से? भारत में इस मिठाई का उदय कब और कैसे हुआ? आईये ऐसे ही कुछ सवालों के जवाब जानने की कोशिश करते हैं–

पुर्तगाल से आया रसगुल्ला?

रसगुल्ले के इतिहास को लेकर कई तरह की भ्रातियां हैं. किसी का कहना है कि रसगुल्ले का उदय ओडिशा में हुआ. किसी का कहना है कि बंगाल के एक शख्स ने इस मिठाई को बनाया. तो वहीं एक पक्ष ये मानता है कि पुर्गताल से भारत आए लोगों ने इस मिठाई का आविष्कार किया.

इतिहासकारों की मानें तो जब वास्को-डी-गामा भारत आया उसके बाद से लगातार पुर्तगाली यहां आते रहे. पहले उन्होंने समुद्र तटीय इलाकों पर अपना कब्जा कायम किया. इसके बाद वो बंगाल तक फैल गए और उन्होंने अपना प्रभाव शब्दों से लेकर व्यंजनों तक में छोड़ा.

कहा जाता है कि पुर्तगाली खाने की वस्तुएं बहुत पसंद करते थे. वो उबलते हुए दूध में सिट्रिक एसिड डालकर फ्रेश कॉटेज चीज बनाया करते थे. इसी का असर हुआ कि हलवाइयों को इससे एक तकनीक मिली और वो इसका इस्तेमाल मिठाई बनाने में करने लगे. दूध को फाड़कर उसे छेने में तब्दील करना और फिर उसे चासनी में डालकर उसे मीठी कर देना… यही वह ‘क्रांतिकारी’ तकनीक थी.

इस तरह रसगुल्ले को बनाना शुरु किया गया!

वहीं बंगाल में कोलंबस ऑफ रोसोगुल्ला के नाम से प्रसिद्ध नोबिन चंद्रा के पड़पोते अनिमिख रॉय का कहना है कि रसगुल्ला उनके दादा ने ही बनाया था. रसगुल्ले को बनाने की विधि उन्होंने विदेशियों से सीखी थी. ऐसा मानते हैं कि 18वीं सदी में बंगाल में मौजूद पुर्तगाल उपनिवेशवादियों ने छेने से मिठाई बनाने का तरीका सोचा और तभी से बंगाल में रोसोगुल्ला वजूद में आया.

बाद में धीरे-धीरे करके इसका प्रचलन बढ़ता चला गया.

Portugal Come With Rasgulla (Representative Pic: greenfreshshop)

बंगाल-ओडिशा के बीच फंसा रसगुल्ला!

अगर इतिहास के पन्नों को पलट कर देखें तो ऐसा भी मालूम होता है कि रसगुल्ला आज से 700 साल पहले वजूद में आया. जब भगवान जगन्नाथ ने लक्ष्मी देवी को मनाने के लिए इस मिठाई को उनके सामने पेश किया.

दरअसल, देवी लक्ष्मी भगवान जगन्नाथ से इसलिए नाराज हुईं कि वो अपने साथ उनको रथ-यात्रा पर नहीं लेकर गए. बाद में जब भगवान जगन्नाथ रथ-यात्रा से वापस अपने मंदिर लौटे तो लक्ष्मी देवी ने नाराजगी के कारण मंदिर का दरवाजा नहीं खोला. इसके चलते उन्हें मनाने के लिए भगवान जगन्नाथ ने उन्हें रसगुल्ला भेंट किया. तभी से यह परंपरा चली आ रही है.

वहीं कुछ लोग मानते हैं कि ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर के पंडित ने देखा कि गांव में दूध की बर्बादी हो रही है तो उसके मन में ये विचार आया कि क्यों न लोगों को छेना बनाना सिखाया जाए… ताकि इसकी बर्बादी पर लगाम लग सके. इसी के तहत उन्होंने यहां के लोगों को छेना निकालना सिखाया और फिर बाद में रसगुल्ला बनाना.

बाद में ओडिशा रसगुल्ले का गढ़ बनता चला गया.

वहीं बंगाल के लोग इसे नकारते हैं!

उनका कहना है कि भगवान को ऐसी चीज पेश ही नहीं की जा सकती जो कि शुद्ध न हो. क्योंकि छेने को दूध फाड़कर बनाया जाता है, इसलिए इसे शुद्ध नहीं कहा जाता. साथ ही भगवान कृष्ण के 56 भोग में भी रसगुल्ले का कहीं जिक्र नहीं मिलता. कृष्ण जी के भोग में दूध, दही, घी, मक्खन आदि का जिक्र है पर रसगुल्ले का नहीं.

बंगाल के लोग रसगुल्ले को अपना बताते हैं. उनका कहना है कि भले ही विदेशियों ने उन्हें आकर इस मिठाई को बनाना सिखाया, लेकिन इसका अस्तित्व यहीं से है.

बंगाल के लोग नवीन चंद्र को रसगुल्ले बनाने का श्रेय देते हैं.

एक कहानी जो बहुत दिलचस्प है वो ये कि प्रसिद्ध लेखक रविन्द्र नाथ टेगौर को रसगुल्ला बेहद पसंद था.

वह जब भी बाग बाजार के डॉक्टर पशुपति भट्टाचार्य से मुलाकात के लिए जाते, तो डॉक्टर उनके लिए रसगुल्ले लेकर आते. एक दिन नवीन चंद्र की दुकान पर रसगुल्ले खत्म हो गए, सो डॉक्टर साहब किसी और दुकान से रसगुल्ला खरीदकर रविन्द्र नाथ के पास ले गए. किन्तु, जब उन्होंने रसगुल्ला खाया तो वह तुरंत ही जान गए कि यह कहीं और से लिया गया है.

हाल ही में बंगाल और ओडिशा के बीच रसगुल्ले की लड़ाई में बंगाल को जीत मिली है. रसगुल्ले को बंगाल की डिश माना गया है. बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने इसे लेकर खुशी भी जाहिर की थी.

उन्होंने इसे बंगाल के लिए मीठी खुशखबरी बताया था.

एक रसगुल्ले के ‘कई नाम’

एक दिलचस्प कहानी जो रसगुल्ले को लेकर काफी चर्चा में रही है, वह ये कि भगवान दास बागला नाम का एक व्यापारी, जो कलकत्ता का रहने वाला था… उसने इस मिठाई को साथ लेकर पूरे भारत की सैर की और इसके बाद हर जगह इसका स्वरुप बदलता चला गया.

राजस्थान में रसगुल्ला रसबरी बना तो उत्तर प्रदेश में इसे राजभोग के नाम से जाना जाने लगा. वाराणसी में इसे रसमलाई कहा जाता है. वहीं मध्य प्रदेश के कई इलाकों में इसे छेना कहकर ही पुकारा जाता है.

Gulab Jamun (Pic: Giftalove)

खैर इसे लेकर भले ही कितनी लड़ाईयां क्यों न लड़ी गई हों पर इसकी मिठास में आज तक कोई कमी नहीं आई है. बल्कि इसकी बिक्री में बढ़ोतरी ही देखने को मिली है. आज के दौर में हर घर में बच्चों की पसंद अगर कोई मिठाई है तो वो है रस और मिठास से भरा रसगुल्ला !

तो आप भी अपनों के साथ इसे खाकर रिश्तों के बीच की मिठास बढ़ाइए.

और हाँ! इससे सम्बंधित अगर कोई रोचक याद हो तो उसे कमेन्ट-बॉक्स में अवश्य शेयर करें!

Web Title: History of Rasgulla, Hindi Article

Feature Image Credit: MSK