महाभारत में युधिष्ठर, अर्जुन और दुर्योधन जैसे मुख्य किरदारों से अलग कई सारे ऐसे किरदार हुए जिनकी कहानी एकदम रोचक और रहस्यमयी रही.

अम्बा इसका एक बड़ा उदाहरण है!

चूंकि, उनके बारे में कहा जाता है कि वह महाभारत की कहानी में आरंभ से अंत तक किसी न किसी रूप में मौजूद रहती थीं.

ऐसे में उनको नजदीक से जानना बेहद ही दिलचस्प होगा–

काशी नरेश की पुत्री थीं अम्बा

काशी नरेश ने अपनी तीन पुत्रियों अम्बा, अंबिका और अम्बालिका के स्वयंवर का आयोजन किया था. उसी बेला में हस्तिनापुर के युवा राजकुमार देवव्रत (जो कालांतर में भीष्म पितामह के रूप में ख्यात हुए) ने अदम्य साहस दिखाते हुए तीनों राजकुमारियों को जीत कर सबको हैरान कर दिया.

ये एक ऐतिहासिक घटना थी, जिसमें बीच स्वयंवर से राजकुमारियों का एक तरह से अपहरण हुआ था. राजकुमारियों को कुछ समझ आता उससे पहले वे तीनों हस्तिनापुर में थीं. देवव्रत ने उनके सामने अपने सौतेले भाइयों चित्रांगद और विचित्रवीर्य से शादी करने का प्रस्ताव रखा तो वे चौंक गईं.

भयाक्रांत अंबिका और अम्बालिका ने चित्रांगद और विचित्रवीर्य से शादी कर ली. वहीं, अम्बा ने हिम्मत दिखाते हुए शाल्व नरेश के प्रेम में होने की बात प्रकट की.

उसकी बात का सम्मान करते हुए देवव्रत ने अम्बा को शाल्व नरेश को सौंपने का फैसला किया था.

Amba in Mahabharat (Representative Pic: hotstar)

नियति को कुछ और ही मंजूर था…

शाल्व नरेश ने अपहृत अम्बा को अपनाने से इनकार कर दिया. अपमानित अम्बा ने देवव्रत के पास आकर अपनी मजबूरी बताई. अम्बा की हालत ऐसी थी कि वो अब न तो काशी जा सकती थी और न ही शाल्व नरेश ने उसे कबूल किया. ऐसे में देवव्रत से शादी करना ही उसके पास अंतिम और एकमात्र विकल्प बचा था.

इधर, देवव्रत भी अपनी प्रतिज्ञा में बंधे थे और उन्होंने अम्बा से शादी करने से मना कर दिया. इसके बाद अम्बा ने एक ऐसी प्रतिज्ञा  ली, जिसको सुनकर देवव्रत हिल गए!

अम्बा की ‘अटल-प्रतिज्ञा’

असल में अम्बा पहले अपहरण, और फिर प्रेमी के ठुकराए जाने पर अपमानित महसूस कर रही थीं. जब देवव्रत ने शादी से मना किया तो उसके सामने आख़िरी विकल्प भी दम तोड़ चुका था. उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर वह करे तो क्या करे. वह मन ही मन खुद को कोसती रही.

उसने कुपित होकर देवव्रत को दंडित करने की ठानी और क्रोधित अम्बा ने प्रतिज्ञा लिया कि वही भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगी.

न्याय दिलाने हेतु सामने आये भगवान परशुराम

अम्बा के साथ हुए अन्याय को देखकर देवव्रत के गुरु भगवान परशुराम क्रोधित हो गए और उन्होंने अम्बा को न्याय दिलाने की ठानी. इसके बाद गुरु-शिष्य में ही युद्ध शुरू हो गया. कहा जाता है कि 23 दिन तक लगातार युद्ध होता रहा, लेकिन कोई नहीं जीता.

कहते हैं कि इनके युद्ध को आकाश से देवतागण भी देख रहे थे. दोनों के पास दिव्य शक्तियां थी और इससे सभी चिंतित भी थे. लगातार युद्ध से देवव्रत का धैर्य जवाब देने लगा था. ऐसी स्थिति में 24वें दिन देवव्रत ने महाभयंकर प्रस्वापास्त्र अस्त्र चलाने की ठानी, लेकिन नारद जी ने ऐसा करने से उन्हें रोक दिया.

इस तरह गुरु-शिष्य के इस युद्ध को विराम मिल गया, लेकिन अम्बा का क्रोध शांत न हुआ. वह प्रतिशोध की ज्वाला में जलती रहीं. बहरहाल, वह उस समय कुछ नहीं कर सकती थीं, इसलिए गुस्से का कटु घूंट पीकर वहां से चली गईं.

इस घटना के बाद अम्बा एकदम से टूट गई और यमुना तट पर घोर तप शुरू कर दिया. अंततः उसने वहीं अपना शरीर त्याग दिया.

Parshuram and Bhishma (Representative Pic: plus.google.com)

बदला लेने को लिया फिर से जन्म

मृत्यु के बाद अम्बा ने वत्सदेश के राजा की कन्या के रूप जन्म धारण किया. इस जन्म में भी उसे पूर्वजन्म की सारी बातें पूरी तरह से याद थीं और उसने फिर से भीषण तप शुरू कर दिया और शिव से देवव्रत को पराजित करने का वर मांग लिया.

शिव के वरदान के अनुसार, अम्बा फिर से जन्म धारण कर देवव्रत से अपना प्रतिशोध ले सकेंगी. साथ ही कन्या रूप में जन्म लेने के बाद युवा होने पर वह पुरुष का रूप ले लेगी. इस वरदान के चलते वह देवव्रत को युद्ध के लिए ललकार सकती थीं.

उधर, देवव्रत स्त्री से युद्ध न करने के अपने प्रण में बंधे थे.

भीष्म ने खुद ही ‘लीक की जानकारी’

महाभारत युद्ध में भीष्म कौरवों के सेनापति थे और पांडवों की सेना पर लगातार प्रहार कर रहे थे. श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उन्हें रोकने भेजा, लेकिन अर्जुन भीष्म पितामह से लड़ने में झिझक रहे थे. जब श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया, तो भी कोई परिणाम नहीं निकला.

भीष्म के आगे अर्जुन की एक न चल रही थी.

अर्जुन ने थककर श्रीकृष्ण से भीष्म पितामह को हराने का उपाय पूछा. श्रीकृष्ण ने कहा, भीष्म स्वयं ही बता सकते हैं कि आखिर उन्हें कैसे पराजित किया जाए.

इसी कड़ी में सूर्यास्त होने पर युद्ध विराम होते ही श्रीकृष्ण अर्जुन के साथ पितामह के शिविर में मिलने पहुंचे. वहां उन्होंने खुद भीष्म से उन्हें पराजित करने के उपाय पूछे.

भीष्म पितामह ने धर्म का पक्ष जानकर शिखंडी के बारे में सविस्तार बताया.

और शिखंडी बना भीष्म का काल

दरअसल, अम्बा इस तीसरे जन्म में राजा द्रुपद के यहां पुत्री रूप में जन्म लिया और बाद में युवा होने पर पुरुषत्व को प्राप्त कर लिया था.

बताते चलें कि महाभारत में भीष्म पितामह कौरवों की तरफ से लड़ रहे थे. चूंकि, वे एक अजेय योद्धा थे, इस कारण पांडवों के लिए चिंता का विषय बने हुए थे. वह उस उपाय की खोज में थे, जिसकी मदद से भीष्म पितामह को रोका जा सके!

अंततः शिखंडी को अर्जुन के साथ भीष्म पितामह को चुनौती देने भेजा गया.

चूंकि, शिखंडी ने द्रुपद नरेश के यहां पुत्री रूप में जन्म लिया था और जन्म से स्त्री शिखंडी के सामने भीष्म शस्त्र नहीं उठा सकते थे. उनके आदर्श उनको ऐसा करने की इजाजत नहीं दे रहे थे. यही कारण रहा कि युद्ध स्थल में भीष्म पितामह ने अपने हथियार डाल दिए.

फिर अर्जुन ने इसका फायदा उठाकर भीष्म पितामह पर बाणों की वर्षा शुरू कर दी. परिणाम यह रहा कि शीघ्र ही भीष्म बाणों की शैया पर लेट गए और कराहने लगे. असह्य पीड़ा होने के बावजूद भीष्म इच्छा मृत्यु के कारण बचे रहे.

हालांकि बाद में युद्ध की समाप्ति तथा हस्तिनापुर की स्थिरता को देखने के बाद उन्होंने मृत्यु का वरण कर लिया था. इस तरह अम्बा भीष्म की मृत्यु का कारण बनकर अपने प्रतिशोध को पूरा करने में सफल रही.

The Shikhandi Revenger (Representative Pic: VachalenXEON)

तो यह थे महाभारत के किरदार अम्बा से जुड़े कुछ पहलू. अगर आपके पास भी उनसे जुड़ी कोई जानकारी है, तो नीचे दिए कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं.

Web Title: Interesting Story of Amba in Mahabharat, Hindi Article

Featured Image Credit: Hinduismnow.org