महाभारत के बारे में कहा गया है कि इसकी महिमा हिन्दू-दर्शन के चारों वेदों से भी अधिक है. मतलब अगर तराज़ू के एक पलड़े पर आप ऋग्वेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद और सामवेद रखें और दूसरे पलड़े में महर्षि वेदव्यास रचित ‘महाभारत’ तो अकेले ही यह महान साहित्य बाकी सब पर भारी पड़ेगा.

जाहिर तौर पर मानवीय-मूल्यों के विभिन्न पक्षों को एक जगह पर समाहित करने के कारण ही महाभारत की प्रासंगिकता बनी हुई है. पर दर्शन के इस महान ग्रंथ की नींव आखिर कहाँ पड़ी…?

थोड़ा और स्पेसिफाई करें तो महाभारत की मुख्य कहानी, यानी कौरव-पांडव युद्ध का एंगल कहाँ से उत्पन्न हुआ था?

चूंकि, महाभारत को आदर्श चरित्रों से भी जोड़कर देखा जाता रहा है. महारथी भीष्म से लेकर गांधारी, द्रोण, कर्ण, युधिष्ठिर और तमाम अन्य चरित्रों ने आदर्श मूल्यों को कहानी में कई जगह साबित भी किया है. पर इसके विपरीत, अन्याय के तमाम उदाहरण भी इसी ग्रंथ में निहित हैं!

आखिर इस अन्याय की शुरूआत का बीज तो कहीं न कहीं अवश्य ही पड़ा होगा. आइये, चलते हैं महागाथाओं के सागर ‘महाभारत’ के इस अध्याय की ओर –

महाराज शांतनु का प्रेम-रोग

यूं तो महाभारत में प्रेम के कई चेप्टर हैं, किन्तु महाराज शांतनु के प्रेम-अध्याय का कोई तोड़ नहीं! संभवतः महाभारत काल के वह एकमात्र ऐसे प्रेमी नज़र आते हैं, जिन्होंने अपनी प्रेमिकाओं, जो बाद में उनकी पत्नियां भी बनीं… उनकी तमाम शर्तें सर हिलाकर, बिना परिणामों की चिंता किये मान लीं. थोड़ा बहुत उनके मन द्वारा सद्विचार किये जाने का भी उल्लेख अवश्य नज़र आता है, किन्तु उनका प्रेम, असाध्य प्रेम-रोग में बदल जाता था.

इस कड़ी में पहला प्रसंग आता है शांतनु-गंगा प्रेम का. गंगा किनारे टहलते समय शांतनु की मुलाकात गंगा से होती है और यह मुलाकात जल्द ही प्रगाढ़ता में बदल जाती है. हालाँकि, उस प्रेम-प्रगाढ़ता के पीछे कुछ शर्तें होती हैं और उन शर्तों के मुताबिक शांतनु अपनी प्रेमिका गंगा से कुछ भी प्रश्न नहीं पूछ सकते थे!

तब भी नहीं, जब गंगा ने अपने सात पुत्रों को जन्म लेते समय नदी में बहा दिया. ज़रा गौर कीजिये, किसी व्यक्ति का प्रेम-रोग कितना असाध्य रहा होगा कि उसके एक-एक करके सात पुत्र मृत्यु के घाट उतार दिए गए और उसकी ज़ुबान पर सिर्फ इसलिए कोई बोल नहीं फूटा, क्योंकि इससे उसकी प्रेमिका छोड़ कर जा सकती थी!

सच कहा जाए तो आदर्श महाभारत का यह पहला बड़ा अन्याय था, जो नज़र आ रहा था. चूंकि, इसके पीछे आशीर्वाद और शॉप की कहानी थी, इसलिए इसे अन्याय के रूप में नहीं देखा गया.

पर इससे महाराज शांतनु की कमजोरी तो नज़र आयी ही, जिसने बाद में भयंकर रूप धारण कर लिया.

Holi Ganga and King Shantanu. (Pic: detechter)

सत्यवती द्वारा महाराज शांतनु की कमजोरी पर ‘बड़ा प्रहार’

जब गंगा अपने आठवें पुत्र को भी नदी में बहाने ले जा रही थीं, तभी महाराज शांतनु ने अपना वचन-भंग कर दिया और गंगा से पूछ लिया कि ‘वह अपने ही बच्चों की हत्या क्यों कर रही हैं’? वह आठवां बच्चा कालांतर में भीष्म पितामह के नाम से विख्यात हुआ. इस बीच वचन-भंग के कारण शांतनु को छोड़कर गंगा अपने लोक जा चुकी थीं.

कुछ समय बाद महाराज शांतनु का प्रेम फिर पनपा और इस बार उन्होंने ‘मछुआरन’ सत्यवती को अपना हृदय सौंप दिया. तत्कालीन समय में यह कोई बड़ा मुद्दा नहीं था, किन्तु सत्यवती ने उस शांतनु की कमजोरी पकड़ ली थी, जिसने पूर्व में अपने सात बच्चों की हत्या पर मौन धारण कर रखा था.

तत्पश्चात सत्यवती (कई जगहों पर सत्यवती के पिता मल्लाहराज का उल्लेख भी आता है) द्वारा हस्तिनापुर राज्य पर अधिकार की मांग की गयी. हालाँकि, महाराज शांतनु द्वारा इस शर्त को मानने से इंकार ज़रूर किया गया, पर उनका हृदय उनके पास से निकलकर सत्यवती के कब्ज़े में जा चुका था.

इसके बाद महाराज का गंभीर रूप से बीमार पड़ना और तत्पश्चात गंगा-पुत्र देवब्रत द्वारा आजन्म ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा से हम सब वाकिफ़ हैं.

राज्य पर अपने अधिकार को सुनिश्चित करा कर सत्यवती अपनी शर्तों को मनवा चुकी थीं, किन्तु इस प्रेम के कारण योग्य भीष्म का अधिकार उन्हें दिया जा चुका था, जिसका अभी जन्म ही नहीं हुआ था! और तो और भविष्य के उत्तराधिकारियों की रक्षा करने का प्रण इच्छा-मृत्यु का वरदान प्राप्त कर भीष्म करने को वचनबद्ध हो गए थे.

समझा जा सकता है कि प्रेम के कारण ही महाभारत में अन्याय करके उस अन्याय का रक्षण करने की नींव यहीं से पड़ी.

इससे पहले तो हस्तिनापुर के राजा भरत ने अपने पुत्रों को दरकिनार सिर्फ इसलिए कर दिया था, क्योंकि वह योग्य नहीं थे. उसकी बजाय उन्होंने भारद्वाज पुत्र को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया था.

Satyawati and Shantanu. (Pic: wattpad)

और होते गए ‘अन्याय पर अन्याय’…

यह तो सिर्फ नींव थी, बाद में अन्याय करने की एक परंपरा सी चल पड़ी. उस अन्याय को ‘रक्षण’ प्राप्त था, अजेय महारथी भीष्म का. आज के आधुनिक युग में भी अगर किसी छोटे बच्चे को पता हो कि कानून तोड़ने के बाद उसे कोई सजा नहीं मिलेगी, क्योंकि उसके गार्जियन बेहद पावरफुल हैं तो सहज ही वह कानून के प्रति लापरवाह हो जायेगा.

सत्यवती के पुत्र चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य के सन्दर्भ में भी हमें कुछ ऐसा ही देखने को मिलता है. वह दोनों हर तरह से अयोग्य साबित हुए. चित्रांगद गंधर्वों के हाथ एक लड़ाई में मारे गए तो विचित्रवीर्य काम-वासना से ग्रसित होने के कारण असाध्य रोग से पीड़ित हो गए.

अंततः वह मृत्यु को प्राप्त हो गए.

इस बीच महारथी भीष्म द्वारा चित्रांगद एवं विचित्रवीर्य के लिए कशी नरेश की पुत्रियों अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका का अपहरण करने का अनोखा कृत्य किया गया. हालाँकि, उस समय अपने बल पर राजकुमारियों को जीतने की परंपरा ज़रूर थी, किन्तु जो यह बल प्रदर्शित करता था, उसी की शादी राजकुमारियों से होती थी.

भीष्म ने इस मामले में नयी परम्परा का सूत्रपात किया और किसी अयोग्य के लिए राजकुमारियों का बलपूर्वक अपहरण किया. इसी अन्याय से भीष्म की मृत्यु का बीज भी पड़ा, जब राजकुमारी अम्बा ने अपने अपमान का बदला लेने की ठानी.

फिर उसके बाद धृतराष्ट्र-युग का आगमन हुआ और उस युग में तो कदम-कदम पर अन्याय हुआ और उसका रक्षण न केवल पितामह भीष्म, बल्कि आचार्य श्रेष्ठ द्रोण, महादानी कर्ण जैसे योद्धाओं ने किया.

Bhishma son of Ganga. (Pic: scoopwhoop)

पर वास्तव में अन्याय और उसके रक्षण-परम्परा की नींव में एक प्रेम-कहानी ही तो थी!

या फिर आपकी नज़र में इसका कारण कुछ और था?

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Web Title: Mahabharata: A Mythological Love Story of Holi Ganga and King Shantanu, Satyawati, Hindi Article

Featured Image Credit: Sadhguru