‘तलवार से ज्यादा ताकतवर एक कलम होती है!’

यह बात बिलकुल ठीक लगती है जब हम ‘महाश्वेता देवी’ के बारे में पढ़ते हैं. उन्होंने अपनी कलम के जरिये जाति भेदभाव, शोषण और आदिवासियों के मुद्दे को लोगों के सामने रखा.

उन्होंने घर की चारदीवारी में अपना लेखन नहीं किया बल्कि ज़मीनी तौर पर लोगों के पास जाकर उनके दुःख को उकेरा.

वो कहती थीं कि ‘असली इतिहास तो आम आदमी द्वारा ही लिखा जाता है’. वह समाज के निचले तबके की आवाज बनकर उभरीं. ऐसे में उनके बारे में जानना दिलचस्प रहेगा.

जानते हैं, अपने नायाब लेखन के लिए प्रसिद्ध महाश्वेता देवी के बारे में-

महाश्वेता का जन्म ही एक लेखक परिवार में था हुआ

महाश्वेता देवी का जन्म 1926 में ढाका में हुआ था. भारत विभाजन के बाद उनका परिवार भारत आ गया था. उनके माता-पिता भी लेखक थे.

उनके पिता मनीष घटक कल्लोल आन्दोलन से जुड़े रहे थे. यह बंगाली साहित्य आन्दोलनों में प्रभावशाली रहा था. उनकी माता धरित्री देवी भी एक लेखिका और समाज सेविका थीं.

उन्होंने कलकत्ता यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में एमए किया था. शांति निकेतन में उनके ऊपर रबीन्द्रनाथ टैगोर के विचारों ने बहुत प्रभाव डाला. आगे चलकर, साल 1948 में उन्होंने बिजोन भट्टाचार्य से शादी की. जो कि इंडियन पीपल्स थिएटर असोसिएशन के संस्थापकों में से एक हैं.

उनकी शादी लगभग एक दशक बाद ही टूट गयी. उन्होंने अपने पति से साल 1959 में तलाक़ ले लिया. उनका और बिजोन का एक पुत्र हुआ.

बताते चलें, उनका बेटा नाबरून भट्टाचार्य भी एक लेखक ही हैं. आज उन्हें बंगाली साहित्य का एक बहुत बड़ा नाम माना जाता है.

Mahasweta devi, A Notable Bengali Writer (Pic: thenewyorktime)

हमेशा उकेरा समाज के शोषित वर्ग का दर्द

महाश्वेता देवी जी का नाम शीर्ष बंगाली लेखकों में लिया जाता है. महादेवी फिक्शन और अपनी राजनीतिक लेखों के द्वारा समाज में व्याप्त कई बुराइयों पर कटाक्ष करती रहीं.

1964 में उन्होंने बिजोयगढ़ कॉलेज में पढ़ाना शुरू कर दिया. उस समय यह कॉलेज कामकाजी महिलाओं को पढ़ाया करता था. इस दौरान, वह एक पत्रकार और रचनात्मक लेखक भी थीं.

अपने लेखन की वजह से ही आज भी उनका नाम लोगों की ज़ुबान पर रहता है. वह उपन्यास लघु कथाएं, बाल कहानियाँ, नाटक इत्यादि लिखा करतीं.

महाश्वेता देवी सिर्फ अपने राजनीतिक लेखों के लिए ही नहीं पहचानी गयीं. बल्कि जो मुद्दे उन्होंने अपने कलम के जरिये उठाये थे, उसके लिए भी जानी गईं.

उन्होंने पूर्वी भारत के भूमिरहित मजदूरों के लिए अपनी आवाज बुलंद की थी. इस विषय पर उन्होंने सालों तक काम किया.

माना जाता है कि देवी का इस गरीब समुदाय से रिश्ता ही कुछ ऐसा गहरा हो गया था. उनसे बेहतर उनके दर्द को कोई नहीं समझ सकता था.

उन्होंने अपने लेखन में इस मुद्दे को सारी ज़मीनी हकीकत से जोड़ते हुए लिखा. जिसकी वजह से वह समाज के पिछड़े वर्ग की आवाज के तौर पर भी उभर पाईं.

Mahasweta Devi was Also A Social Activist (Pic: deccanchronicle)

‘रानी लक्ष्मीबाई’ पर लिखी अपनी पहली किताब

महाश्वेता देवी के लेखन जीवन को अगर हम जानने की कोशिश करें तो, उन्होंने अपनी पहली किताब एक महिला पर ही लिखनी शुरू की थी. यह कोई और नहीं बल्कि ‘रानी लक्ष्मीबाई’ थीं.

देवी ने रानी लक्ष्मीबाई की जीवनी पर किताब लिखी. इस विषय में कम जानकारी मौजूद होने के बावजूद उन्होंने इस पर ज्यादा से ज्यादा जानकारी हासिल की.

अपने मित्रों की मदद से उन्होंने संग्रहालयों में जाकर इस पर पूरी रिसर्च की. इसके अलावा, उन्होंने लोगों से मौखिक रूप से प्राप्त हुई कहानियों को भी सुना. इस पर गहनता से रिसर्च करने के बाद उन्होंने अपनी पहली किताब लिखी.

महाश्वेता देवी ने महज 13 साल की उम्र से ही लिखना शुरू कर दिया था. लेकिन, उन्हें एक असली पहचान तीस वर्ष की उम्र में ही मिली. इसी दौरान उनकी पहली पुस्तक प्रकाशित हुई थी.

रिक्शावाले का वो सवाल और महाश्वेता देवी का….

महाश्वेता के लेखन की पहुंच जमीनी लोगों तक थी. इससे जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा भी है. दरअसल, एक बार एक रिक्शावाले ने उनसे आकर पूछा कि ‘जिजीविषा’ (जीने की इच्छा) का अर्थ क्या है. वह उनकी लिखी हुई किताब पढ़ रह था, जिसमें उसे इसका मतलब नहीं समझ आया.

देवी उस रिक्शावाले के उत्साह को देखकर बहुत खुश और हैरान भी हुईं. इसके बाद उन्होंने उसे अपने साथ काम करने का निमंत्रण भी दिया. उन्होंने उसे तिमाही मैगज़ीन ‘बोर्तिका’ में काम करने के लिए बुलाया. इससे पहले वो एक नक्सली थे. इस दौरान जब वह जेल में भी गए थे तब उन्होंने पढ़ना-लिखना सीखा.

यह रिक्शावाला कोई और नहीं बल्कि मनोरंजन ब्यापारी हैं, समय के साथ वह बंगाल के प्रसिद्ध दलित लेखक बन गए. उन्होंने 100 लघु कथाएं, 9 उपन्यास लिखे, जो दलितों पर आधारित रहीं

Mahasweta Devi Was A Winner Of Magsaysay Award (Pic: thewire)

एक्टिविज्म के लिए मिला था ‘पद्म श्री’

महाश्वेता देवी का लेखन इसलिए भी खास है क्योंकि उन्होंने हमेशा भावनाओं को का इस्तेमाल नहीं किया.

बल्कि उन्होंने अपने वाकई में जिए हुए अनुभवों को सटीकता से अपने लेखन में लिखा. उन सभी अनुभवों को लिखा, जो हाशिये पर अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे.

उनकी भाषा शैली बहुत आसान है, खासकर की इतने गहन मुद्दों को वो बहुत आसानी लोगों के सामने पेश करती हैं. यह बिलकुल सराहनीय है.

अपने उपन्यास द्वारा उन्होंने सामाजिक संस्थाएं, परम्पराओं, सत्ता, पॉवर आदि पर बखूबी से उकेरा है. 

उनकी प्रसिद्ध लघु कथा ‘द्रौपदी’ के जरिये उन्होंने आदिवासी महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार और उसके बाद भी उनके शोषण को जारी रखने के घिनौनेपन पर लिखा. ‘1084 की माँ’ उनकी प्रमुख उपन्यासों में से एक है. इस उपन्यास पर फिल्म भी बनी है.

अपने किये हुए काम के लिए उन्हें ‘सबरों की माता’ के रूप में भी जाना गया. झंसिर रानी, हजार चुरासिर माँ, अरंयेर अधिकार और रुदाली 

उन्होंने साल 1984 में अपना टीचिंग करियर पूरी तरह से छोड़ दिया.

महाश्वेता देवी को पद्मश्री पुरस्कार से भी नवाजा गया. ख़ास बात ये है कि उन्हें यह अपने लेखन के लिए नहीं बल्कि अपने एक्टिविज्म के लिए मिला. उन्होंने पश्चिम बंगाल के पुरुलिया और मेदिनीपुर के आदिवासियों के लिए सक्रियता से काम किया.

इसके अलावा, उन्हें 1996 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया. उन्हें साल 1997 मैगसेसे पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया. साथ ही, उन्हें साहित्य कला अकादमी पुरस्कार से भी नवाजा गया. इसी प्रकार उन्हें बहुत से पुरस्कार मिले. 

Mahasweta Devi's (Pic: socialnews)

महाश्वेता देवी ने अपना पूरा जीवन गरीब असहायों के हक के लिए लिखा और लड़ाई की. उन्होंने 18 जुलाई. 2016 में अपनी आखिरी सांस ली. लेकिन वह अपना नाम हमेशा के लिए इतिहास में दर्ज कर चुकी हैं.

Web Title: Mahsweta Devi: A Writer Who Did Movements By Her Pen, Hindi Article

Feature Image Credit: thequint