मेरे पड़ोस में अगर कोई औरत हर रोज़ अपने खाविंद से मार खाती है. फिर उसके जूते साफ़ करती है. तो मेरे दिल में उसके लिए जरा सी भी हमदर्दी पैदा नहीं होती. किन्तु, जब मेरे पड़ोस में कोई औरत अपने खाविंद से लड़कर, सिनेमा देखने चली जाती है और उसके खाविंद को मैं परेशानी में देखता हूं, तो मुझे दोनों से एक अजीब-गरीब किस्म की हमदर्दी पैदा हो जाती है...

ऊपर लिखी ये पंक्तियां बताती हैं कि जिसने भी इसे लिखा होगा, उसका नज़रिया बनी-बनाई लीक से बिल्कुल अलहदा रहा होगा. एक हद तक यह सच भी है...ये नज़रिया था बदनाम अफ़सानानिगार सआदत हसन मंटो का.

वही, अफ़सानानिगार सआदत हसन मंटो, जो आज की दुनिया में मंटो के नाम से जाने जाते हैं. आज के दौर में जब उनकी कहानियों का जिक्र आम हो चला है, तब उनकी निजी जिंदगी से जुड़े पहलुओं को जानना दिलचस्प होगा-

भारत में जन्म, अब्दुल बारी आलिग के बने शागिर्द

20वीं के शुरुआत की बात है. हिन्दी और उर्दू अदब काफी कुछ लिखा-पढ़ा जा रहा था. उसी दौर में पंजाब के एक छोटे से गांव समराला में रहने वाले कश्मीरी मूल के मौलवी गुलाम हुसैन के घर 11 नवंबर 1912 को एक बच्चे का जन्म होता है.

यही बच्चा आगे जाकर सबसे ‘बदनाम’ राइटर ‘मंटो’ बनता है!

शुरुआती दौर में अदब से उनका बहुत लगाव नहीं था. लिटरेचर से उनकी नजदीकी बढ़ती है 30 के दशक के बाद.  वह भी तब जब उनकी मुलाकात उस समय के प्रख्यात विद्वान अब्दुल बारी आलिग से होती है.

आलिग उन्हें रूसी व फ्रेंच साहित्य पढ़ने को कहते हैं. मंटो भी उनकी सलाह को मानते हुए विदेशी साहित्य को करीब-करीब घोलकर पी जाते हैं. हालांकि, शुरू में वह लिखते कम और अनुवाद ज्यादा करते थे. उन्होंने फ्रेंच व रूसी साहित्य की कई किताबों का उर्दू में तर्मुजा किया. बाद में वह लुधियाना से निकलने वाले एक अखबार मसावत से जुड़ गए.

यही नहीं, उन्होंने लिटरेचर पढ़ने के लिए अलीगढ़ मुसलिम यूनिवर्सिटी में दाखिला भी ले लिया.

उनके अदबी करियर को परवाज तब मिला, जब 1934 के आसपास ही प्रगतिशील लेखक संघ के साथ उनका राब्ता हुआ. इसी कड़ी में उनकी मुलाकात उर्दू के नामचीन साहित्यकार सरदार अली जाफरी से हुई.

उनकी प्रेरणा से उन्होंने छोटे-छोटे अफसाने लिखना शुरू किया. इसी क्रम में 1940 को उन्हें रेडियो के लिए लिखने का मौका मिला. रेडियो के लिए उन्होंने लगातार 3-4 सालों तक लिखा. आगे लिखने का यह सिलसिला ताउम्र चलता रहा.

Saadat Hasan Manto (Pic: Mid-Day)

आदर्श पति,  आदर्श पिता का किरदार बखूबी निभाया

क्रिएटिविटी ऐसी चीज होती है, जो व्यक्ति को आत्मकेंद्रित बना देती है.

लेखक, कवि, मुसव्विर आदि की निजी जिंदगी अगर देखें, तो वे बेहद उतार-चढ़ाव भरे रहे, क्योंकि वे अपने काम को लेकर इतने मशगूल हो जाते हैं कि परिवारों को वक्त नहीं दे पाते और उनकी निजी जिंदगी में काफी उथल-पुथल रहती है.

लेकिन, मंटो के साथ ऐसा नहीं था. उनके लिए लिखना और बाकी की जिंदगी अलग थी. यही वजह थी कि वह लेखक होने के साथ ही एक अच्छे पति और पिता भी साबित हुए. मंटो की शादी 1936 में साफिया दीन से हुई.

उस वक्त तक उन्होंने लिखना शुरू नहीं किया था. शादी के बाद वह साफिया को जहां भी काम करने गए, अपने साथ ही लेकर गए. साफिया ने भी बीवी का फर्ज बखूबी निभाया. मंटो अपनी कहानियां सबसे पहले उन्हें ही सुनाते. साफिया भी  कहानियां सुनकर मशविरे देती. मंटो उन मशविरों को अमल में लाते.

बंबई में रहते हुए मंटो को एक बेटा हुआ, लेकिन उसका इंतकाल हो गया. इसके बाद उनकी तीन बेटियां हुईं. साफिया हर अच्छे-बुरे वक्त में मंटो के करीब रही. मंटो भी अपनी जिंदगी में वीबी और बच्चे की अहमियत खूब समझते थे.

यही वजह थी कि उन्हें कभी भी शिकायत का मौका नहीं दिया.

उन्होंने एक जगह लिखा भी था,  मैं भले ही आपत्तिजनक कहानियों का लेखक हूं, लेकिन मैं एक पति और पिता भी हूं. दिलचस्प बात यह भी है कि उन्हें कहानियां लिखते हुए कभी भी अकेलेपन की जरूरत नहीं पड़ी.

उन्होंने अपनी आत्मकथा में एक जगह लिखा है- मुझसे पूछा जाता है कि मैं कहानी कैसे लिखता हूँ. इसके जवाब में मैं कहूंगा कि अपने कमरे में सोफे पर बैठ जाता हूं, कागज-कलम लेता हूं और 'बिस्मिल्ला' कहकर कहानी शुरू कर देता हूं.

मेरी तीनों बेटियां शोर मचा रही होती हैं. मैं उन से बातें भी करता हूं. उनके लड़ाई-झगड़े का फैसला भी करता हूं. कोई मिलने वाला आ जाए, तो उसकी खातिरदारी भी करता हूं, पर कहानी भी लिखता रहता हूं.

मंटो पूरी तरह ‘फैमिली मैन’ थे. इसका पता इससे भी चलता है कि वह साफिया के कपड़े इस्तरी किया करते थे. तबीयत खराब होती, तो खुद खाना भी पका लेते. साथ ही साफिया की तीमारदारी भी खूब करते. बच्चियों का तो ख्याल रखते ही थे!

Saadat Hasan Manto with wife Safia (left) and sister-in-law Zakia Hamid Jalal in Bombay (Pic: livemint)

हिन्दुस्तान के बंटवारे के बाद पाकिस्तान गए

सन् 47 के दौर का ऐसा शायद ही कोई लेखक होगा, जिसे हिन्दुस्तान के बंटवारे ने झकझोर न दिया हो! मंटो भी उन्हीं लेखकों में थे. बंटवारे के बाद उन्होंने मुंबई छोड़कर पाकिस्तान जाना तय किया, लेकिन बेमन से.

हालांकि, यह अब भी एक रहस्य ही है कि उन्होंने भारत की जगह पाकिस्तान क्यों चुना. बहरहाल, वह पाकिस्तान तो चले गए, लेकिन बंटवारे के कारण हिन्दू-मुसलमानों को जो दर्द मिला, उससे वह कभी ऊबर नहीं सके.

उन्होंने अपनी कहानियों में उस दौर की दारुण तस्वीर पेश की. उन्होंने यह भविष्यवाणी भी कर दी थी कि पाकिस्तान में अतिवादी पनपेंगे. उनकी यह भविष्यवाणी आज सही निकल रही है.

एक रचनाकार प्रासंगिक तभी होता है, जब उसमें आनेवाले वक्त को देख लेने की काबिलियत हो. इस मायने में मंटो अपने वक्त से काफी आगे रहे. उनकी तमाम कहानियां इस बात की गवाह हैं. खैर…!

मंटो एक उम्दा कहानीकार के साथ ही अच्छा पति और पिता भी थे, ये हम आपको बता चुके हैं, लेकिन इन अच्छाइयों के साथ ही उनकी एक बुरी आदत भी थी- शराबखोरी . वह नशेड़ी की हद तक शराब पीते थे.

शराब के आदी होने की जड़ें तलाशने के लिए थोड़ा सा पीछे जाना होगा.

असल में उनके पिता ने दो शादियां की थीं. वह उनकी दूसरी बीवी की संतान थे. कहा जाता है कि उनके पिता के साथ उनकी दूरी रही, जिस कारण उनकी नजदीकी शराब से बढ़ने लगी. धीरे-धीरे शराब से उनका नाता गहराता गया.

बंबई से पाकिस्तान जाने के बाद, उन्होंने कुछ ज्यादा ही शराब का सेवन शुरू कर दिया था. वह जब मुंबई में थे, तो फिल्मों के लिए भी लिखा करते थे, जिस कारण उन्हें पैसे की कभी किल्लत नहीं हुई.

Indian refugees walking to Indian side after partition. 1947 (Pic: History)

शराब की शोहबत और आर्थिक तंगी से हार गए

1947 में बंटवारे के वक्त पाकिस्तान चले जाने के बाद वहां उन्हें आर्थिक मोर्चे पर काफी संघर्ष करना पड़ा. बंटवारे के बाद पाकिस्तान की फिल्मी दुनिया से गैर-मुसलिम कलाकार जा चुके थे. इस कारण फिल्म इंडस्ट्री की कमर टूट चुकी थी.

इस वजह से उन्हें पाकिस्तान में काम मिलना बंद हो गया. दूसरी तरफ मंटो की कहानियां अक्सर विवादों में घिर जाती, जिस पर कोर्ट केस हो जाते थे और केस लड़ने में पैसा लगता था. उनके लिए पैसे का जुगाड़ नामुमकिन था.

इससे वह मानसिक तौर पर बेहद परेशान रहा करते. इस परेशानी से तात्कालिक निजात का एक ही उपाय था-शराब.

शराब के जुगाड़ के लिए वह लाहौर के कुछ अखबारों में लघु कहानियां भी लिखा करते और जो पैसा मिलता उससे शराब खरीद लाते. अखबारों के लोग ये बात जानते थे. कई बार अखबारवाले कहानियां लिखवाकर पैसे की जगह उन्हें सस्ती शराब थमा देते.

कहते हैं कि मानसिक तनाव और शराब के गठजोड़ ने उनका मानसिक संतुलन बिगाड़ दिया था. उन्हें कई बार मेंटल हॉस्पिटल में भी भर्ती कराना पड़ा. इसी दौर में उन्होंने अमर कहानी ‘टोबा टेक सिंह’ लिखी थी.

शराब छुड़वाने के लिए उन्हें पुनर्वास केंद्र भी जाना पड़ा, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. शराब उन्हें पूरी तरह अपने पंजे में जकड़ चुका था. वह हर पल मौत के करीब पहुंच रहे थे.

Manto's shadows (Pic: thefridaytimes)

आखिरकार, 18 जनवरी 1955 को महज 42 वर्ष की उम्र में लिवर की बीमारी ने उनकी जान ले ली.

Web Title: Personal Life of An famous Urdu Writer Saadat Hasan Manto, Hindi Article

Feature Image Credit: ilknusha