‘भगवान के भरोसे मत बैठिए, का पता भगवान हमरे भरोसे बैठा हो’ – थियेटर से फिल्म ‘माँझी – दा माउंटेन मैन’ देखकर निकले तो ये डायलॉग मानो दिल को छु-सा गया था.

मन में एक अजब-सा उत्साह और प्रेरणा भर गई थी, जैसे दिल में बैठे डरों की जगह हिम्मत और साहस ने ले ली हो. वहीं, एक तरफ ताज्जुब भी था कि कैसे एक इंसान ने पहाड़ तक को हिला डाला?

दशरथ माँझी की ये कहानी बेहद उम्दा है. फिल्म को देखकर मुंह से यही निकला ‘शानदार, जबरदस्त, जिंदाबाद’… पर आख़िर फिल्म तो फिल्म होती है, जो दो घंटें में एक लंबी जीवनगाथा को बयां करने का प्रयास करती है… जिसमें कुछ पहलू छुट भी जाते हैं!

तो चलिये आज पहाड़ को हिलाने वाले माँझी के जीवन के अनछुए पहलूओं को जानने का प्रयास करते हैं–

कम उम्र में घर से भागे थे दशरथ

बिहार के गया जिले के गहलौर गांव में 1934 में दशरथ माँझी का जन्म हुआ था. गहलौर गांव गरीबी से ग्रस्त था. लोगों के लिए बुनियादी सेवाएं भी उपलब्ध नहीं थी. लोग अक्सर अपना पेट भरने के लिए चूहों और छोटे जानवरों को मारकर खाते थे. इस गाँव में जीवन बहुत ही बदहाल था.

दशरथ माँझी ने एक बेहद गरीब परिवार में जन्म लिया था. वे जिस गांव में रहते थे वहां से पास के कस्बे जाने के लिए एक पूरा पहाड़ (गहलौर पर्वत) पार करना पड़ता था. उनके गांव में उन दिनों बिजली तक नहीं थी और न ही पीने को ढंग से पानी मिलता था. ऐसे में छोटी से छोटी जरूरत के लिए भी उस पूरे पहाड़ को या तो पार करना पड़ता या उसका चक्कर लगाकर जाना पड़ता था. माँझी का गाँव इतना गरीब था कि कोई कभी हिम्मत नहीं कर पाया पहाड़ के दूसरी ओर जाके एक नई जिंदगी शुरू करने की!

जैसे-जैसे दशरथ बड़े हुए और उनमें थोड़ी समझ आई, तो वे अपने घर से भाग गए. घर से भागने की माँझी की कोई वाजिब वजह नहीं थी वह तो बस यूँ ही लड़कपन के जोश में निकल गए थे. उनके दिमाग में कुछ नहीं था कि वह भाग के क्या करेंगे और क्या नहीं.

घूमते-घूमते उनके कदम धनबाद पहुँच गए. जब भूख लगाने लगी तो उन्हें भी लगा कि इसका कुछ तो करना होगा इसलिए उन्होंने धनबाद में ही नौकरी करने की सोची. वह बच्चे थे और कुछ जानते नहीं थे इसलिए मजबूरन उन्हें कोयले की खान में काम करना पड़ा. धनबाद में बहुत सी ऐसी खाने थीं, इसलिए माँझी को नौकरी पाने में कोई परेशानी नहीं हुई.

कोयले की खान में कुछ वक़्त तक तो माँझी ने काम किया मगर जब घर की याद उन्हें सताने लगी तो उन्होंने वापस जाना ही सही समझा. कुछ समय बाद ही माँझी वापस अपने गाँव लौट गए.

वापिस लौटकर उन्होंने फगुनी देवी से विवाह किया. दशरथ गहलौर पहाड़ के दूसरे छोर पर लकड़ियां काटने जाया करते थे. उनकी पत्नी फगुनी हर रोज़ पहाड़ के पथरीले और थका देने वाले रास्ते को पार कर उनके लिए खाना लेकर जाती थी. वहीं, इसी रास्ते से वे पानी भी भरकर लाती थी. जीवन कठिन था मगर उनकी पत्नी ने उनका खूब साथ दिया.

 ‘Mountain Man’ Dashrath Manjhi (Pic : thebetterindia)

‘पागल हो गया है दशरथ’… लोगों ने कहा!

दशरथ माँझी पर गहलौर पहाड़ काटकर रास्ता बनाने का जुनून यूँही सवार नहीं हुआ. कहते हैं कि रोजाना की तरह उनकी पत्नी पानी लेके पहाड़ से आ रही थी कि अचानक ही वह वहां के एक गड्ढे में गिर गई. दशरथ को जब इस बात की ख़बर हुई तो वह अपनी पत्नी के पास पहुंचे. फगुनी का घड़ा वहां गिर हुआ था और वे अचेत पड़ी थी. वह उन्हें लेकर अस्पताल पंहुचे, लेकिन तब तक फगुनी दुनिया छोड़ कर जा चुकी थीं. अस्पताल काफी दूर होने के कारण फगुनी को सही समय पर उपचार नहीं मिल पाया था जो उनकी मौत की वजह बनी. अगर वह पहाड़ माँझी की राह में नहीं होता तो शायद उनकी पत्नी समय पर अस्पताल पहुँच जाती और शायद उनकी जान बच पाती.

पत्नी की मौत ने माँझी को भीतर तक तोड़ कर रख दिया. उन्हें किसी चीज से मतलब नहीं था. उन्होंने पहाड़ को अपना दुश्मन समझ लिया था.

वह चाहते थे तो बस एक ही चीज… ‘उस पहाड़ से बदला’!

माँझी नहीं चाहते थे कि वह पहाड़ भविष्य में किसी और की फगुनी को भी छीन ले. यहाँ से माँझी और पहाड़ के बीच एक दंगल शुरू हुआ.

उन्होंने सोच लिया कि वह इस पहाड़ को तोड़ के इसके बीच से एक रास्ता निकाल के ही रहेंगे. अगली ही सुबह छैनी और हथोड़ा लेकर माँझी पहाड़ तोड़ने के लिए निकल पड़े. उनके इस काम को देख कर गाँव वालों ने उनका खूब मजाक उड़ाया. सबने यही कहा कि माँझी पागल हो गया है.

पत्नी की मौत ने उसे बावला कर दिया है!

माँझी भी किसी से कम नहीं थे. आलोचनाएं कितनी भी हुई, मगर उन्हें किसी चीज से फर्क नहीं पड़ा. उन्होंने पहाड़ के साथ अपनी जंग चालू रखी और रोज सुबह उसे तोड़ने निकल जाते.

A Still From Movie ‘Manjhi – The Mountain Manjhi’ (Pic : madaboutmoviez)

22 सालों की लंबी यात्रा

माँझी रोजाना पहाड़ भी तोड़ते और समय-समय पर अपना गुजारा करने के लिए हल भी लगाते. माँझी पहाड़ से गुज़रते लोगों की रास्ता पार करने में मदद करते और उनसे जो कुछ भी मिलता उसे अपने परिवार के पालन-पोषण में लगा देते. माँझी तो अपने पहाड़ तोड़ने में ही लगे रहते थे इसलिए उनके परिवार के बच्चों और बूढ़ों को गाँव वाले आके कुछ खाना दे जाया करते थे.

कोई कुछ भी करे, माँझी को इससे फर्क नहीं पड़ा. वह तो बस पहाड़ तोड़ने में ही लगे हुए थे. सबको लगता था कि यह काम कभी नहीं हो सकता और थोड़े ही समय में माँझी हार मान कर रुक जाएंगे मगर ऐसा हुआ नहीं. माँझी लगातार पहाड़ तोड़ने में ही लगे रहे, वह भी ऐसे जैसे यही एक मात्र लक्ष्य उनके लिए बच गया है. साल बदलते गए मगर माँझी के अंदर का जज़्बा वैसा ही रहा.

गहलौर पर्वत को हिलाना मुश्किल भरा काम था… पर माँझी ने हर चुनौती को चीरते हुए 22 वर्ष के अथक परिश्रम के बाद 360 फीट लंबे, 25 फीट चौड़े और 30 फीट ऊंचे पहाड़ को काट के एक सड़क बना डाली. दशरथ माँझी की बनाई सड़क ने अतरी ब्लॉक और वजीरगंज ब्लॉक की दूरी को 55 किमी से 15 किलोमीटर कर दिया था.

एक कमज़ोर से दिखने वाले आम आदमी ने वो कर दिखाया था जिसकी कल्पना कभी गांव वालों ने भी नहीं की थी. अस्पताल और स्कूल की दूरी कम हो चुकी थी. अतरी के लोगों के लिए मानो ये कोई नई दुनिया थी.

स्थानीय लोगों ने तब माँझी को ‘बाबा’ पुकारना शुरु कर दिया था!

उनके लिए यह एक चमत्कार था. किसी ने नहीं सोचा था कि जिस माँझी का वह इतना मजाक उड़ाते हैं, वह उनके लिए जीवन आसान कर रहा है. पहाड़ तोड़ कर माँझी ने यह बता दिया था कि अगर मन में विश्वास हो तो इंसान कोई भी काम कर सकता है.

Road Carved By Dashrath Manjhi Through Mountains (Pic : thebetterindia)

दिल्ली का पैदल सफर…

दशरथ के कदम यहीं नहीं रुके!

उन्होंने सड़क को पक्का करवाने और मुख्य मार्ग से जोड़ने के लिए सरकार का दरवाज़ा खटखटाया पर ये रास्ता भी उनके लिए आसान नहीं था. माँझी ने सरकार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए गहलौर से दिल्ली तक का रास्ता पैदल तय किया. उन्होंने अपने गांव में स्कूल और अस्पताल बनवाने के लिए याचिका डाली. वह 2006 में मुख्यमंत्री नितीश कुमार के जनता दरबार में भी पंहुचे जहां मुख्यमंत्री ने उनका स्वागत किया और अपनी कुर्सी पर बिठाया.

सरकार ने माँझी को उनके उल्लेखनीय काम के लिए ज़मीन इनाम में दी पर उन्होंने वह ज़मीन सरकार को अस्पताल बनाने के लिए वापिस कर दी. वहीं, उनके लिए बिहार सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार की भी मांग की.

दशरथ माँझी की मृत्यु 17 अगस्त 2007 में कैंसर के कारण नई दिल्ली के एम्स अस्पताल में हो गई पर वे आज भी गहलौर गांव में ज़िंदा हैं. आज भी वहां के लोग अपने बच्चों को माँझी बाबा की कहानियां सुनाते हैं.

Story Of Mountain Man Dashrath Manjhi (Pic: moralheroes)

माँझी की कहानी ‘फिल्म की जुबानी’

सन 1960 से 1982 तक का समय माँझी को पहाड़ को काटने में लगा. इस काम के लिए उन्हें काफी लोकप्रियता मिली पर देशभर के आम लोगों तक दशरथ माँझी की कहानी सिनेमा के पर्दे के ज़रिये पहुँची. साल 2015 में बॉलीवुड फिल्म ‘माँझी– दी मांउटेन मैन’ आई.

इस फिल्म में अभिनेता नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी के अभिनय की काफी तारीफ हुई थी. साथ ही फिल्म के उत्साहवर्धक डायलॉग सबकी जुबां पर छा गए थे. इस फिल्म के जरिए फ़िल्मकार ने माँझी की जिंदगी को लोगों के सामने लाने की कोशिश की.

इस फिल्म के अलावा, दशरथ माँझी की कहानी को 2012 में आई डाक्यूमेंट्री ‘द मैन हु मूव्ड द माउंटेन’ में भी दिखाया गया. इस फिल्म को सरकार की ‘फिल्म डिविज़न’ प्रोडक्शन हाउस ने बनाया था.

वहीं, माँझी की कहानी से रीजनल सिनेमा भी अछुता नहीं रहा. साल 2011 में आई कन्नड फिल्म ‘अलेव मनदारा‘ में माँझी के किरदार को दिखाया गया. हालाँकि, फिल्म माँझी के जीवन पर आधारित नहीं थी.

A Still From Movie ‘Manjhi – The Mountain Man’ (Pic: madaboutmoviez)

शाह जहां ने अपनी बेग़म मुमताज़ के लिए ताजमहल बनवाया, पर दशरथ माँझी ने अपने प्यार के लिए पहाड़ को ही धराशायी कर दिया. दशरथ माँझी की ये कहानी किसी अमर प्रेम कथा से कम नहीं लगती.

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Web Title: Story Of Mountain Man Dashrath Manjhi, Hindi Article

Featured Image Credit: daanapaani/moralheroes/santabanta